हिंदू धर्म में हरतालिका तीज को महिलाओं के प्रमुख व्रतों में शामिल किया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना से व्रत रखती हैं। वहीं अविवाहित कन्याएं मनचाहा और योग्य जीवनसाथी पाने की इच्छा से माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना करती हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने स्वयं भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी पौराणिक प्रसंग से हरतालिका तीज की परंपरा जुड़ी मानी जाती है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की मिट्टी या रेत से प्रतिमा बनाकर पूजा करने की भी परंपरा है।
हरतालिका तीज में ‘हरतालिका’ नाम कैसे पड़ा? माता पार्वती की कथा से जुड़ा है राज
Hartalika Teej 2026: हरतालिका तीज का नाम माता पार्वती की उस पौराणिक कथा से जुड़ा है। आखिर ‘हरतालिका’ नाम कैसे पड़ा और इसका माता पार्वती व भगवान शिव से क्या संबंध है? जानें इस नाम के पीछे की पूरी कहानी।
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भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है तीज
हरतालिका तीज का पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। कई स्थानों पर महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं और दिनभर पूजा-पाठ, भजन तथा शिव-पार्वती का स्मरण करती हैं। हरतालिका तीज की पूजा में भगवान शिव और माता पार्वती के साथ गणेश जी की भी आराधना की जाती है। महिलाएं माता पार्वती को सुहाग की सामग्री और सोलह श्रृंगार अर्पित करती हैं।
आखिर 'हरतालिका' नाम क्यों पड़ा?
हरतालिका नाम अपने आप में इस पर्व की पौराणिक कथा को समेटे हुए है। कहा जाता है कि 'हरतालिका' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-'हरत' और 'आलिका'। 'हरत' का संबंध हरण या अपने साथ ले जाने से माना जाता है, जबकि 'आलिका' का अर्थ सखी या सहेली होता है। इस तरह 'हरतालिका' का भावार्थ हुआ-सखियों द्वारा माता पार्वती को अपने साथ ले जाना।
पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने का संकल्प ले चुकी थीं। लेकिन उनके पिता उनके विवाह के लिए भगवान विष्णु को उपयुक्त वर मान रहे थे। माता पार्वती अपनी इच्छा के विपरीत विवाह नहीं करना चाहती थीं। माता पार्वती की इस मनोकामना को उनकी सखियां जानती थीं। इसलिए उन्होंने पार्वती जी को ऐसी जगह ले जाकर रखा, जहां वह बिना किसी व्यवधान के भगवान शिव की आराधना और तपस्या कर सकें। इसी प्रसंग के कारण इस व्रत को हरतालिका कहा जाने लगा।
माता पार्वती ने की थी भगवान शिव को पाने के लिए तपस्या
पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए अपने पूर्व जन्म में हिमालय पर गंगा के किनारे कठोर तपस्या की थी। बचपन से ही उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में पाने का संकल्प ले लिया था। तपस्या के दौरान उन्होंने अन्न का त्याग कर दिया और लंबे समय तक केवल सूखे पत्तों का सेवन किया। बाद में कई वर्षों तक उन्होंने बिना अन्न-जल के, केवल वायु के सहारे तप किया। अपनी पुत्री की ऐसी कठिन तपस्या देखकर उनके पिता हिमालय बहुत चिंतित और दुखी रहते थे।
इसी समय एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से पार्वतीजी के विवाह का प्रस्ताव लेकर उनके पिता के पास पहुँचे। हिमालय ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। जब उन्होंने अपनी पुत्री को विवाह की बात बताई, तो माता पार्वती बहुत दुखी हुईं, क्योंकि उनका मन भगवान शिव को पति रूप में पाने का दृढ़ संकल्प कर चुका था।
पार्वतीजी ने अपनी एक सखी को अपनी इच्छा और तपस्या के बारे में बताया। सखी की सलाह पर वे घर छोड़कर घने जंगल में चली गईं और एक गुफा में भगवान शिव की आराधना में लीन हो गईं। उन्होंने पूरी श्रद्धा और निष्ठा से भगवान शिव की पूजा और कठोर तपस्या जारी रखी।
भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन हस्त नक्षत्र में माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग बनाया और भगवान शिव की आराधना करते हुए पूरी रात जागरण किया। उनकी कठिन तपस्या और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया।
माता पार्वती की इसी अटूट भक्ति और तपस्या की स्मृति में हरतालिका तीज का व्रत किया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा और विधि-विधान से करने वाली महिलाओं को मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त होता है। विवाहित महिलाएं भी अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और दांपत्य जीवन में प्रेम एवं खुशहाली बनाए रखने की कामना से यह व्रत करती हैं।
सुहागिनों और कुंवारी कन्याओं के लिए खास है यह व्रत
हरतालिका तीज को दांपत्य सुख और सौभाग्य से जुड़ा पर्व माना जाता है। सुहागिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करके अपने पति की दीर्घायु तथा वैवाहिक जीवन में सुख-शांति की प्रार्थना करती हैं। वहीं अविवाहित लड़कियां भी इस व्रत को श्रद्धा से रखती हैं। मान्यता है कि माता पार्वती की तरह भक्ति और निष्ठा से पूजा करने पर उन्हें मनचाहा एवं योग्य जीवनसाथी प्राप्त होने का आशीर्वाद मिल सकता है।