जो पृथ्वी पर जन्म लेता है उसकी मृत्यु भी होती है। मृत्यु इस जीवन का अटल सत्य है। शास्त्रों में कहा गया है कि व्यक्ति अपने अच्छे और बुरे कर्मों के अनुसार मृत्यु के पश्चात स्वर्ग और नरक लोक में जाता है। कहा जाता है अच्छे कर्म करने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो बुरे कर्म करने वाला इस लोक के बाद भी नरक की यातनाएं भोगता है। मनुष्य के अच्छे कर्म ही उसके लिए मोक्ष के द्वार खोलते हैं। मोक्ष प्राप्ति का अर्थ होता है जीवन मरण के चक्र से मुक्त हो जाना। मोक्ष का प्राप्ति के बाद मनुष्य को दोबारा इस मृत्युलोक पर जन्म लेने की आवश्यकता नहीं रहती है। इसलिए हर मनुष्य मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति करना चाहता है। शास्त्रों में कुछ ऐसे कार्य बताए गए हैं, जिन्हें करने से मनुष्य के मृत्यु समय के कष्ट कट जाते हैं। उसे इस लोक के बाद स्वर्ग में स्थान मिलता है। मनुष्य जीवन मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति करता है।
इन कामों को करने से मनुष्य के लिए खुलते हैं मोक्ष के द्वार
मृत्यु समय के कष्ट होते हैं दूर
रामचरित मानस का पाठ बहुत ही पुण्यकारी है। इसलिए मनुष्य को रामचरित मानस का पाठ नियमित रूप से करना चाहिए। रामचरितमानस भगवान राम के विषय में लिखा गया है इसके बारे में कहा गया है कि इसकी चौपाइंया केवल वाक्य या शब्दों की माला नहीं हैं बल्कि ये मृत्यु के पश्चात भी मनुष्य को भवपार कराती हैं। रामचरित मानस के पाठ से मृत्यु समय का कष्ट कम होता है और मनुष्य इस लोक के बाद उच्च लोक की प्राप्ति करता है।
एकादशी का व्रत
हिंदू सनातन धर्म में एकादशी के व्रत को सभी व्रतो में श्रेष्ठ बताया है। शास्त्रों में भी एकादशी व्रत की महिमा बताई गई है। एकादशी व्रत के विषय में उल्लेख मिलता है कि यदि कोई मनुष्य निष्ठा और नियम के साथ एकादशी व्रत करता है, तो उसे जीवन-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। मार्गशीष मास में पड़ने वाली एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहा जाता है।
भक्ति का मार्ग
भक्ति का मार्ग मनुष्य के लिए मोक्ष की प्राप्ति के द्वार खोलता है परंतु भक्ति पूर्ण लगन से होनी चाहिए। भक्त पूरी तरह से स्वयं भी भगवान की शरण में सौंप दे। सांसारिक बातों से कोई मोह न रखें। यह मार्ग अत्यंत कठिन होता है।
आचरण और शुद्ध कर्म
आचरण और कर्म ये दो चीजें हैं जिसके अनुसार मनुष्य मृत्यु के बाद मोक्ष, नरक या स्वर्ग का भागीदार बनता है। भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता है कर्म को सबसे ऊपर बताया है। व्यक्ति को भाग्यवादी न बनकर कर्मवादी बनना चाहिए। अच्छा और सात्विक आचरण एवं अच्छे कर्मों के द्वारा ही व्यक्ति इस जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। गीता में भगवान कृष्ण ने 20 आचरणों के बारे में बताया है। अतः आप गीता का पाठ करके इस मार्ग पर चल सकते हैं।