Pitru Paksha 2026: हर साल पितृ पक्ष का समय हमारे पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए बेहद खास माना जाता है। इन दिनों तर्पण और श्राद्ध कर्म के साथ-साथ रसोई में भी कुछ खास बातों का ध्यान रखा जाता है। कहीं शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन होता है, तो कहीं पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपराएं यानी कुलाचार भोजन के तौर-तरीके तय करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि पितृ पक्ष में असल में खाना-पीना कैसा होना चाहिए और शास्त्र तथा कुलाचार की सोच में क्या अंतर है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
श्राद्ध पक्ष में भोजन को लेकर क्या कहते हैं शास्त्र और कुलाचार? जानें खान-पान के नियम
पितृ पक्ष हिंदू धर्म में पितरों के तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए समर्पित पवित्र समय माना जाता है। इस दौरान भोजन को लेकर शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं, वहीं हर परिवार की अपनी कुल परंपरा और कुलाचार भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान पितर धरती पर आकर अपने वंशजों के बीच निवास करते हैं और उनसे तर्पण, पिंडदान व श्राद्ध कर्म की अपेक्षा रखते हैं। यह मान्यता है कि इस दौरान परिवार का आचरण, विचार और भोजन - तीनों ही शुद्ध और सात्विक होने चाहिए, ताकि पितरों को तृप्ति और शांति मिल सके। यही वजह है कि खान-पान के नियम इस अवधि में विशेष महत्व रखते हैं।
- सात्विक भोजन को प्राथमिकता: शास्त्रों के अनुसार पितृ पक्ष में सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। सात्विक आहार का अर्थ है वह भोजन जो मन और शरीर दोनों को शुद्ध रखे - जैसे दाल, चावल, हरी सब्जियां, फल और शुद्ध घी से बने पकवान।
- तामसिक भोजन से परहेज: मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज जैसे तामसिक और उग्र प्रकृति वाले भोज्य पदार्थों का सेवन इस दौरान वर्जित बताया गया है। मान्यता है कि ऐसा भोजन मन में विकार उत्पन्न करता है, जो श्राद्ध कर्म की पवित्रता के विपरीत है।
- श्राद्ध के भोजन में विशेष सामग्री: पिंडदान और श्राद्ध कर्म में पितरों के निमित्त बनाए जाने वाले भोजन में चावल, जौ, तिल, दूध, घी और शहद का विशेष महत्व है। इन्हें पितरों के लिए पवित्र और प्रिय माना गया है।
- भोजन बनाने में शुद्धता: शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि श्राद्ध का भोजन बनाते समय रसोई और बर्तनों की स्वच्छता का पूरा ध्यान रखा जाए। भोजन पकाने वाले व्यक्ति को भी स्नान कर शुद्ध अवस्था में रहकर ही खाना तैयार करना चाहिए।
- ब्राह्मण भोज और पंचबलि: श्राद्ध कर्म पूरा होने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है। इसके अलावा भोजन का एक अंश गाय, कौवे, कुत्ते, चींटी और देवताओं के लिए (पंचबलि) निकालने की भी परंपरा है, जिसे पितरों तक भोजन पहुंचाने का प्रतीकात्मक माध्यम माना जाता है।
- नमक और मसालों में संयम: कुछ शास्त्रीय मतों के अनुसार श्राद्ध के भोजन में अधिक तीखे मसाले, खटाई और अत्यधिक नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन को सादा और सात्विक रखने पर बल दिया गया है।
कुलाचार यानी पारिवारिक परंपराएं क्या कहती हैं?
शास्त्रों के सामान्य नियमों के अलावा भारत में हर क्षेत्र, जाति और परिवार का अपना कुलाचार यानी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपरा होती है, जो कई बार शास्त्रीय नियमों से थोड़ी अलग भी हो सकती है। कुछ परिवारों में पितृ पक्ष के दौरान पूरी तरह सात्विक और प्याज-लहसुन रहित भोजन बनाया जाता है वहीं कुछ समुदायों में विशेष रूप से मछली या मांस से बने पारंपरिक व्यंजन ही पितरों को अर्पित करने की प्रथा रही है, क्योंकि माना जाता है कि पितरों को जीवनकाल में जो भोजन प्रिय था, वही श्राद्ध में परोसा जाना चाहिए। बंगाल, असम और कुछ दक्षिण भारतीय परिवारों में कुलदेवता व पितरों के अनुसार अलग-अलग व्यंजन बनाने की परंपरा देखी जाती है
कुलाचार में एक महत्वपूर्ण मान्यता यह भी है कि श्राद्ध में वही भोजन बनाया जाए जो दिवंगत पितर को जीवित रहते हुए सबसे ज्यादा प्रिय था। यही कारण है कि एक ही धर्म के अंतर्गत अलग-अलग परिवारों में श्राद्ध भोजन की सामग्री में भिन्नता देखने को मिलती है। कई परिवार अपने पारिवारिक पुरोहित या पंडित से परामर्श लेकर ही तय करते हैं कि उनके कुल में श्राद्ध का भोजन किस विधि से बनाया जाना चाहिए, क्योंकि पुरोहित को कुल की परंपरा की जानकारी पीढ़ियों से रहती है।