होली भारतीय परंपरा में आनंद का उत्सव कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। यह पर्व वातावरण में मौजमस्ती और हर्षोल्लास का रंग भर देता है। वसंत ऋतु की विदाई का यह त्योहार असलियत में जीवन की नीरसता दूर कर उसमें मधुरता घोल देता है। इस समय प्रकृति नई-नवेली दुल्हन की तरह खिल उठती है।
ब्रह्म को सच्चिदानंद भी कहा गया है, क्योंकि वह आनंद से सदा परिपूर्ण हंै। शिव का तांडव नृत्य भले ही अधिक प्रसिद्ध है, लेकिन वे मस्ती और आनंद व्यक्त करते हैं, तो उनका नृत्य लास्य बन जाता है। लास्य अर्थात आनंद से परिपूर्ण। नृत्य स्वयं आनंद है। होली पर्व सनातन जीवन दर्शन का सक्रिय रूप है, उस आनंद की पूर्णता है। होली जितना आनंद शायद ही किसी अन्य पर्व में है। इस त्योहार में आने वाले का स्वागत होता है और जाने वाले का शोक मनाया जाता है। इस पर्व की खासियत यह है कि आने वाले के साथ-साथ जाने वाले को भी हर्षोल्लास के साथ विदा किया जाता है।
सोचिए! यदि जन्म उल्लास का आधार है, तो फिर मृत्यु शोक का कारण कैसे और क्यों हुआ? मृत्यु के कारण ही तो जन्म होता है। यदि पतझड़ में पत्ते झड़ेंगे नहीं, तो वृक्ष पर नए पत्ते आएंगे कहां से? यही है होली का तत्वदर्शन। प्रकृति का मनुष्य से गहरा संबंध है। कारण है कि जिन पंचभूतों (आकाश, पृथ्वी, पवन, अग्रि और जल) से प्रकृति बनी है, उन्हीं पंच-तत्वों से मानवी काया का सृजन हुआ है। यह बात विज्ञान भी मानता है।
प्रकृति का बदलाव मनुष्य की प्रवृत्ति को भी बदल देता है। फागुनी प्रकृति जब रंगों की छटा बिखेरती है, तो होली के विभिन्न रंग जन-जीवन में अवतरित होते हैं। जन-जीवन में ही नहीं, प्रकृति परिकर के हर क्षेत्र में महारास शुरू हो जाता है। टेसू और सेमल के गहरे लाल पीले रंग फूलों की रूपमाधुरी और उनकी सुगंध माहौल में लव्यापने लगती है, उन पर भंवरे और तितलियां मंडराते दिखाई देते हैं।
खेतों में सरसों के पीले फूलों से प्रकृति भी सुंदर और मादक दिखाई देती है। सौंदर्य और मादकता का यह संगम पूरे जगत को मोहित करने लगता है। इसे हम ऋतुराग भी कहते हैं, क्योंकि नृत्य और गान के बिना होली पूरी होती ही नहीं। फिर जहां नृत्य, संगीत और गान होगा, वहां उल्लास तो होगा ही। वसंत ऋतु का मदमस्त मौसम मानव मन में सहज ही कामनाएं उद्दीप्त कर देता है। होली वस्तुत: मलिनताओं के दहन और तमस को जलाने का महाअनुष्ठान है। यह प्रेम की वह रसधारा है, जिसमें समूचा समाज एक साथ भीगकर अपने अंतस के कलुष को धोता है। इस पर्व के राग, रंग, हंसी, ठिठोली, लय, चुहल, आनंद और मस्ती से सामाजिक विषमताएं टूटती हैं और वर्जनाओं से मुक्ति मिलती है।