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Shardiya Navratri 2023: कैसे हैं मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूप? जानें हर रूप की पूजा का महत्व

Sun, 15 Oct 2023 12:24 PM IST
आशिकी पटेल धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आशिकी पटेल Updated Sun, 15 Oct 2023 12:24 PM IST
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Navratri 2023 maa Durga Nine Avtar And Forms Know The Meaning Of Navdurga Puja In Hindi
प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री - फोटो : amar ujala

मां शैलपुत्री करती हैं कल्याण



साधना मंत्र : ऊँ देवी शैलपुत्र्यै नम:

मां दुर्गा को सर्वप्रथम शैलपुत्री के रूप में पूजा जाता है। हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका नामकरण शैलपुत्री के रूप में हुआ। मां शैलपुत्री का पूजन जीवन में सफलता के उच्चतम स्तरों को पाने के लिए किया जाता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता के लिए सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने की शक्ति पर्वतकुमारी मां शैलपुत्री प्रदान करती हैं। शैल पर्वत की चोटी ही शिखर है। चेतना का सर्वोच्च शिखर मां शैलपुत्री की आराधना से भक्तों को प्राप्त होता है, जिससे शरीर में स्थित कुंडलिनी शक्ति जागृत होकर रोग-शोक रूपी दैत्यों का विनाश करती है। इनके एक हाथ में त्रिशूल तथा दूसरे में कमल का फूल रहता है। इनका वाहन वृषभ अर्थात् बैल है। मां का यह स्वरूप लावण्यमयी एवं अतिरूपवान है। भगवान शंकर की भांति मां के इस स्वरूप का निवास भी पर्वतों पर है। 

योग पुस्तकों में इनका स्थान प्रत्येक प्राणी में नाभि चक्र से नीचे स्थित मूलाधार चक्र को बताया गया है। यही वह स्थान है, जहां आद्य शक्ति कुंडलिनी के रूप में रहती है, इसलिए नवरात्रि के पहले दिन देवी की उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। इसी स्थान से योग साधना का प्रारंभ होता है। मां का यह रूप साधक को साधना में लीन होने की शक्ति, साहस एवं बल प्रदान करता है, साथ ही आरोग्य का वरदान भी देता है। मां के इस स्वरूप को सफेद एवं लाल रंग की वस्तुएं बहुत पसंद हैं, इसलिए नवरात्र के पहले दिन इस स्वरूप के सामने सफेद या लाल रंग के पुष्प अर्पित कर लाल सिंदूर लगाएं। गाय के दूध से बने पकवान और मिठाई का भोग लगाने से मां खुश होकर भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं, साथ ही भक्त के घर की दरिद्रता को दूर करके उसके घर के सभी सदस्यों को रोगमुक्त करती हैं। शैलपुत्री देवी प्रथम दुर्गा हैं।

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दूसरा स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी - फोटो : amar ujala

मां ब्रह्मचारिणी दिलाती हैं सफलता

साधना मंत्र : ऊँ देवी ब्रह्मचारिण्यै नम:

सर्वव्यापी ब्रह्मांडीय चेतना का दूसरा स्वरूप नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी के रूप में भक्तों को आशीष देता है। ब्रह्म का अर्थ है वह परमचेतना, जिसका न तो कोई आदि है और न कोई अंत, जिसके पार कुछ भी नहीं है। ब्रह्मचारिणी के रूप में भक्त ध्यानमग्न होकर परमसत्ता की दिव्य अनुभूति नवरात्रि के दूसरे दिन करते हैं। मां के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की आराधना करने वालों की शक्तियां असीमित, अनन्त हो जाती हैं। फलस्वरूप दुखों से उपर उठकर वह जीवन के सुखों को प्राप्त करता है। सत, चित्त, आनंदमय ब्रह्म की प्राप्ति कराना ही ब्रह्मचारिणी का स्वभाव है। पूरे चंद्रमा के समान निर्मल, कांतिमय और भव्य रूप और दो भुजाओं वाली ब्रह्मचारिणी कौमारी शक्ति का स्थान योगियों ने ‘स्वाधिष्ठान चक्र’ में बताया है। इनके एक हाथ में कमंडल तथा दूसरे में जप की माला रहती है।

भक्तों को ब्रह्मचारिणी उनके प्रत्येक काम में सफलता देती हैं। वे सन्मार्ग से कभी नहीं हटते और जीवन के कठिन संघर्षों में भी बिना विचलित हुए अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। इनका वाहन शिखर अर्थात पर्वत की चोटी को ही बताया गया है। मां भगवती सूक्ष्म से सूक्ष्म रूप में भी शिव जी की प्राप्ति के लिए तप करती रहीं। तीनों लोकों में भगवती के इस रूप का तेज व्याप्त हो गया। तब ब्रह्माजी ने आकाशवाणी से इस रूप को भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने का वर दिया। देवी के इस रूप के पूजन से जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होता और दीर्घायु प्राप्त होती है। मां दुर्गा के इस रूप को गुड़हल और कमल के फूल बेहद पसंद हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन इन्हीं पुष्पों को अर्पित करने तथा चीनी, मिश्री और पंचामृत का भोग अर्पित करने से भगवती अति शीघ्र प्रसन्न होकर लंबी आयु एवं सौभाग्य प्रदान करती हैं।

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तीसरा स्वरूप मां चंद्रघंटा - फोटो : amar ujala

मां चंद्रघंटा नियंत्रित रखती हैं मन

साधना मंत्र : ऊँ देवी चंद्रघंटायै नम:

असफल व्यक्ति प्रायः अपने मन में ही उलझा रहता है। मन के नकारात्मक विचार एवं ऊर्जा दुखों को बढ़ावा देती है। नवरात्रि के तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा, घंटे के कंपन के समान मन की नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित कर भक्तों के भाग्य को समृद्ध करती हैं। चंद्र हमारी बदलती हुई भावनाओं, विचारों का प्रतीक है, घंटे का अभिप्राय मंदिर में स्थित घंटा एवं उसकी ध्वनि-कंपन से उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा है। अस्त-व्यस्त मानव मन, जो विभिन्न विचारों-भावों में उलझा रहता है, मां चंद्रघंटा की आराधना कर सांसारिक कष्टों से मुक्ति पाकर दैवीय चेतना का साक्षात्कार करता है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्द्धचंद्र है। इनके दस हाथ हैं, जिनमें एक हाथ में कमल का फूल, दूसरे में कमंडल, तीसरे में त्रिशूल, चौथे में गदा, पांचवें में तलवार, छठे में धनुष और सातवें में बाण है। शेष तीन हाथों में एक हाथ हृदय पर, एक आशीर्वाद मुद्रा में और एक अभय मुद्रा में रहता है। ये रत्न जड़ित आभूषण धारण करती हैं। गले में सफेद फूलों की माला रहती है।

चंद्रघंटा का वाहन बाघ है। देह धारियों में इस शक्ति रूप का स्थान मणिपुर चक्र है। साधक इसी मणिपूर चक्र में अपना ध्यान पहुंचाता है। मां चंद्रघंटा की कृपा से उसे अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और दिव्य ध्वनियां सुनाई देती हैं। इनका स्वरूप दानव, दैत्य, राक्षसों को कंपाने वाला तथा इनकी प्रचंड ध्वनि उनकी हिम्मत पस्त कर देने वाली होती है। इनकी चंद्र घंटे की ध्वनि बुरी शक्तियों को भागने पर मजबूर करती है। इसके विपरीत साधकों और भक्तों को इनका स्वरूप शांत और भव्य दिखाई देता है। इनकी आराधना से साधक में न केवल साहस और निर्भयता का, बल्कि सौम्यता और विनम्रता का भी विकास होता है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां के इस रूप को दूध या उससे बने पदार्थों का भोग लगाएं।

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चौथा स्वरूप मां कूष्मांडा - फोटो : amar ujala

मां कूष्मांडा देती हैं बुद्धि

साधना मंत्र : ऊँ देवी कूष्मांडायै नम:

पवित्र मन से नवरात्रि के चतुर्थ दिन मां कूष्मांडा की आराधना कर भक्तगण अपनी आंतरिक प्राणशक्ति को ऊर्जावान बनाते हैं। कूष्मांडा का अभिप्राय कद्दू से है। गोलाकार कद्दू मानव शरीर में स्थित प्राणशक्ति समेटे हुए है। एक पूर्ण गोलाकार वृत्त की भांति प्राणशक्ति दिन-रात भगवती की प्रेरणा से सभी जीव-जंतुओं का कल्याण करती है। कद्दू प्राणशक्ति, बुद्धिमत्ता और शक्ति की वृद्धि करता है। ‘कू’ का अर्थ है छोटा, उष्म का अर्थ है ऊर्जा और ‘अंडा’ का अर्थ है ब्रह्मांडीय गोला। धर्मग्रंथों में मिलने वाले वर्णन के अनुसार, अपनी मंद और हल्की-सी मुस्कान मात्र से अंड को उत्पन्न करने वाली होने के कारण इन्हें कूष्मांडा कहा गया है। जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, चारो ओर अंधकार ही अंधकार था, तब इन्हीं देवी ने महाशून्य में अपने मंद हास्य से उजाला करते हुए ‘अंड’ की उत्पत्ति की, जो कि बीज रूप में ब्रह्म तत्व के मिलने से ब्रह्मांड बना। इस प्रकार मां दुर्गा का यही अजन्मा और आद्यशक्ति रूप है। जीवों में इनका स्थान ‘अनाहत चक्र’ में माना गया है।

नवरात्रि के चौथे दिन योगीजन इसी चक्र में अपना ध्यान लगाते हैं। मां कूष्मांडा का निवास सूर्य लोक में है। उस लोक में निवास करने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके स्वरूप की कांति और तेज मंडल भी सूर्य के समान ही अतुलनीय है। मां कूष्मांडा अष्टभुजा देवी हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत कलश, चक्र तथा गदा है, जबकि आठवें हाथ में सर्वसिद्धि और सर्वनिधि देने वाली जप माला है। नवरात्रि के चौथे दिन मां के इस स्वरूप के सामने मालपुए का भोग लगाना चाहिए। उसके बाद इस प्रसाद को दान करें तथा स्वयं भी ग्रहण करें। ऐसा करने से भक्तों की बुद्धि का विकास होने के साथ-साथ निर्णय क्षमता भी बढ़ती है।

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पांचवां स्वरूप मां स्कंदमाता - फोटो : amar ujala

मां स्कंदमाता हैं ज्ञान का प्रतीक

साधना मंत्र : ऊँ देवी स्कंदमातायै नम:

नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की आराधना करने से भक्त अपने व्यवहारिक ज्ञान को कर्म में परिवर्तित करते हैं। मान्यताओं के अनुसार, देवी इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति का समागम हैं। जब ब्रह्मांड में व्याप्त शिव तत्व का मिलन इन त्रिशक्ति के साथ होता है, तो स्कंद का जन्म होता है। स्कंदमाता ज्ञान और क्रिया के स्रोत, आरंभ का प्रतीक मानी गई हैं। सही दिशा न होने के कारण ज्ञान और पुरुषार्थ भी विफल हो जाते हैं। मां स्कंदमाता की आराधना करने वालों को भगवती जीवन में सही दिशा में ज्ञान का उपयोग कर उचित कर्मों द्वारा सफलता, सिद्धि प्रदान करती हैं। योगीजन इस दिन विशुद्ध चक्र में अपना मन एकाग्र करते हैं। यही चक्र प्राणियों में स्कंदमाता का स्थान है। स्कंदमाता का विग्रह चार भुजाओं वाला है। ये अपनी गोद में भगवान स्कंद को बिठाए रखती हैं। दाहिनी ओर की ऊपर वाली भुजा से धनुष बाणधारी, छह मुखों वाले (षडानन) बाल रूप स्कंद को पकड़े रहती हैं, जबकि बाईं ओर की ऊपर वाली भुजा आशीर्वाद और वर प्रदाता मुद्रा में रखती हैं। नीचे वाली दोनों ओर की भुजाओं में माता कमल पुष्प रखती हैं। इनका वर्ण पूरी तरह निर्मल कांति वाला सफेद है।

ये कमलासन पर विराजती हैं। वाहन के रूप में इन्होंने सिंह को अपनाया है। कमलासन वाले इस रूप को पद्मासना भी कहा जाता है। यह वात्सल्य विग्रह है, अतः कोई शस्त्र ये धारण नहीं करतीं। इनकी कांति का अलौकिक प्रभामंडल इनके उपासक को भी मिलता है। इनकी उपासना से साधक को मृत्यु लोक में ही परम शांति और सुख मिलता है। उसकी कोई लौकिक कामना शेष नहीं रहती। नवरात्रि के पांचवें दिन मां को प्रसन्न करने के लिए भक्तों को केले का भोग लगाना चाहिए या फिर इसे प्रसाद के रूप में दान करना चाहिए, इससे परिवार में सुख-शांति का वास होता है।

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