भारत एक ऐसा देश है जहां कभी पर्व या त्योहार खत्म नहीं होते। हर दिन किसी न किसी पावन पर्व या तिथि से जुड़े उत्सव की धूम रहती है। रक्षाबंधन, फिर दशहरा, और अभी हाल में बीती दीपावली के बाद अब सूर्य की साधना का महापर्व। उगते सूर्य को तो सभी प्रणाम करते हैं, लेकिन डूबते सूर्य कोई नहीं। यह एक कहावत है लेकिन पूरी तरह सच नहीं। सच तो यह है कि डूबते सूर्य की भी साधना-अराधना होती है। और बड़े धूम धाम से उल्लास के साथ होती है। आस्था और विश्वास से जुड़ा ऐसा ही महापर्व है छठ। जिसमें डूबते सूर्य की विशेष रूप से पूजा-प्रार्थना की जाती है।
छठ पर्व 2018: आखिर डूबते हुए सूर्य को क्यों दिया जाता है अर्घ्य
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नहाय खाय के साथ शुरू हुआ महापर्व
सूर्य की साधना से जुड़े छठ महापर्व का चार दिवसीय अनुष्ठान नहाय-खाय के साथ आज से प्रारंभ हो चुका है। भगवान भास्कर को सायंकालीन अर्घ्य 13 नवंबर की शाम को जबकि 14 नवंबर की सुबह सूर्य देवता को प्रात:कालीन अर्घ्य प्रदान करने के साथ इस महाअनुष्ठान का समापन होगा। मान्यता है कि इस पावन दिन भगवान भास्कर को अर्घ्य देने से इस जन्म के साथ-साथ, किसी भी जन्म में किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं।
सूर्य संग होती है छठी मैया की पूजा
छठ प्रत्यक्ष देवता सूर्य की साधना-आराधना का महापर्व है। इस पावन पर्व पर, सुख-शांति-स्वास्थ्य और समृद्धि की कामनाएं लिए, हर कोई यही गाता है — ‘हमहूं अरघिया देबै हे छठि मइया।’ अब आप कहेंगे कि यह पर्व मुख्य रूप से सूर्य की साधना आराधना का है, तो फिर छठी माई की पूजा क्यों। आखिर कौन हैं ये छठी मैया? पौराणिक मान्यता के अनुसार छठ देवी ब्रह्माजी की मानस पुत्री देवसेना मानी गई हैं। छठ मैया नि:संतानों को संतान का सुख और लंबी आयु प्रदान करती हैं। इन्हें विष्णुमाया और बालदा अर्थात पुत्र देने वाली भी कहा गया है। कहा जाता है कि संतान के जन्म के छठे दिन जो छठी मनाई जाती हैं, उसमें इन्हीं षष्ठी देवी की पूजा की जाती है।
संतान के सौभाग्य की कामना का व्रत
सूर्य षष्ठी व्रत की तैयारी, लोग कई महीने पहले से ही करने लगते हैं। हालांकि विशेष रूप से यह चार दिन पहले शुरु होता है। कार्तिक शुक्लपक्ष तृतीया के दिन परवैतिने नहाय-खाय व्रत करती हैं। ‘परवैतिन’ पूजा करने वाली उन महिलाओं को कहा जो संतान के सुख सौभाग्य की कामना से छठी माई का व्रत रखती हैं।
इसके बाद कार्तिक शुक्लपक्ष चतुर्थी के दिन सुबह से ही खरना की तैयारी शुरू हो जाती है। इस दिन व्रती महिलाएं दिन भर मौन रखते हुए व्रत करती हैं। शाम के समय चावल गुड़ की खीर और घी लगी रोटी, मूली, केला, सेब, अमरूद, पान, फूल-माला के साथ केले के पत्ते पर पूजा करती हैं। यह प्रसाद आम की लकड़ी के जलावन पर तैयार किया जाता है। दीप प्रज्जवलित करने के बाद आरती-हवन के बाद व्रती महिलाएं प्रसाद ग्रहण करती हैं।