गुरुबिन भवनिधि तरइ न कोई । जो बिरंचि शंकर सम होई ।।
Guru Purnima 2021 History & Significance : आदिकाल से ही सनातन धर्म में आषाढ़ माह की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा पर्व के रूप में मनाया जाता है। शिवपुराण के अनुसार अठ्ठाईसवें द्वापर में इसी दिन भगवान विष्णु के अंशावतार वेदव्यास जी का जन्म हुआ। चारों वेदों का बृहद वर्णन करने और वेदों का सार 'ब्रह्मसूत्र' की रचना करने के फलस्वरूप ही ये 'महर्षि व्यास' नाम से विख्यात हुए। इन्होंने महाभारत सहित अट्ठारह पुराणों एवं अन्य ग्रन्थों की भी रचना की, जिनमें श्रीमदभागवतमहापुराण जैसा अतुलनीय ग्रंथ भी है। इस दिन जगतगुरु वेदव्यास सहित अन्य गुरुओं की भी पूजा की जाती है। शैक्षिक ज्ञान, आध्यात्म एवं साधना का विस्तार करने और इसे प्रत्येक प्राणी तक पहुंचाने के उद्देश्य से सृष्टि के आरम्भ से ही गुरु-शिष्य परंपरा का जन्म हुआ।
सृष्टि के प्रथम गुरु शिव और शिष्य श्री विष्णु
ब्रह्म द्वारा सृष्टिसृजन की परिकल्पना में सर्वप्रथम परमेश्वर श्रीशिव ने अपने शरीर के बाएँ भाग से एक बालक प्रकट किया और उसे ॐकार (अक्षरब्रह्म) रूपी महामंत्र का जप करने की आज्ञा दी। उस बालक ने हज़ारों वर्ष ॐकाररूपी महामंत्र का जप करते हुए घोर तपस्या की। इतने वर्षों तक तप करते रहने के परिणामस्वरूप उस बालक का शरीर अति विशाल हो गया। बालक की तपस्या से प्रसन्न हुए श्रीशिव ने उनका 'विष्णु' नाम से नामकरण किया। भगवान श्रीविष्णु का प्रथम नाम 'विष्णु' और द्वितीय नाम 'नारायण' का नामकरण भी श्रीशिव ने ही किया। श्रीविष्णु को ॐकाररूपी महामंत्र का जप करने की दीक्षा शिव ने ही दी इसीलिए वे सृष्टि के प्रथम गुरु
और श्रीविष्णु प्रथम शिष्य कहे जाते हैं।
तमसो मा ज्योतिगर्मय
अपने शिष्य को अंधकार से बचाकर प्रकाश की ओर ले जाना ही गुरुता है। इस पवित्र पर्व पर शिष्य अपने गुरुओं की पूजा-आराधना कर उपहारस्वरूप कुछ न कुछ दान-दक्षिणा देते हैं। प्रत्येक युग में गुरु की सत्ता परमब्रह्म की तरह कण-कण में व्याप्त रही है। गुरु विहीन संसार अज्ञानता की कालरात्रि मात्र ही है। संत तुलसीदास ने भी रामचरित मानस में लिखा है कि 'गुरु बिन भवनिधि तरइ न कोई। जो बिरंचि संकर सम होई ।। अर्थात- गुरु की कृपा प्राप्ति के बगैर जीव संसार सागर से मुक्त नहीं हो सकता चाहे वह ब्रह्मा और शंकर के समान ही क्यों न हो।
धर्मशास्त्रों में गुरु की महिमा
शास्त्रों में 'गु' का अर्थ अंधकार या मूल अज्ञान, और 'रु' का अर्थ उसका निरोधक, अर्थात 'प्रकाश' बतलाया गया है। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन से निवारण कर देता है, अर्थात अंधकार से हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाला 'गुरु' ही है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी, क्योंकि यह सम्बन्ध आध्यात्मिक उन्नति एवं परमात्मा की प्राप्ति के लिए ही होता है।
गुरु की महिमा वास्तव में शिष्य की दृष्टि से है, गुरु की दृष्टि से नहीं। एक गुरु की दृष्टि होती है, एक शिष्य की दृष्टि होती है और एक तीसरे आदमी की दृष्टि होती है। गुरु की दृष्टि यह होती है कि मैंने कुछ नहीं किया, केवल जो स्वतः स्वाभाविक वास्तविक तत्व है, उसी की ओर शिष्य की दृष्टि करा दी। गुरु के कहने का तात्पर्य यह है कि मैंने उसी के स्वरुप का उसी को बोध कराया है, अपने पास से उसको कुछ दिया ही नहीं। शिष्य की दृष्टि यह होती है कि गुरु ने मुझे सब कुछ दे दिया, जो कुछ हुआ है, वह सब गुरु की कृपा से ही हुआ है। तीसरे आदमी की दृष्टि यह होती है कि शिष्य की श्रद्धा से ही उसको ज्ञान हुआ है। किन्तु असली महिमा उस गुरु की ही है, जिसने शिष्य को आत्मबोध कराया, आत्मज्ञान के मार्ग पर चलाया। इस दिन जगह-जगह सभी प्राणी अपने अपने गुरु की पूजा करके उनका आशीर्वाद लेते हैं।