Golden Well in Jagannath Temple: ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को मंदिर के गर्भगृह से बाहर लाकर भक्तों को दर्शन कराया जाता है। इस पावन अवसर को स्नान यात्रा या पूर्णिमा स्नान कहा जाता है। इस दिन भगवान का विशेष जलाभिषेक होता है, जिसमें उन्हें 108 कलशों के जल से स्नान कराया जाता है। ये जल किसी साधारण स्रोत से नहीं, बल्कि मंदिर परिसर में स्थित ‘सोने के कुएं’ से लिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस कुएं में देशभर के पवित्र तीर्थों का जल समाहित होता है।
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पूरे वर्ष में केवल इसी दिन भगवान को इस जल से स्नान कराना परंपरा में शामिल है। यह उत्सव न केवल भगवान की पवित्रता का प्रतीक है, बल्कि भक्तों के लिए एक दुर्लभ और दिव्य दर्शन का अवसर भी होता है। आइये जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।
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Jagannath Temple Secrets
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क्यों खास है जगन्नाथ मंदिर का यह रहस्यमयी कुआं?
पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर के प्रांगण में स्थित एक प्राचीन और विशाल कुआं सदियों से भक्तों और विद्वानों के लिए रहस्य का विषय बना हुआ है। इस कुएं का निर्माण कब और किसने कराया इसका कोई ठोस प्रमाण आज तक सामने नहीं आया है। लेकिन इसकी विशालता खुद इसकी महत्ता को बयां करती है। कुएं के ऊपर लोहे और सीमेंट से बना एक विशाल ढक्कन लगा है, जिसका वजन करीब 1.5 से 2 टन है। इस ढक्कन को खोलने के लिए एक या दो नहीं, बल्कि 12 से 15 सेवकों की जरूरत पड़ती है। यह ढक्कन सालभर बंद रहता है और सिर्फ विशेष अवसरों पर ही हटाया जाता है, जैसे आषाढ़ पूर्णिमा के दिन।
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- फोटो : एएनआई
क्यों कहा जाता है इसे सोने का कुआं?
इस कुएं को सोने का कुआं यूं ही नहीं कहा जाता। मान्यता है कि पांड्य वंश के राजा इंद्रद्युम्न ने कुएं की भीतरी दीवारों पर सोने की ईंटें लगवाई थीं। जब ढक्कन खोला जाता है, तो आज भी ये सोने की ईंटें भीतर की दीवारों पर चमकती हुई नजर आती हैं। समय के साथ, यह परंपरा बन गई कि श्रद्धालु कुएं में सोने की वस्तुएं अर्पित करने लगे। ढक्कन में बने एक छोटे छेद से लोग सोने की चूड़ियां, सिक्के या अन्य आभूषण कुएं में डालते हैं। आज तक इस कुएं को खोदकर या खाली करके यह जानने की कोशिश नहीं की गई कि इसमें कितना सोना जमा हुआ है और शायद यही इसकी सबसे बड़ी रहस्यमयी बात है।
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- फोटो : Adobe Stock
साल में केवल एक बार खुलता है यह कुआं
यह पवित्र कुआं साल में सिर्फ एक बार, आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन खोला जाता है, जिसे देव स्नान पूर्णिमा कहा जाता है। इसी दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी का विशेष जलाभिषेक इसी कुएं के जल से किया जाता है। इस कुएं की निगरानी के लिए मंदिर प्रशासन ने एक विशेष व्यक्ति की नियुक्ति की होती है जिसे "सुना गोसाईं" कहा जाता है। कुएं का आकार लगभग 4 से 5 फीट चौड़ा है और इसे खोलने की प्रक्रिया बेहद सावधानी और नियमों के साथ की जाती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।