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शिरडी साईं बाबा : जहां कड़वी नीम भी देती हैं मिठास, नहीं अधूरी रहती भक्तों की कोई आस

Thu, 27 Sep 2018 12:09 PM IST
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Updated Thu, 27 Sep 2018 12:09 PM IST
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shirdi sai baba birthday know all facts about Shirdi dham and sai baba

संत साईं बाबा एक भारतीय गुरू, योगी, संत और फकीर कहलाए जाते हैं। साईं बाबा कौन थे और उनका जन्म कहां हुआ था यह प्रश्न ऐसे हैं जिनका जवाब किसी के पास नहीं है। साईं ने कभी इन बातों का जिक्र नहीं किया। इनके माता-पिता कौन थे इसकी भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। बस एक बार अपने एक भक्त के पूछने पर साईं ने कहा था कि, उनका जन्म 28 सितंबर 1836 को हुआ था। इसलिए हर साल 28 सितंबर को साईं का जन्मोत्सव मनाया जाता है।


 
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फकीर से संत बनने की कहानी
ऐसा माना जाता है कि सन् 1854 में पहली बार साई बाबा शिरडी में दिखाई दिए। उस समय बाबा की उम्र लगभग 16 साल  थी। शिरडी के लोगों ने बाबा को पहली बार एक नीम के वृक्ष के नीचे समाधि में लीन देखा। कम उम्र में सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास की जरा भी चिंता किए बगैर बालयोगी को कठिन तपस्या करते देखकर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ।

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कैसा पड़ा साईं नाम
कुछ दिनों तक शिरडी में रहकर साईं एक दिन किसी से कुछ कहे बिना अचानक वहां से चले गए। कुछ सालों के बाद साई फिर शिरडी में पहुंचे। खंडोबा मंदिर के पुजारी ने साईं को देखते ही कहा ‘आओ साईं’ इस स्वागत संबोधन के बाद से ही शिरडी का फकीर ‘साईं बाबा’ कहलाने लगा।
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साईं का शुरुआती जीवन
शिरडी के लोग शुरू में साईं बाबा को पागल समझते थे लेकिन धीरे-धीरे उनकी शक्ति और गुणों को जानने के बाद भक्तों की संख्या बढ़ती गयी। साईं बाबा शिरडी के केवल पांच परिवारों से रोज दिन में दो बार भिक्षा मांगते थे। वे टीन के बर्तन में तरल पदार्थ और कंधे पर टंगे हुए कपड़े की झोली में रोटी और ठोस पदार्थ इकट्ठा किया करते थे। सभी सामग्रियों को वे द्वारका माई लाकर मिट्टी के बड़े बर्तन में मिलाकर रख देते थे। कुत्ते, बिल्लियां, चिड़िया निःसंकोच आकर खाने का कुछ अंश खा लेते थे, बची हुए भिक्षा को साईं बाबा भक्तों के साथ मिल बांट कर खाते थे।

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शिरडी साई बाबा के चमत्कार
साईं बाबा ने अपने जीवनकाल में कई ऐसे चमत्कार दिखाए जिससे लोगों ने इनमें ईश्वर का अंश महसूस किया। इन्हीं चमत्कारों ने साईं को भगवान  का अवतार बना दिया। साईं बाबा जब पहली बार शिरडी आए थे और तब वो एक नीम के पेड़ के नीचे विश्राम किया करते थे। आज इस जगह को शिरड़ी साईं धाम में गुरु स्थान कहा जाता है। इस नीम के पेड़ की पत्ती को खाकर लोग चौंक जाते हैं। क्योंकि इस नीम के पेड़ की पत्तियां खाने पर मीठा स्वाद देती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस नीम के पेड़ की पत्तियां तब कड़वी ही थी, पर साईं के दफ़्न होने के बाद मीठी हो गयी।
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