Jagannath Yatra 2018: क्यों निकाली जाती है जगन्नाथ रथ यात्रा, विस्तार से जानें यहां
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जगन्नाथ रथयात्रा का आरंभ भगवान जगन्नाथ जी के रथ के सामने सोने के हत्थे वाली झाडू को लगाकर किया जाता है।जिसके बाद मंत्रोच्चार एवं जयघोष के साथ इस रथयात्रा को शुरू किया जाता है। कई पारंपरिक वाद्ययंत्रों की आवाज के बीच विशाल रथों को सैकड़ों लोग मोटे-मोटे रस्सों की मदद से खींचते हैं।सबसे पहले बलभद्र जी का रथ तालध्वज में प्रस्थान करता है। जिसके बाद बहन सुभद्रा जी का रथ चलना शुरू होता है।सबसे आखिर में जगन्नाथ जी के रथ को बड़े ही श्रद्धापूर्वक लोग खींचना शुरू करते हैं।
ऐसा माना जाता है कि जो लोग रथ खींचने में सहयोग करते हैं उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। बता दें, जगन्नाथ जी की रथयात्रा गुंदेचा मंदिर पहुंचकर संपन्न होती है। यह वही मंदिर' है, जहां विश्वकर्मा ने तीनों देव प्रतिमाओं का निर्माण किया था। इस मंदिर को 'गुंदेचा बाड़ी' भी कहते हैं। खास बात यह है कि इस जगह को भगवान की मौसी का घर भी माना जाता है। सूर्यास्त तक अगर रथ गुंदेचा मंदिर नहीं पहुंच पाता तो वह अगले दिन अपनी यात्रा पूरी करता है। इस मंदिर में भगवान एक हफ्ते तक रहते हैं। जहां उनकी पूजा अर्चना की जाती है।
भगवान को मौसी के घर स्वादिष्ट पकवानों का भोग लगाया जाता है। जिसके बाद जब भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ जाते हैं तो उन्हें पथ्य का भोग लगाया जाता है जिससे वो जल्दी ठीक हो जाते हैं। रथयात्रा के तीसरे दिन पंचमी को लक्ष्मी जी भगवान जगन्नाथ को ढूंढ़ते हुए यहां आती हैं।लेकिन द्वैतापति के दरवाजा बंद करने पर वो नाराज होकर रथ का पहिया तोड़कर हेरा गोहिरी साही' पुरी का एक मुहल्ला जहां लक्ष्मी जी का मंदिर है, माता वहां लौट आती हैं।