सड़क पर गाड़ी चलाते समय अगर पुलिस आपको रोककर शराब पीने का शक जताए तो आपके मन में कई सवाल आ सकते हैं। क्या ब्रेथ एनालाइजर में जांच देना जरूरी है? क्या आप ब्लड सैंपल देने से मना कर सकते हैं? सोशल मीडिया पर इन सवालों को लेकर कई तरह की बातें सामने आती रहती हैं। लेकिन ऐसे मामले में किसी वायरल वीडियो या दावे पर भरोसा करने के बजाय कानून को समझना जरूरी है।
Breath Test: गाड़ी चलाते वक्त पुलिस मांगे नशे का सैंपल, तो क्या कर सकते हैं इनकार? जानें क्या कहते हैं नियम
Breath Test: ड्राइविंग के दौरान अगर पुलिस को शक है कि चालक ने शराब या नशीले पदार्थ का सेवन किया है, तो कानून पुलिस को ब्रेथ टेस्ट कराने का अधिकार देता है। सिर्फ अपनी मर्जी से टेस्ट से इनकार करना सही नहीं है।
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पुलिस कब करा सकती है ब्रेथ टेस्ट?
मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 203 के तहत पुलिस अधिकारी को उचित आधार पर शक होने पर चालक से ब्रेथ सैंपल लेने का अधिकार है। यह शक तब हो सकता है जब अधिकारी को लगे कि चालक ने शराब पी है या वह नशे की हालत में वाहन चला रहा है। ऐसी स्थिति में केवल यह कहकर जांच से बचना आसान नहीं है कि सैंपल देना आपकी मर्जी पर निर्भर करता है।
टेस्ट से मना किया तो क्या होगा?
कानून में ब्रेथ टेस्ट से इनकार करने के नतीजे भी बताए गए हैं। अगर पुलिस अधिकारी को शराब के सेवन का उचित संदेह है और चालक सांस का नमूना देने से मना करता है या ऐसा करने में विफल रहता है, तो कुछ परिस्थितियों में उसे बिना वारंट गिरफ्तार किया जा सकता है। इसके अलावा धारा 204 के तहत कुछ परिस्थितियों में पुलिस गिरफ्तार व्यक्ति से ब्लड सैंपल का लैबोरेटरी टेस्ट कराने के लिए कह सकती है। ब्रेथ टेस्ट से इनकार करना ऐसी परिस्थितियों में ब्लड टेस्ट का आधार बन सकता है।
तब क्या करें जब स्वास्थ्य को लेकर परेशानी हो?
अगर किसी व्यक्ति को मेडिकल कारण से जांच को लेकर सच में परेशानी है तो उसे मौके पर अपनी समस्या साफ तौर पर बतानी चाहिए। कानून में अस्पताल में भर्ती मरीज के मामले में भी कुछ सुरक्षा प्रावधान हैं। इसलिए स्वास्थ्य संबंधी समस्या को छिपाने या मौके पर बहस करने के बजाय संबंधित अधिकारी को स्थिति साफ करना बेहतर है।
शराब पीकर गाड़ी चलाने पर कितना जुर्माना?
मोटर वाहन अधिनियम की धारा 185 के अनुसार अगर चालक के खून में 100 ml में 30 mg से ज्यादा अल्कोहल पाया जाता है तो यह अपराध है। मौजूदा प्रावधान के तहत पहली बार दोषी पाए जाने पर छह महीने तक की जेल, 10 हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। दोबारा अपराध होने पर दो साल तक की जेल, 15 हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इसलिए सिर्फ सोशल मीडिया पर चल रही बातों के आधार पर टेस्ट देने से इनकार करना समझदारी नहीं है। पुलिस जांच के दौरान अपनी बात शांति से रखें और अगर कोई सच में स्वास्थ्य समस्या है तो उसे साफ रूप से बताएं।
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