Jitiya 2025: जीवित्पुत्रिका व्रत को मातृशक्ति की अटूट आस्था, त्याग और संकल्प का पर्व माना जाता है। यह व्रत संतान की लंबी उम्र और मंगलमय जीवन की कामना के लिए किया जाता है। इसे जितिया पर्व भी कहा जाता है, जिसमें मां अपने पुत्र की सुरक्षा और सुख-समृद्धि के लिए निर्जला उपवास रखती हैं। इस वर्ष यह पर्व रविवार, 14 सितंबर को मनाया जाएगा। इससे एक दिन पहले दिन नहाय-खाय की परंपरा निभाई जाती है, जिसके साथ इस व्रत की शुरुआत होती है।
Jitiya Vrat 2025: जितिया व्रत आज, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त से लेकर मंत्र और आरती
इस वर्ष यह पर्व रविवार, 14 सितंबर को मनाया जाएगा। इससे एक दिन पहले दिन नहाय-खाय की परंपरा निभाई जाती है, जिसके साथ इस व्रत की शुरुआत होती है। ऐसे में आइए जानते हैं जितिया व्रत की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, पूजा सामग्री से लेकर मंत्र, कथा और आरती तक संपूर्ण जानकारी।
जितिया पूजा सामग्री सूची
जितिया व्रत की पूजा के लिए कुछ विशेष सामग्रियों की आवश्यकता होती है। इसमें जीमूतवाहन की प्रतिमा बनाने के लिए कुश, चील और सियारिन की आकृति बनाने के लिए गाय का गोबर, अक्षत, पेड़ा और अन्य मिठाई, दूर्वा की माला, श्रृंगार का सामान, सिंदूर, पुष्प, पान और सुपारी, लौंग, इलायची, फल और फूल, गांठ वाला धागा, धूप, दीप, बांस के पत्ते, सरसों का तेल शामिल है।
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जितिया व्रत पूजा विधि
- इस दिन महिलाएं प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं।
- सूर्य भगवान को स्नान कराकर उन्हें अर्घ्य अर्पित किया जाता है।
- भगवान के समक्ष दीपक और धूप जलाकर प्रसाद अर्पित करें।
- इसके बाद गोबर और मिट्टी से चील व सियारिन की प्रतिमा तथा कुश से जीमूतवाहन की प्रतिमा तैयार करें।
- इन प्रतिमाओं को धूप, दीप, चावल, फूल आदि से पूजन करें।
- शुभ मुहूर्त में कथा सुनना अनिवार्य माना जाता है।
- पूजा संपन्न होने पर आरती कर प्रसाद बांटें।
- अगले दिन पारण करने के बाद दान-दक्षिणा अवश्य दें।
जितिया पूजा मुहूर्त 2025
ब्रह्म मुहूर्त 04:33 ए एम से 05:19 ए एम
प्रातः संध्या 04:56 ए एम से 06:05 ए एम
अभिजित मुहूर्त 11:52 ए एम से 12:41 पी एम
विजय मुहूर्त 02:20 पी एम से 03:09 पी एम
गोधूलि मुहूर्त 06:27 पी एम से 06:51 पी एम
सायाह्न सन्ध्या 06:27 पी एम से 07:37 पी एम
जितिया व्रत मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते,
देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः
पौराणिक कथा
जितिया व्रत की मुख्य कथा चील और सियारिन से जुड़ी है। मान्यता है कि चील ने पूरे नियम और श्रद्धा से यह व्रत किया, जबकि सियारिन ने छल किया। अगले जन्म में चील शीलावती और सियारिन कर्पूरावतिका बनीं। शीलावती को व्रत के पुण्य से सात पुत्र प्राप्त हुए, जबकि कर्पूरा को संतान सुख नहीं मिला। बाद में भगवान जीमूतवाहन की कृपा और इस व्रत के प्रभाव से कर्पूरा को भी संतान की प्राप्ति हुई। तभी से इस व्रत का महत्व और भी बढ़ गया।