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Sawan 2023: इस पंचमुखी शिवलिंग के दर्शन करने से होती है कुटुंब में वृद्धि, समुद्र मंथन से जुड़ा है इतिहास
Fri, 21 Jul 2023 07:43 AM IST
अंकिता विश्वकर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
Published by: अंकिता विश्वकर्मा
Updated Fri, 21 Jul 2023 07:43 AM IST
सार
Sawan 2023: इस पंचमुखी शिवलिंग के दर्शन करने से होती है कुटुंब में वृद्धि, समुद्र मंथन से जुड़ा है इतिहास
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मंदिर में विराजित है पंचमुखी शिवलिंग
- फोटो : अमर उजाला
क्या किसी शिव मंदिर में दर्शन करने से कुटुंब में वृद्धि हो सकती है अगर आपका जवाब ना में है तो आज हम आपको उज्जैन के सिंहपुरी क्षेत्र में विराजित ऐसे शिव मंदिर की महिमा बता रहे हैं, जो कि अतिप्राचीन होने के साथ ही चमत्कारी भी हैं। वैसे तो वर्ष भर श्रद्धालु इस मंदिर में पहुंचकर भगवान का पूजन अर्चन और दर्शन करते हैं लेकिन इन दिनों विशेष रूप से श्रावण मास में 84 महादेव की यात्रा करने वाले श्रद्धालु भगवान का पूजन अर्चन कर उनका आशीर्वाद लेने यहां पहुंच रहे हैं।
मंदिर में विराजित हैं कई चमत्कारी मूर्तियां
- फोटो : अमर उजाला
मंदिर में विराजमान हैं चमत्कारी मूर्तियां
मंदिर में अष्ट भैरव में से एक असितागनसित भैरव, श्री सिद्धि विनायक गणेश, भद्रकाली माता के साथ ही शंकराचार्य जी की प्रतिमा भी स्थापित है। चूंकि यह मंदिर अति प्राचीन है इसीलिए चार पुराने खंभों के नीचे नंदी जी की प्रतिमा भी विराजमान है।
श्री कुटुम्बेश्वर महादेव की पौराणिक कथा
श्री कुटुम्बेश्वर महादेव की स्थापना की कथा महादेव के करुणामय मन एवं क्षिप्रा मैया की कर्तव्य परायणता दशार्ती है। करुणामय भगवान शिव ने सृष्टि को विष के भयानक दुष्प्रभाव से बचाने के लिए स्वयं उस विष को धारण कर लिया। क्षिप्रा मां ने शिव की आज्ञा के उपरांत बिना विष के दुष्प्रभाव का विचार किए कर्तव्य परायणता का अद्भुत परिचय दिया।
मंदिर में अष्ट भैरव में से एक असितागनसित भैरव, श्री सिद्धि विनायक गणेश, भद्रकाली माता के साथ ही शंकराचार्य जी की प्रतिमा भी स्थापित है। चूंकि यह मंदिर अति प्राचीन है इसीलिए चार पुराने खंभों के नीचे नंदी जी की प्रतिमा भी विराजमान है।
श्री कुटुम्बेश्वर महादेव की पौराणिक कथा
श्री कुटुम्बेश्वर महादेव की स्थापना की कथा महादेव के करुणामय मन एवं क्षिप्रा मैया की कर्तव्य परायणता दशार्ती है। करुणामय भगवान शिव ने सृष्टि को विष के भयानक दुष्प्रभाव से बचाने के लिए स्वयं उस विष को धारण कर लिया। क्षिप्रा मां ने शिव की आज्ञा के उपरांत बिना विष के दुष्प्रभाव का विचार किए कर्तव्य परायणता का अद्भुत परिचय दिया।
समुद्र मंथन से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
- फोटो : अमर उजाला
ऐसे पड़ा कुटुम्बेश्वर महादेव नाम
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार देवों और देवताओं ने मिलकर समुद्र मंथन किया, जिसके फलस्वरूप समुद्र में से कई बहुमूल्य वस्तुओं के अलावा विष भी उत्पन्न हुआ। विष की ज्वाला से देवताओं, असुरों के अलावा यक्षगण भी भयभीत हो महादेव की शरण में पहुंचे। उन सभी ने मिलकर महादेव के समक्ष यह प्रार्थना की कि महादेव हमने अमरत्व प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया था लेकिन यहां तो विष उत्पन्न हो गया। कृपया हमारी रक्षा करें। देवताओं की व्यथा सुन भगवान शंकर ने मोर का रूप धारण कर उस विष को अपने गले में धारण कर लिया। लेकिन वह विष इतना प्रचंड था कि भगवान शंकर भी व्यथित हो गए। उन्होंने गंगा नदी से कहा कि तुम इस विष को ले जाकर समुद्र में प्रवाहित कर दो। परन्तु गंगा ने असमर्थता जता दी। तब शिवजी ने यमुना, सरस्वती आदि नदियों से भी उपर्युक्त प्रार्थना की लेकिन इन नदियों ने भी असमर्थता जता दी। अंतत: शिवजी ने क्षिप्रा नदी से विनय किया कि तुम इस विष को ले जाकर महाकाल वन में स्थित कामेश्वर के सामने वाले लिंग में स्थापित कर दो महादेव की आज्ञा पर क्षिप्रा नदी उस विष को ले गई और महाकाल वन स्थित उस लिंग पर विष को स्थापित कर दिया। विष के प्रभाव से वह लिंग विषमयी हो गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि जो भी प्राणी उसका दर्शन करता वह मृत्यु को प्राप्त हो जाता। एक बार वहां कुछ ब्राह्मण तीर्थ यात्रा करने आए। उन्होंने उस लिंग के दर्शन किए और वे भी मृत्यु को प्राप्त हो गए। तब तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। महादेव को जब ये पता चला तो वे ब्राह्मणों के पास गए और अपनी दिव्य दृष्टि से उन्हें जीवित कर दिया। तब उन ब्राह्मणों ने महादेव से विनय की कि हे देवाधिदेव महादेव, इस लिंग के दर्शन से लोग मृत्यु को प्राप्त होते हैं, कृपया इस दोष का निवारण करें। तब भगवान शिवजी ने कहा कि जल्दी ही ब्राह्मण लकुलीश वंश के लोग यहां आएंगे, उसके बाद यह लिंग स्पर्श योग्य एवं पूजनीय हो जाएगा और जो भी यहां दर्शन करने आएगा उसके कुटुंब की वृद्धि होगी और यह कुटुम्बेश्वर के नाम से जाना जाएगा। तत्पश्चात लकुलीश वंश के ब्राह्मण वहां आए और भगवान शिव का स्मरण कर उन्होंने उस लिंग का पूजन अर्चन किया, जिसके बाद वह लिंग विष के प्रभाव से मुक्त हो गया। तभी से यह शिवलिंग कुटुम्बेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार देवों और देवताओं ने मिलकर समुद्र मंथन किया, जिसके फलस्वरूप समुद्र में से कई बहुमूल्य वस्तुओं के अलावा विष भी उत्पन्न हुआ। विष की ज्वाला से देवताओं, असुरों के अलावा यक्षगण भी भयभीत हो महादेव की शरण में पहुंचे। उन सभी ने मिलकर महादेव के समक्ष यह प्रार्थना की कि महादेव हमने अमरत्व प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया था लेकिन यहां तो विष उत्पन्न हो गया। कृपया हमारी रक्षा करें। देवताओं की व्यथा सुन भगवान शंकर ने मोर का रूप धारण कर उस विष को अपने गले में धारण कर लिया। लेकिन वह विष इतना प्रचंड था कि भगवान शंकर भी व्यथित हो गए। उन्होंने गंगा नदी से कहा कि तुम इस विष को ले जाकर समुद्र में प्रवाहित कर दो। परन्तु गंगा ने असमर्थता जता दी। तब शिवजी ने यमुना, सरस्वती आदि नदियों से भी उपर्युक्त प्रार्थना की लेकिन इन नदियों ने भी असमर्थता जता दी। अंतत: शिवजी ने क्षिप्रा नदी से विनय किया कि तुम इस विष को ले जाकर महाकाल वन में स्थित कामेश्वर के सामने वाले लिंग में स्थापित कर दो महादेव की आज्ञा पर क्षिप्रा नदी उस विष को ले गई और महाकाल वन स्थित उस लिंग पर विष को स्थापित कर दिया। विष के प्रभाव से वह लिंग विषमयी हो गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि जो भी प्राणी उसका दर्शन करता वह मृत्यु को प्राप्त हो जाता। एक बार वहां कुछ ब्राह्मण तीर्थ यात्रा करने आए। उन्होंने उस लिंग के दर्शन किए और वे भी मृत्यु को प्राप्त हो गए। तब तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। महादेव को जब ये पता चला तो वे ब्राह्मणों के पास गए और अपनी दिव्य दृष्टि से उन्हें जीवित कर दिया। तब उन ब्राह्मणों ने महादेव से विनय की कि हे देवाधिदेव महादेव, इस लिंग के दर्शन से लोग मृत्यु को प्राप्त होते हैं, कृपया इस दोष का निवारण करें। तब भगवान शिवजी ने कहा कि जल्दी ही ब्राह्मण लकुलीश वंश के लोग यहां आएंगे, उसके बाद यह लिंग स्पर्श योग्य एवं पूजनीय हो जाएगा और जो भी यहां दर्शन करने आएगा उसके कुटुंब की वृद्धि होगी और यह कुटुम्बेश्वर के नाम से जाना जाएगा। तत्पश्चात लकुलीश वंश के ब्राह्मण वहां आए और भगवान शिव का स्मरण कर उन्होंने उस लिंग का पूजन अर्चन किया, जिसके बाद वह लिंग विष के प्रभाव से मुक्त हो गया। तभी से यह शिवलिंग कुटुम्बेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
