जून मास की शुरुआत में तीन तारीख में छह पर्वों का शुभ संयोग बन रहा है। सोमवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या यानी सोमवती अमावस्या के साथ शनि जयंती, रोहिणी व्रत, वट सावित्री व्रत, बड़मावस और भावुका अमावस्या का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन जप, तप, व्रत और साधना करने से मनुष्य को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
आज सोमवती अमावस्या पर शनि जयंती समेत मनाए जाएंगे छह बड़े पर्व, जानें सभी का महत्व
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सोमवती अमावस्या
पंचांग में अमावस्या की तिथि का विशेष महत्व है। चंद्रमा की 16वीं कला को अमावस्या कहा जाता है। इस तिथि पर चंद्रमा की यह कला जल में प्रविष्ट हो जाती है। अमावस्या माह की तीसवीं तिथि है, जिसे कृष्णपक्ष के समाप्ति के लिए जाना जाता है। इस तिथि पर चंद्रमा और सूर्य का अंतर शून्य होता है। सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है। इस बार यह 03 जून 2019 को पड़ रही है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजन करने से श्री हरि की कृपा बरसती है। इस तिथि पर मां लक्ष्मी की साधना-आराधना भी सुख-समृद्धि दिलाने वाली होती है।
शनि जयंती
शनि को न्याय का देवता कहा जाता है। शनिदेव व्यक्ति को उसके कर्मो के हिसाब से फल अवश्य प्रदान करते हैं। भगवान शनिदेव का जन्मोत्सव हर साल हिंदू पंचांग के ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। इस बार 3 जून शनि जयंती है। शनि जयंती पर शनि दर्शन और पूजा का विशेष महत्व होता है। जिन जातकों की कुंडली में शनि की महादशा, अंतर्दशा, साढ़ेसाती और ढैय्या चल रही होती है, इस दिन उनकी पूजा करने से शनि दोष से मुक्ति मिलती है।
अखंड सुहाग की कामना से प्रतिवर्ष सुहागिन महिलाओं द्वारा ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट सावित्री व्रत रखा जाता है। इस साल यह व्रत 3 जून को पड़ रहा है। पवित्र बरगद और सावित्री-सत्यवान की पूजा के साथ इस दिन यमराज की भी पूजा होती है। इस दिन बरगद के वृक्ष की पूजा कर महिलाएं देवी सावित्री के त्याग, पति प्रेम एवं पति व्रत धर्म का स्मरण करती हैं। यह व्रत स्त्रियों के लिए सौभाग्यवर्धक, पापहारक, दुःखप्रणाशक और धन-धान्य प्रदान करने वाला होता है। इस व्रत में वट वृक्ष का बहुत महत्त्व होता है।
बड़मावस
पृथ्वी पर वट वृक्ष को सबसे शक्तिशाली वृक्ष माना गया है। इस वृक्ष में सबसे ज्यादा धनात्मक ऊर्जा मानी गई है। मान्यता है कि बड़मावस का व्रत देवी सावित्री ने किया था। जिससे मिले आशीर्वाद से उनके पति के प्राण बच गए थे। इस पेड़ में बहुत सारी शाखाएं नीचे की तरफ लटकी हुई होती हैं, जिन्हें देवी सावित्री का रूप माना जाता है। वट वृक्ष की महत्ता इस प्रकार भी समझी जा सकती है कि श्री शुकदेव महाराज ने राजा परिक्षित वट वृक्ष के नीचे बैठकर ही श्रीमद्भागवत कथा को सुनाया था।