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जितिया व्रत की कथा: पढ़ें जीमूतवाहन, चील-सियारिन और परीक्षित से जुड़ी 3 पौराणिक कहानियां

Fri, 02 Oct 2026 03:18 PM IST
ज्योति मेहरा धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: ज्योति मेहरा Updated Fri, 02 Oct 2026 03:18 PM IST
सार

जितिया व्रत संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना से रखा जाने वाला महत्वपूर्ण व्रत है। इस व्रत से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं मातृ प्रेम, त्याग और संतान की रक्षा का संदेश देती हैं। व्रत के दिन इसका पाठ करना शुभ माना चाता है।
 

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Jitiya Vrat Katha In Hindi jimutvahan katha chil siyarini Story jitiya vrat mahabharat
जितिया व्रत की कथा - फोटो : AI

जितिया व्रत को अलग-अलग क्षेत्रों में जिउतिया और जीवित्पुत्रिका व्रत के नाम से भी जाना जाता है। नाम भले ही अलग हों, लेकिन इस पर्व का भाव संतान की लंबी आयु, सुख, समृद्धि और सुरक्षा की कामना से जुड़ा है। वर्ष 2026 में जितिया व्रत 3 अक्तूबर, शनिवार को रखा जाएगा। इस दिन माताएं निर्जला उपवास करती हैं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने के साथ जितिया व्रत की कथा भी सुनती हैं। धार्मिक परंपरा में व्रत कथा का विशेष महत्व माना गया है, क्योंकि इसके माध्यम से व्रत से जुड़ी मान्यताओं और उसके पीछे छिपे त्याग, ममता तथा संतान-सुरक्षा के भाव को समझा जाता है।



जितिया से जुड़ी कई कथाएं अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित हैं। इनमें जीमूतवाहन और नागवंश की कथा, चील-सियारिन की लोककथा और महाभारत काल में अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित से जुड़ा प्रसंग प्रमुख हैं। इन सभी कथाओं में किसी न किसी रूप में संतान की रक्षा और जीवन के लिए किए गए त्याग का भाव दिखाई देता है। इन कथाओं का पाठ करने से या सुनने से पूजा सफल मानी जाती है। यहां पढ़ें जितिया व्रत कथा...

Jitiya Vrat Katha In Hindi jimutvahan katha chil siyarini Story jitiya vrat mahabharat
जीमूतवाहन और नागवंश की कथा - फोटो : AI

जीमूतवाहन और नागवंश की कथा

जितिया व्रत से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथाओं में गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन की कथा सुनाई जाती है। 

जीमूतवाहन के पिता जब वन में चले गए, तब उन्होंने राजपाट की जिम्मेदारी संभाली। वे स्वभाव से बेहद दयालु, करुणामय और प्रजाहितैषी थे। उनके शासन में प्रजा सुखी थी और वे हमेशा दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहते थे। कुछ समय बाद जीमूतवाहन ने भी सांसारिक सुख-सुविधाओं और राजसी जीवन का मोह छोड़ दिया। वे वन में रहने लगे। एक दिन वन में उनकी नजर एक वृद्ध नाग महिला पर पड़ी। वह बेहद परेशान और भयभीत थी। जीमूतवाहन ने उसके दुख का कारण जानना चाहा।

वृद्धा ने बताया कि नागवंश और पक्षीराज गरुड़ के बीच एक समझौता हुआ है। इसके अनुसार नागवंश की ओर से प्रतिदिन एक नाग गरुड़ के आहार के लिए भेजा जाता है। उस दिन उसके पुत्र की बारी थी। अपने बेटे को मृत्यु के मुंह में जाते देखकर वह मां बेहद व्याकुल थी। जीमूतवाहन का हृदय यह सुनकर द्रवित हो गया। उन्होंने वृद्धा को सांत्वना देते हुए कहा कि उसे अपने पुत्र की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उसके बेटे की जगह वे स्वयं गरुड़ के सामने जाएंगे।

निर्धारित समय आने पर जीमूतवाहन ने लाल वस्त्र धारण किया और उस स्थान पर पहुंच गए, जहां गरुड़ अपना आहार लेने आते थे। कुछ ही देर में पक्षीराज गरुड़ वहां पहुंचे और उन्होंने जीमूतवाहन को अपने पंजों में पकड़कर आकाश की ओर उड़ान भर दी।

गरुड़ के पंजों से घायल होने के बावजूद जीमूतवाहन ने अपना परिचय और वहां आने का कारण बताया। जब गरुड़ को पता चला कि उन्होंने एक नागपुत्र की जान बचाने के लिए स्वयं को उनके सामने प्रस्तुत किया है, तो वे उनके त्याग और करुणा से प्रभावित हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को मुक्त कर दिया और आगे से नागों को अपना आहार न बनाने का वचन दिया।

इस प्रकार जीमूतवाहन ने अपने प्राणों की चिंता किए बिना नागवंश की रक्षा की। उनके इसी त्याग को जितिया की धार्मिक परंपरा में संतान की सुरक्षा और मातृत्व की भावना से जोड़ा जाता है।

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चील और सियारिन की लोककथा - फोटो : AI

चील और सियारिन की लोककथा
जितिया से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा चील और सियारिन की है। 

कहा जाता है कि एक जंगल में चील और सियारिन रहती थीं। दोनों में गहरी मित्रता थी और वे एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ रहती थीं। एक दिन कुछ महिलाएं जंगल से गुजर रही थीं और आपस में जीवित्पुत्रिका व्रत की चर्चा कर रही थीं। चील को इस व्रत के बारे में जानने की उत्सुकता हुई। उसने महिलाओं से व्रत का विधान और महत्व पूछा। महिलाओं ने उसे बताया कि यह व्रत संतान की लंबी आयु और कल्याण की कामना से किया जाता है।

चील ने लौटकर अपनी सखी सियारिन को भी इसकी जानकारी दी। दोनों ने व्रत रखने का निश्चय किया और पूरे श्रद्धाभाव से उपवास तथा पूजा शुरू की। लेकिन व्रत के दौरान सियारिन को तेज भूख लगने लगी। वह अपनी भूख पर नियंत्रण नहीं रख सकी और उसने व्रत का नियम तोड़ दिया। दूसरी ओर चील ने पूरी निष्ठा से व्रत पूरा किया।

लोककथा के अनुसार, अगले जन्म में दोनों ने एक राजा के घर बहनों के रूप में जन्म लिया। चील का विवाह मंत्री के पुत्र से हुआ, जबकि सियारिन का विवाह राजकुमार से हुआ। समय बीतने पर सियारिन को एक पुत्र हुआ, लेकिन कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई। वहीं चील के घर जन्मा पुत्र स्वस्थ और जीवित रहा। अपनी बहन के बच्चे को सुरक्षित देखकर सियारिन के मन में ईर्ष्या उत्पन्न होने लगी। उसने चील के परिवार को नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी की, लेकिन उसके प्रयास सफल नहीं हुए।

एक दिन उसे स्वप्न में देवी के दर्शन हुए। उसे बताया गया कि वर्तमान दुख उसके पूर्व कर्मों से जुड़े हैं और यदि वह अपने जीवन में सुधार चाहती है तो श्रद्धापूर्वक जितिया व्रत और उपासना करे।

सुबह उठकर सियारिन ने अपने पति को स्वप्न की पूरी बात बताई। पति ने उसे अपनी बहन से किए गए व्यवहार के लिए क्षमा मांगने और विधि-विधान से जितिया व्रत करने की सलाह दी। सियारिन अपनी बहन चील के पास गई और अपने व्यवहार के लिए माफी मांगी। चील ने उसके पछतावे को देखते हुए उसे क्षमा कर दिया।

अगले वर्ष दोनों बहनों ने साथ मिलकर जितिया व्रत किया। कथा के अनुसार, व्रत और उपासना से प्रसन्न होकर देवी ने सियारिन को संतान सुख का आशीर्वाद दिया। कुछ समय बाद उसके घर एक स्वस्थ पुत्र का जन्म हुआ। इसके बाद दोनों बहनों के बीच फिर से प्रेम और स्नेह का संबंध स्थापित हो गया।

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महाभारत काल से जुड़ी कथा - फोटो : AI

महाभारत काल से जुड़ी कथा
जितिया व्रत से जुड़ा एक अन्य प्रसंग महाभारत काल से जोड़ा जाता है। 

युद्ध के बाद अश्वत्थामा ने प्रतिशोध की भावना में पांडवों के शिविर में प्रवेश किया। वहां उसने सो रहे द्रौपदी के पांच पुत्रों का वध कर दिया। बाद में अर्जुन ने उसका पीछा किया और उसकी दिव्य मणि छीन ली।

प्रतिशोध की आग में अश्वत्थामा ने अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु को भी नष्ट करने का प्रयास किया। उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। इस घटना से अजन्मे बालक का जीवन संकट में पड़ गया।

कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से उस अजन्मे शिशु की रक्षा की और उसे जीवन प्रदान किया। यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसके गर्भ में ही संकट से बचाए जाने और जीवन प्राप्त करने के प्रसंग को जीवित पुत्र की रक्षा की भावना से जोड़कर देखा जाता है।

इसी वजह से जीवित्पुत्रिका व्रत को संतान की दीर्घायु और रक्षा की कामना से जुड़ा पर्व माना जाता है। जितिया की विभिन्न कथाएं भले अलग-अलग प्रसंगों पर आधारित हों, लेकिन इनके केंद्र में संतान के प्रति ममता, त्याग, रक्षा और सुखी जीवन की कामना का भाव समान रूप से दिखाई देता है। व्रत के दिन इन कथाओं का श्रवण इसी धार्मिक भावना को स्मरण करने की परंपरा का हिस्सा माना जाता है।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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