परमेश्वर श्रीशिव को प्रसन्न करके अपने ईष्ट कार्य की सिद्धि करके सुखद जीवन का अवसर प्रदान करने वाला श्रावण माह 25 जुलाई से आरम्भ होकर 22 अगस्त तक चलेगा। इसके मध्य शिवभक्तों द्वारा रुद्राभिषेक, दरिद्रता निवारक अनुष्ठान, मोक्ष प्राप्ति, आसुरी शक्तियों से निवृत्ति, भक्ति प्राप्ति तथा दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों से मुक्त हुआ जा सकता है। इस माह में एक बेल पत्र भी अगर शिव जी को अर्पित किया जाए तो वह अमोघ फलदायी होता है। जिस प्रकार मकर राशि पर सूर्य के पहुंचने पर सभी देवी-देवता, यक्ष आदि पृथ्वी पर आते हैं उसी प्रकार कर्क राशिगत सूर्य में भी सभी देवी देवता पृथ्वी पर आते हैं। ये सभी भगवान शिव की आराधना पृथ्वी पर करके अपना पुण्य वृद्धि करते हैं। भगवान विष्णु, ब्रह्मा, इंद्र, शिवगण आदि सभी श्रावण में पृथ्वी पर ही वास करते हैं और सभी अलग-अलग रूपों में अनेकों प्रक्रार से शिव आराधना करते हैं।
ऐसा माना जाता है कि इस माह में की गयी शिव पूजा तत्काल शुभ फलदायी होती है। इसके पीछे स्वयं शिव का ही वरदान ही है। समुद्र मंथन के समय जब कालकूट नामक विष निकला तो उसके ताप से सभी देवता भयभीत हो गए। तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मच गयी। किसी के पास भी इसका निदान नहीं था। कालकूट विष से वायु मंडल प्रदूषित होने लगा, जिससे जनजीवन पर घोर संकट आ गया। तभी सभी देवता भगवान शिव की शरण में गए और इस विष से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। लोक कल्याण के लिए भोलेनाथ ने इस विष का पान कर लिया और उसे अपने गले में ही रोक लिया जिसके प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया और वे नील कंठ कहलाये।
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सत्य के शिव
- फोटो : shiv temple
विष के ताप से व्याकुल शिव तीनों लोको में भ्रमण करने लगे किन्तु वायु की गति भी मंद पड़ गयी थी इसलिए उन्हें कहीं भी शांति नहीं मिली। अंत में वे पृथ्वी पर आये और पीपल के वृक्ष के पत्तों को चलता हुआ देख उसके नीचे बैठ गए जहां कुछ शांति मिली। शिव के साथ ही सभी देवी-देवता उस पीपल वृक्ष में अपनी शक्ति समाहित कर शिव को सुंदर छाया और जीवन दायिनी वायु प्रदान करने लगे। चन्द्रमा ने अपनी पूर्ण शीतल शक्ति से शिव को शांति पहुचाई तो शेषनाग ने गले में लिपटकर उस कालकूट विष के दाहकत्व को कम करने में लग गए। देवराज इन्द्र और गंगा माँ देव निरंतर शिव शीश पर जलवर्षा करने लगे। यह जानकर की विष ही विष के असर को कम कर सकता है सभी शिवगण भांग, धतूर, बेलपत्र आदि शिव को खिलाने लगे जिससे भोलेनाथ को शांति मिली।
श्रावण माह की समाप्ति तक भगवान शिव पृथ्वी पर ही रहे। महादेव ने चन्द्रमा, पीपल वृक्ष, शेषनाग आदि सभी को वरदान दिया, कि इस माह में जो भी जीव मुझे पत्र, पुष्प, भांग, धतूर और बेलपत्र आदि चढ़ाएगा उसे संसार के तीनो कष्टों दैहिक, यानी स्वास्थय से सम्बंधित, दैविक यानी प्राकृतिक आपदा से सम्बंधित और भौतिक यानी दरिद्रता से सम्बंधित तीनों कष्टों से मुक्ति मिलेगी साथ ही उसे मेरे लोक की प्राप्ति भी होगी। चंद्रमा और शेषनाग पर विशेष अनुग्रह करते हुए शिव ने कहा की जो तुम्हारे दिन सोमवार को मेरी आराधना करेगा वह मानसिक कष्टों से मुक्त हो जायेगा। उसे किसी प्रकार की दरिद्रता नहीं सताएगी।
शेषनाग को शिव ने आशीर्वाद देते हुए कहा की जो इस माह में नागों को दूध पिलाएगा, उसे काल कभी नहीं सताएगा और उसकी वंश वृद्धि में कोई रुकावट नहीं आएगी। उसे सर्प दंश का भय नहीं रहेगा। गंगा मां को भगवान शिव ने कहा की जो इस माह में गंगा जल मुझे अर्पित करेगा वह जीवन मरण के बंधन से मुक्त हो जायेगा।