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Gopashtami 2021: जीवन में चाहते हैं सुख समृद्धि और खुशहाली तो गोपाष्टमी पर इस तरह करें गौ माता की पूजा

Thu, 11 Nov 2021 08:05 AM IST
शशि सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: शशि सिंह Updated Thu, 11 Nov 2021 08:05 AM IST
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gopashtami 2021 date importance gopashtami katha and puja vidhi of gau mata to get wealth prosperity and happiness in your life
गोपाष्टमी 2021 (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

हिंदू धर्म में वैसे तो सदैव ही गौ माता की पूजा का विधान बताया गया है लेकिन कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन खासतौर पर गौ माता की पूजा और सेवा करने का विधान है। इस बार गोपाष्टमी 11 नवंबर दिन गुरुवार को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन सर्वप्रथम भगवान कृष्ण ने गायों को चराना आरंभ किया था। इस दिन गौ माता के साथ बछड़े का पूजन भी किया जाना चाहिए। सनातन धर्म में गाय को पूजनीय माना गया है। शास्त्रों के अनुसार गाय में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास होता है। मान्यता है कि यदि गोपाष्टमी के दिन विधि-विधान से गाय का पूजन व सेवा की जाए तो देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है। गाय की पूजा करने से श्री कृष्ण प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं। गोपाष्टमी पर गाय की पूजा करने से घर में सुख समृद्धि और शांति का वास होता है। गोपाष्टमी के दिन गौ माता व गिरधर की पूजा करने के साथ ही कथा भी पढ़नी चाहिए। इससे पुण्य की प्राप्ति होती है। जानिए गोपाष्टमी की कथा और पूजन विधि।

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गोपाष्टमी की कथा-

गोपाष्टमी के संबंध में मिलने वाली कथा के अनुसार, सर्वप्रथम कृष्ण जी जिस दिन गौ चरण के लिए पहली बार घर से निकले थे, वह कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि थी इसलिए इस तिथि को गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। गोपाष्टमी की पौराणिक कथा के अनुसार, जब श्री कृष्ण छह वर्ष के हुए तो यशोदा जी से कहने लगे, 'मईया अब मैं बड़ा हो गया हूं। यशोदा जी प्रेम पूर्वक बोली– अच्छा लल्ला अब तुम बड़े हो गए हो तो बताओ अब क्या करें। इस पर कन्हैया बोले– अब हम बछड़े चराने नहीं जाएंगे, अब हम गाय चराएंगे।

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यशोदा जी ने कहा– ठीक है बाबा से पूछ लेना', अपनी मईया के इतना कहते ही झट से कृष्ण जी नंद बाबा से पूछने पहुंच गए।

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नंद बाबा ने कहा– लल्ला अभी तुम बहुत छोटे हो अभी तुम बछड़े ही चराओं लेकिन कन्हैया हठ करने लगे। तब नंद जी ने कहा ठीक है लल्ला तुम पंडित जी को बुला लाओ- वह गौ चारण का मुहूर्त देख कर बता देंगे।

 

बाबा की बात सुनकर कृष्ण जी झट से पंडित जी के पास पहुंच गए और बोले–पंडित जी, आपको बाबा ने बुलाया है, गौ चारण का मुहूर्त देखना है, आप आज ही का मुहूर्त बता देना मैं आपको बहुत सारा माखन दुंगा।

 

पंडित जी नंद बाबा के पास पहुंचे और बार-बार पंचांग देख कर गणना करने लगे, तब नंद बाबा ने पूछा, क्या बात है पंडित जी? आप बार-बार क्या गिन रहे हैं? तब पंडित जी ने कहा, क्या बताएं गौ चारण के लिए केवल आज का ही मुहूर्त निकल रहा है, इसके बाद तो एक वर्ष तक कोई मुहूर्त नहीं है। पंडित जी की बात सुनने के बाद नंदबाबा को गौ चारण की स्वीकृति देनी पड़ी।

 

उसी दिन भगवान ने गौ चारण आरंभ किया। भगवान जिस समय कोई कार्य आरंभ करते हैं, वही शुभ-मुहूर्त बन जाता है। यह शुभ तिथि कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि थी, भगवान के द्वारा गौ-चारण आरंभ करने के कारण यह तिथि गोपाष्टमी कहलाई।

 

इसके बाद मईया यशोदा ने अपने लल्ला का श्रृंगार किया और जैसे ही पैरो में जूतियां पहनाने लगी तो कन्हैया मना कर देते हैं और कहते हैं कि मईया यदि मेरी गाय जूतियां नहीं पहनती तो मैं कैसे पहन सकता हूं। यदि पहना सकती हो तो उन सभी को भी जूतियां पहना दो और भगवान जब तक वृन्दावन में रहे, भगवान ने कभी पैरों में जूतियां नहीं पहनी। आगे-आगे गाय और उनके पीछे बांसुरी बजाते कन्हैया, बलराम और ग्वाल-बाल ने इस प्रकार से विहार करते हुए उस वन में प्रवेश किया तब से भगवान की गौ-चारण लीला का आरंभ हुआ।

गोपाष्टमी पर ऐसे करें गौ माता की पूजा-

अष्टमी तिथि को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सबसे पहले स्वयं स्नानादि करना चाहिए और भगवान कृष्ण के समक्ष दीप प्रज्वलित करना चाहिए। इसके बाद गाय और उसके बछड़े को नहलाकर तैयार करना चाहिए और गाय को घुंघरू आदि पहनाने चाहिए। गाय को आभूषण या फूलों की माला पहनाकर श्रंगार करें। गौ माता के सींग रंगकर उनमें चुनरी बांधे। अब गाय भलिभांति गाय का पूजन करें और भोजन कराएं। इसके बाद गाय की परिक्रमा करनी चाहिए। गोधूलि बेला में पुनः गाय का पूजन किया जाता है और उन्हें गुड़, हरा चारा आदि खिलाएं। यदि आपके घर में गाय न हो तो किसी गौशाला में जाकर गाय का पूजन करना चाहिए।

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