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Navratri Special: उज्जैन में ‘भूखी माता’ को चढ़ती है मदिरा, विक्रमादित्य ने बंद कराई थी यहां नरबलि

Sat, 25 Mar 2023 04:32 PM IST
रवींद्र भजनी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन Published by: रवींद्र भजनी Updated Sat, 25 Mar 2023 04:32 PM IST
सार

उज्जैन में भूखी माता मंदिर नाम से अलग तो है ही, इसकी कहानी भी हटकर है। नाम से ही नहीं, बल्कि इस माता की भूख भी अलग है। पहले यहां नरबलि चढ़ाई जाती थी। अब नवरात्र में अष्टमी पर मदिरा चढ़ती है। 
 

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Alcohol is offered to 'Bhukhi Mata' Temple in Ujjain, Vikramaditya had stopped human sacrifice here
भूखी माता के मंदिर में विराजित देवियां। - फोटो : अमर उजाला

मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में शिप्रा नदी के किनारे भूखी माता का बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। दरअसल, इस मंदिर मे दो देवियां विराजमान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि यह दोनों बहने हैं। इनमें से एक को भूखी माता और दूसरी को धूमावती के नाम से जाना जाता है। 



इस मंदिर को भुवनेश्वरी भूखी माता मंदिर भी कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार, कहा जाता है कि आज भी उस मंदिर में पशु बलि देने की प्रथा सदियों से चली आ रही है। दरअसल, उज्जैन के इस मंदिर में आकर अपने हाथों से शाकाहारी भोजन बनाकर माता को भोग लगाने से देवी प्रसन्न होती है। इस मंदिर में दो दीपस्तंभ भी हैं, जिन पर हर साल नवरात्र मे दीप प्रज्जवलित किए जाते हैं। नवरात्र में अष्टमी की पूजा के बाद माता को मदिरा का भोग लगता है। 
 

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भूखी माता का मंदिर। - फोटो : अमर उजाला
जानिए क्या है पौराणिक कथा
कहते हैं भूखी माता को प्रतिदिन एक युवक की बलि दी जाती थी। एक बार दुखी मां राजा विक्रमादित्य के पास गई। उसके बेटे की बलि चढ़ाई जानी थी। तब विक्रमादित्य ने माता से नरबलि नहीं लेने का आग्रह किया। यह भी कहा कि यदि देवी ने उनकी बात नहीं मानी तो वे खुद उनका आहार बनेंगे। बुढ़िया के जाने के बाद विक्रमादित्य ने कई तरह के पकवान बनवाने का आदेश दिया। इन पकवानों से पूरे शहर को सजा दिया गया। एक तख्त पर मिठाइयों के साथ मिठाइयों से बना एक मानव पुतला लिटा दिया। विक्रमादित्य खुद उसके नीचे छिप गए। रात को सभी देवियों ने पकवानों का स्वाद लिया। जब जा रही थी, तब एक देवी ने जानना चाहा कि आखिर तख्त पर क्या रखा है। देवी ने वहां रखे पुतले को खा लिया। देवी खुश हो गई। इतने में विक्रमादित्य आए और हाथ जोड़कर बताया कि उन्होंने ही इसे रखवाया है। देवी ने वरदान मांगने को कहा। तब विक्रमादित्य ने कहा कि कृपा कर आप नदी के उस पार विराजमान रहें। देवी ने कहा कि तुम्हारे वचन का पालन होगा। उस देवी का नाम भूखी माता रख दिया गया। इसके बाद विक्रमादित्य ने नदी के उस पार मंदिर बनवाया। इसके बाद देवी ने कभी नरबलि नहीं ली। 


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अष्टमी पर देवी को मदिरा चढ़ाई जाती है। - फोटो : अमर उजाला
अब पशुओं की दी जाती है बलि
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, मंदिर में अब इंसान की बलि नहीं दी जाती है। पशुओं की बलि दी जाती है। ऐसे में ग्रामीण इलाकों के लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर यहां आकर बलि प्रथा का निर्वाहन करते हैं। कई लोग पशु क्रूरता अधिनियम के तहत बलि नहीं देते और पशुओं का अंग-भंग कर मंदिर में ही छोड़ देते हैं।
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