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इस दिन से सूर्यदेव हो रहें हैं दक्षिणायन, छोटे होने लगेंगे दिन, राते होने लगेंगी लंबी

Tue, 15 Jun 2021 05:48 PM IST
Shashi Shashi धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: Shashi Shashi Updated Tue, 15 Jun 2021 05:48 PM IST
सार

21 जून 2021 को मिथुन संक्रांति के बाद सूर्य देव की उत्तरायण की गति पूरी हो जाएगी और इसी के साथ वे दक्षिणायन हो जाएंगे।
जिस तरह से सूर्य के उत्तरायण होने पर दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं, उसी तरह से दक्षिणायन होने पर दिन छोटे और रातें लंबी होने लगती हैं।

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Surya dakshinayan in 21st June 2021 know the religious importance of uttarayan and dakshinayan
सूर्य देव

सूर्य सौरमंडल के संचालक हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार जिस तरह से एक माह में दो पक्ष होते हैं, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष, उसी तरह से एक वर्ष में दो भाग होते हैं, उत्तरायण और दक्षिणायन। सूर्यदेव वर्ष में छह माह उत्तरायण होते हैं और छह माह दक्षिणायन की गति करते हैं। सूर्य हर माह राशि परिवर्तन करते हैं जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो सूर्य उत्तरायण होते हैं और इसके बाद जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हुए आगे बढ़ते हैं और मिथुन में प्रवेश करते हैं, तब दक्षिणायन आरंभ होता है। 21 जून 2021 को मिथुन संक्रांति के बाद सूर्य देव की उत्तरायण की गति पूरी हो जाएगी और इसी के साथ वे दक्षिणायन हो जाएंगे। जिस तरह से सूर्य के उत्तरायण होने पर दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं उसी तरह से दक्षिणायन होने पर दिन छोटे और रातें लंबी होने लगती हैं। 21 जून यानी जिस दिन सूर्य दक्षिणायन होते हैं उस दिन कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें लंबवत् पड़ती हैं, जिसके कारण इस दिन व्यक्ति छाया लगभग नहीं के बराबर हो जाती है। तो चलिए जानते हैं इसके धार्मिक महत्व और प्रभाव के बारे में विस्तार से।

Surya dakshinayan in 21st June 2021 know the religious importance of uttarayan and dakshinayan
सूर्य देव
सूर्य देव के परिवर्तन से मौसम में बदलाव

सूर्यदेव के दक्षिणायन और उत्तरायण होने का सीधा संबंध मौसम से होता है। जहां उत्तरायण होते सूर्य के साथ मौसम में गर्मी बढ़ने लगती है और ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है तो वहीं सूर्य के दक्षिणायन होने के साथ मौसम में ठंडक बढ़ने लगती है और ग्रीष्म की विदाई होने लगती है। 


Surya dakshinayan in 21st June 2021 know the religious importance of uttarayan and dakshinayan
सूर्य
उत्तरायण और दक्षिणायन का महत्व

जिस तरह से पूर्णिमा से चंद्रमास आरंभ होता है उसी प्रकार सूर्य की संक्रांति से सौरमास आरंभ होता है। इस तरह से एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति तक एक सौरमास पूर्ण होता है। जिस तरह से चंद्रमास में दो पक्ष होते हैं उसी प्रकार सौरवर्ष में भी दो भाग होते हैं एक को उत्तरायण और एक को दक्षिणायन कहा जाता है। जहां दक्षिणायन को नकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है तो वहीं उत्तरायण को सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। उत्तरायण को देवताओं का दिन माना गया है और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि मानी गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मनुष्य का एक वर्ष देवताओं के एक दिन और रात होते हैं। 

 

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Surya Arghya
उत्तरायण और दक्षिणायन में क्या करना रहता है सही

उत्तरायण अवधि में उत्सव, पर्व एवं त्योहार पड़ते हैं तो वहीं दक्षिणायन व्रत, साधना एवं ध्यान का समय माना गया है। उत्तरायण की अवधि में शुभ कार्य जैसे गृह प्रवेश, यज्ञ, व्रत, अनुष्ठान, विवाह, मुंडन आदि जैसे कार्य करना शुभ माना जाता है। दक्षिणायन में विवाह, उपनयन, मुंडन आदि शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। इस समय तप, उपवास करना यानी सात्विक साधना करना शुभ रहता है। इसके अलावा यह समय तांत्रिक साधना करने वालो के लिए भी उचित माना जाता है।

 

 

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