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Kajari Teej 2025: पति की लंबी आयु के लिए कजरी तीज पर करें ये सरल उपाय, पूरी होगी हर इच्छा

Thu, 07 Aug 2025 04:51 PM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: मेघा कुमारी Updated Thu, 07 Aug 2025 04:51 PM IST
सार

Kajari Teej 2025: इस साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि 11 अगस्त को सुबह 10 बजकर 33 मिनट पर शुरू होगी। इसका समापन अगले दिन यानी 12 अगस्त को सुबह 8 बजकर 40 मिनट पर है। 

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Kajari Teej 2025 - फोटो : adobe

Kajari Teej 2025: पंचांग के मुताबिक हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को कजरी तीज का पर्व मनाया जाता है। इस साल 12 अगस्त 2025 को कजरी तीज है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, तरक्की और सुखी प्रेम जीवन के लिए निर्जला उपवास रखती हैं। मान्यता है कि कजरी तीज पर भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करने से मनचाहा जीवनसाथी और रिश्तों में मिठास आती है। यही नहीं देवी पार्वती की कृपा भी सुहागिनों को प्राप्त होती हैं।



यह पर्व मुख्य रूप से उत्तर भारत के राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में मनाया जाता है। यहां सभी महिलाएं एकजुट होकर झूले पर झूलती हैं और कजरी गीत गाकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करती हैं। हिंदू धर्म में इसे प्रेम, विश्वास सांस्कृतिक परंपराओं और एकता का प्रतीक माना गया है। इस दिन पार्वती चालीसा का पाठ करने पर वैवाहिक जीवन में चल रही समस्याएं दूर और आपसी समझ बढ़ती हैं। ऐसे में आइए इस शक्तिशाली चालीसा के बारे में जानते हैं।

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Kajari Teej 2025 - फोटो : adobe

कजरी तीज 2025 तिथि
इस साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि 11 अगस्त को सुबह 10 बजकर 33 मिनट पर शुरू होगी। इसका समापन अगले दिन यानी 12 अगस्त को सुबह 8 बजकर 40 मिनट पर है। ऐसे में 12 अगस्त 2025 को कजरी तीज का पर्व मनाया जाएगा।

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Kajari Teej 2025 - फोटो : adobe

कजरी तीज पूजा मुहूर्त

  • ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:23 बजे से 5:06 बजे तक रहेगा।
  • विजय मुहूर्त दोपहर 2:38 बजे से 3:31 बजे तक है।
  • गोधूलि मुहूर्त शाम 7:03 बजे से 7:25 बजे तक होता है।
  • निशिता काल मुहूर्त रात 12:05 बजे से 12:48 बजे तक रहेगा।
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Kajari Teej 2025 - फोटो : adobe

पार्वती चालीसा


दोहा
जय गिरी तनये दक्षजे शम्भू प्रिये गुणखानि।
गणपति जननी पार्वती अम्बे! शक्ति! भवानि।

चौपाई
ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे, पंच बदन नित तुमको ध्यावे।
षड्मुख कहि न सकत यश तेरो, सहसबदन श्रम करत घनेरो।।

तेऊ पार न पावत माता, स्थित रक्षा लय हिय सजाता।
अधर प्रवाल सदृश अरुणारे, अति कमनीय नयन कजरारे।।


ललित ललाट विलेपित केशर, कुंकुंम अक्षत् शोभा मनहर।
कनक बसन कंचुकि सजाए, कटी मेखला दिव्य लहराए।।

कंठ मंदार हार की शोभा, जाहि देखि सहजहि मन लोभा।
बालारुण अनंत छबि धारी, आभूषण की शोभा प्यारी।।

नाना रत्न जड़ित सिंहासन, तापर राजति हरि चतुरानन।
इन्द्रादिक परिवार पूजित, जग मृग नाग यक्ष रव कूजित।।

गिर कैलास निवासिनी जय जय, कोटिक प्रभा विकासिनी जय जय।
त्रिभुवन सकल कुटुंब तिहारी, अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी।।

हैं महेश प्राणेश तुम्हारे, त्रिभुवन के जो नित रखवारे।
उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब, सुकृत पुरातन उदित भए तब।।

बूढ़ा बैल सवारी जिनकी, महिमा का गावे कोउ तिनकी।
सदा श्मशान बिहारी शंकर, आभूषण हैं भुजंग भयंकर।।

कण्ठ हलाहल को छबि छायी, नीलकण्ठ की पदवी पायी।
देव मगन के हित अस किन्हो, विष लै आपु तिनहि अमि दिन्हो।।

ताकी, तुम पत्नी छवि धारिणी, दुरित विदारिणी मंगल कारिणी।
देखि परम सौंदर्य तिहारो, त्रिभुवन चकित बनावन हारो।।

भय भीता सो माता गंगा, लज्जा मय है सलिल तरंगा।
सौत समान शम्भू पहआयी, विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी।।

तेहि कों कमल बदन मुरझायो, लखी सत्वर शिव शीश चढ़ायो।
नित्यानंद करी बरदायिनी, अभय भक्त कर नित अनपायिनी।।

अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनी, माहेश्वरी, हिमालय नन्दिनी।
काशी पुरी सदा मन भायी, सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी।।

भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री, कृपा प्रमोद सनेह विधात्री।
रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे, वाचा सिद्ध करि अवलम्बे।।

गौरी उमा शंकरी काली, अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली।
सब जन की ईश्वरी भगवती, पतिप्राणा परमेश्वरी सती।।

तुमने कठिन तपस्या कीनी, नारद सों जब शिक्षा लीनी।
अन्न न नीर न वायु अहारा, अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा।।

पत्र घास को खाद्य न भायउ, उमा नाम तब तुमने पायउ।
तप बिलोकी ऋषि सात पधारे, लगे डिगावन डिगी न हारे।।

तब तव जय जय जय उच्चारेउ, सप्तऋषि, निज गेह सिद्धारेउ।
सुर विधि विष्णु पास तब आए, वर देने के वचन सुनाए।।

मांगे उमा वर पति तुम तिनसों, चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों।
एवमस्तु कही ते दोऊ गए, सुफल मनोरथ तुमने लए।।

करि विवाह शिव सों भामा, पुनः कहाई हर की बामा।
जो पढ़िहै जन यह चालीसा, धन जन सुख देइहै तेहि ईसा।।

दोहा
कूटि चंद्रिका सुभग शिर, जयति जयति सुख खानि,
पार्वती निज भक्त हित, रहहु सदा वरदानि।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

 

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