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ओंकारेश्वर: भारत स्वस्तिक रामकथा यात्रा का ओंकारेश्वर में छठा पड़ाव, मोरारी बापू ने एकात्म धाम में किए दर्शन
Thu, 15 Oct 2026 06:25 PM IST
दिनेश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ओंकारेश्वर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ओंकारेश्वर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Thu, 15 Oct 2026 06:25 PM IST
सार
मोरारी बापू की भारत स्वस्तिक रामकथा यात्रा गुरुवार को ओंकारेश्वर पहुंची। यह यात्रा का छठा पड़ाव रहा। बापू ने ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग, ममलेश्वर मंदिर और एकात्म धाम में दर्शन किए। कथा में आध्यात्मिक एकता, सनातन संस्कृति और रामचरितमानस का संदेश दिया। उन्होंने 2028 में दोबारा ओंकारेश्वर में कथा करने की घोषणा की।
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ओंकारेश्वर पहुंचे मोरारी बापू
- फोटो : अमर उजाला
तमिलनाडु के कन्याकुमारी से शुरू हुई प्रसिद्ध मानस मर्मज्ञ एवं कथावाचक मोरारी बापू की ‘भारत स्वस्तिक रामकथा यात्रा’ गुरुवार को तीर्थनगरी ओंकारेश्वर पहुंची। आध्यात्मिक चेतना, राष्ट्रीय एकता, सनातन संस्कृति के संरक्षण और सर्वकल्याण की भावना से निकली इस यात्रा का ओंकारेश्वर छठा पड़ाव रहा। यहां मोरारी बापू ने भगवान ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन एवं पूजन के साथ ममलेश्वर मंदिर में जलाभिषेक किया। इसके बाद उन्होंने ओंकार पर्वत स्थित आदि गुरु शंकराचार्य की 108 फीट ऊंची ‘एकात्मता की प्रतिमा’ के दर्शन किए।
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ओंकारेश्वर में मोरारी बापू की कथा
- फोटो : अमर उजाला
शंकराचार्य ने भारत को एकता के सूत्र में बांधा
मोरारी बापू ने कहा कि आदि गुरु शंकराचार्य ने बाल्यावस्था में ही ओंकारेश्वर की ज्ञानभूमि पर आकर तपस्यारत गोविंदपादाचार्य से दीक्षा प्राप्त की और संन्यास ग्रहण किया। उन्होंने यहां वेद-पुराणों का अध्ययन किया तथा नर्मदाष्टक सहित अनेक स्तोत्रों की रचना की। इसके बाद वे ओंकारेश्वर से महिष्मती नगरी पहुंचे, जिसे आज महेश्वर के नाम से जाना जाता है, जहां उन्होंने विद्वान मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ किया। बाद में मंडन मिश्र भी उनके साथ सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए निकल पड़े। आदि शंकराचार्य ने देशभर में भ्रमण कर चार पीठों की स्थापना की और भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक एकता को मजबूत करने का कार्य किया। एकात्म धाम परियोजना के प्रथम चरण में आचार्य शंकर की 108 फीट ऊंची बहुधातु प्रतिमा स्थापित की जा चुकी है। परियोजना के अगले चरण में लगभग 2400 करोड़ रुपये की लागत से ‘अद्वैत लोक’ संग्रहालय सहित विभिन्न कार्य प्रस्तावित हैं।
ॐ निराकार है, स्वस्तिक साकार है
अभय घाट पर आयोजित कथा एवं प्रवचन में मोरारी बापू ने ‘ॐ’ और स्वस्तिक के आध्यात्मिक महत्व पर भी विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि “ॐ निराकार है और स्वस्तिक साकार है, दोनों एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं।” उन्होंने नाद की विभिन्न अनुभूतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रकृति में जल, वायु और स्पर्श सहित अनेक प्रकार के नाद निरंतर मौजूद हैं। नदियों और झरनों का कल-कल प्रवाह, समुद्र की ध्वनि, हवा का स्वर, वृक्षों के पत्तों की आवाज और किसी वस्तु के स्पर्श से उत्पन्न ध्वनि भी प्रकृति के नाद का हिस्सा हैं।
उन्होंने रामचरितमानस की चौपाइयों और शिव भक्ति के भजनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संदेश दिया। ‘मंगल भवन अमंगल हारी’, ‘द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी’, ‘उमा सहित जेहि जपत पुरारी’ सहित राम-शिव से जुड़े भजनों और बारह ज्योतिर्लिंग के भजन पर श्रद्धालु भावविभोर होकर झूम उठे। बापू ने कहा कि भगवान शिव राम का नाम जपते हैं और राम शिव का स्मरण करते हैं। राम और शिव की यह परंपरा भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति की एकता का संदेश देती है।
ये भी पढ़ें- दशहरे पर शुरू होगी दिग्विजय सिंह की सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा, महाकाल से राम जन्मभूमि तक का सफर
मोरारी बापू ने कहा कि आदि गुरु शंकराचार्य ने बाल्यावस्था में ही ओंकारेश्वर की ज्ञानभूमि पर आकर तपस्यारत गोविंदपादाचार्य से दीक्षा प्राप्त की और संन्यास ग्रहण किया। उन्होंने यहां वेद-पुराणों का अध्ययन किया तथा नर्मदाष्टक सहित अनेक स्तोत्रों की रचना की। इसके बाद वे ओंकारेश्वर से महिष्मती नगरी पहुंचे, जिसे आज महेश्वर के नाम से जाना जाता है, जहां उन्होंने विद्वान मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ किया। बाद में मंडन मिश्र भी उनके साथ सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए निकल पड़े। आदि शंकराचार्य ने देशभर में भ्रमण कर चार पीठों की स्थापना की और भारत की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक एकता को मजबूत करने का कार्य किया। एकात्म धाम परियोजना के प्रथम चरण में आचार्य शंकर की 108 फीट ऊंची बहुधातु प्रतिमा स्थापित की जा चुकी है। परियोजना के अगले चरण में लगभग 2400 करोड़ रुपये की लागत से ‘अद्वैत लोक’ संग्रहालय सहित विभिन्न कार्य प्रस्तावित हैं।
ॐ निराकार है, स्वस्तिक साकार है
अभय घाट पर आयोजित कथा एवं प्रवचन में मोरारी बापू ने ‘ॐ’ और स्वस्तिक के आध्यात्मिक महत्व पर भी विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि “ॐ निराकार है और स्वस्तिक साकार है, दोनों एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं।” उन्होंने नाद की विभिन्न अनुभूतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रकृति में जल, वायु और स्पर्श सहित अनेक प्रकार के नाद निरंतर मौजूद हैं। नदियों और झरनों का कल-कल प्रवाह, समुद्र की ध्वनि, हवा का स्वर, वृक्षों के पत्तों की आवाज और किसी वस्तु के स्पर्श से उत्पन्न ध्वनि भी प्रकृति के नाद का हिस्सा हैं।
उन्होंने रामचरितमानस की चौपाइयों और शिव भक्ति के भजनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संदेश दिया। ‘मंगल भवन अमंगल हारी’, ‘द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी’, ‘उमा सहित जेहि जपत पुरारी’ सहित राम-शिव से जुड़े भजनों और बारह ज्योतिर्लिंग के भजन पर श्रद्धालु भावविभोर होकर झूम उठे। बापू ने कहा कि भगवान शिव राम का नाम जपते हैं और राम शिव का स्मरण करते हैं। राम और शिव की यह परंपरा भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति की एकता का संदेश देती है।
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मोरारी बापू की कथा सुनने पहुंचे श्रद्धालु
- फोटो : अमर उजाला
रामचरितमानस में सभी ग्रंथों का सार
मोरारी बापू ने कहा कि रामचरितमानस जैसा कोई दूसरा ग्रंथ नहीं है। इसमें जीवन के अनेक पक्षों और विभिन्न ग्रंथों का सार समाहित है। उन्होंने अपने सहज और लौकिक अंदाज में एक पिता के दो पुत्रों की कहानी सुनाई। दोनों भाइयों ने मिलकर भैंस पाली और दूध आधा-आधा बांटते थे। बाद में भैंस का बंटवारा हुआ तो आगे का हिस्सा सीधे भाई को और पीछे का हिस्सा चालाक भाई को मिला। सीधा भाई भैंस को चारा खिलाता रहा और दूसरा दूध निकालता रहा। अंततः जब सीधे भाई ने भैंस के मुंह पर प्रहार किया तो भैंस ने दूध देना बंद कर दिया। बापू ने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि अन्याय और शोषण अंततः शोषण करने वाले के लिए भी नुकसानदायक होता है।
2028 में फिर ओंकारेश्वर में कथा करेंगे बापू
कथा के दौरान श्रद्धालुओं की मांग पर मोरारी बापू ने वर्ष 2028 में पुनः ओंकारेश्वर आकर कथा करने की घोषणा की। घोषणा होते ही श्रद्धालुओं में उत्साह दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि ओंकारेश्वर केवल एक प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग ही नहीं, बल्कि आदि गुरु शंकराचार्य की ज्ञानभूमि भी है। नर्मदा का पवित्र तट, शंकराचार्य की साधना और भगवान ओंकारेश्वर की उपस्थिति इस भूमि को विशिष्ट आध्यात्मिक पहचान प्रदान करती है।
कन्याकुमारी से केदारनाथ तक आध्यात्मिक एकता का संदेश
‘भारत स्वस्तिक रामकथा यात्रा’ 10 अक्तूबर को कन्याकुमारी से शुरू हुई। यात्रा का उद्देश्य रामनाम के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना जगाना, भारतीय संस्कृति की विविधता में एकता को मजबूत करना और सर्वकल्याण की भावना को जन-जन तक पहुंचाना बताया गया है। यात्रा कन्याकुमारी से प्रारंभ होकर केरल में आदि गुरु शंकराचार्य की जन्मस्थली कालड़ी, कर्नाटक के श्रृंगेरी स्थित शारदा पीठ तथा महाराष्ट्र के शक्तिपीठ तुलजा भवानी सहित विभिन्न आध्यात्मिक स्थलों से होकर ओंकारेश्वर पहुंची।
मोरारी बापू ने कहा कि वर्ष 1947 में भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हुआ, लेकिन अब आवश्यकता है कि भारत आध्यात्मिक रूप से भी अधिक जागृत और समृद्ध बने। उन्होंने रामचरितमानस में भगवान राम द्वारा समुद्र पर बनाए गए सेतु का उदाहरण देते हुए कहा कि यह यात्रा भी कन्याकुमारी से कश्मीर और द्वारका से जगन्नाथ तक एकता का सेतु बनाने का कार्य करेगी। उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता में एकता है। अलग-अलग भाषा, वेशभूषा, परंपराओं और संस्कृतियों के बावजूद भारतीय समाज एक सूत्र में बंधा हुआ है। आज आवश्यकता है कि इस एकता को और मजबूत किया जाए।
मोरारी बापू ने कहा कि रामचरितमानस जैसा कोई दूसरा ग्रंथ नहीं है। इसमें जीवन के अनेक पक्षों और विभिन्न ग्रंथों का सार समाहित है। उन्होंने अपने सहज और लौकिक अंदाज में एक पिता के दो पुत्रों की कहानी सुनाई। दोनों भाइयों ने मिलकर भैंस पाली और दूध आधा-आधा बांटते थे। बाद में भैंस का बंटवारा हुआ तो आगे का हिस्सा सीधे भाई को और पीछे का हिस्सा चालाक भाई को मिला। सीधा भाई भैंस को चारा खिलाता रहा और दूसरा दूध निकालता रहा। अंततः जब सीधे भाई ने भैंस के मुंह पर प्रहार किया तो भैंस ने दूध देना बंद कर दिया। बापू ने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि अन्याय और शोषण अंततः शोषण करने वाले के लिए भी नुकसानदायक होता है।
2028 में फिर ओंकारेश्वर में कथा करेंगे बापू
कथा के दौरान श्रद्धालुओं की मांग पर मोरारी बापू ने वर्ष 2028 में पुनः ओंकारेश्वर आकर कथा करने की घोषणा की। घोषणा होते ही श्रद्धालुओं में उत्साह दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि ओंकारेश्वर केवल एक प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग ही नहीं, बल्कि आदि गुरु शंकराचार्य की ज्ञानभूमि भी है। नर्मदा का पवित्र तट, शंकराचार्य की साधना और भगवान ओंकारेश्वर की उपस्थिति इस भूमि को विशिष्ट आध्यात्मिक पहचान प्रदान करती है।
कन्याकुमारी से केदारनाथ तक आध्यात्मिक एकता का संदेश
‘भारत स्वस्तिक रामकथा यात्रा’ 10 अक्तूबर को कन्याकुमारी से शुरू हुई। यात्रा का उद्देश्य रामनाम के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना जगाना, भारतीय संस्कृति की विविधता में एकता को मजबूत करना और सर्वकल्याण की भावना को जन-जन तक पहुंचाना बताया गया है। यात्रा कन्याकुमारी से प्रारंभ होकर केरल में आदि गुरु शंकराचार्य की जन्मस्थली कालड़ी, कर्नाटक के श्रृंगेरी स्थित शारदा पीठ तथा महाराष्ट्र के शक्तिपीठ तुलजा भवानी सहित विभिन्न आध्यात्मिक स्थलों से होकर ओंकारेश्वर पहुंची।
मोरारी बापू ने कहा कि वर्ष 1947 में भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हुआ, लेकिन अब आवश्यकता है कि भारत आध्यात्मिक रूप से भी अधिक जागृत और समृद्ध बने। उन्होंने रामचरितमानस में भगवान राम द्वारा समुद्र पर बनाए गए सेतु का उदाहरण देते हुए कहा कि यह यात्रा भी कन्याकुमारी से कश्मीर और द्वारका से जगन्नाथ तक एकता का सेतु बनाने का कार्य करेगी। उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता में एकता है। अलग-अलग भाषा, वेशभूषा, परंपराओं और संस्कृतियों के बावजूद भारतीय समाज एक सूत्र में बंधा हुआ है। आज आवश्यकता है कि इस एकता को और मजबूत किया जाए।
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ओंकारेश्वर पहुंचे मोरारी बापू का स्वागत किया गया.
- फोटो : अमर उजाला
दो विशेष ट्रेनों में चल रहे हैं श्रद्धालु
इस आध्यात्मिक यात्रा में दो विशेष ट्रेनों के माध्यम से लगभग 900 श्रद्धालु मोरारी बापू के साथ यात्रा कर रहे हैं। इन ट्रेनों के नाम ‘कैलाश’ और ‘चित्रकूट’ रखे गए हैं। यात्रियों के भोजन, पानी सहित अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं यात्रा के साथ ही चल रही हैं। भजन-कीर्तन और संगीत से जुड़े कलाकार भी यात्रा में साथ हैं। ओंकारेश्वर के बाद यात्रा शुक्रवार को अगले पड़ाव के लिए रवाना होगी। यात्रा विभिन्न राज्यों से होते हुए झांसी, कुरुक्षेत्र, वाघा बॉर्डर, अमृतसर और जम्मू पहुंचेगी तथा 23 अक्तूबर को केदारनाथ धाम में यात्रा का पहला चरण समाप्त होगा। यात्रा का दूसरा चरण 14 नवंबर को द्वारका से शुरू होगा और 22 नवंबर को जगन्नाथ पुरी में इसका समापन प्रस्तावित है।
कथा स्थल पर प्रवेश व्यवस्था को लेकर भी उठे सवाल
आध्यात्मिक आयोजन के बीच कथा स्थल पर प्रवेश व्यवस्था को लेकर कुछ दृश्य भी सामने आए। सामने आए वीडियो में कुछ संत जमीन पर बैठे दिखाई दिए, जबकि कुछ संत तेज धूप में प्रवेश की प्रतीक्षा करते नजर आए। कुछ श्रद्धालुओं ने स्वयं छतरियां लगाकर संतों और अन्य लोगों को धूप से बचाने का प्रयास किया। कुछ बुजुर्ग श्रद्धालुओं और संतों को भी प्रवेश के लिए इंतजार करना पड़ा। धार्मिक आयोजन में संतों और बुजुर्गों के लिए विशेष सुविधा, छांव, पेयजल और सुगम प्रवेश व्यवस्था की अपेक्षा रहती है। ऐसे में आयोजन समिति द्वारा आगे इन व्यवस्थाओं को और बेहतर किए जाने की आवश्यकता महसूस की गई।
इस आध्यात्मिक यात्रा में दो विशेष ट्रेनों के माध्यम से लगभग 900 श्रद्धालु मोरारी बापू के साथ यात्रा कर रहे हैं। इन ट्रेनों के नाम ‘कैलाश’ और ‘चित्रकूट’ रखे गए हैं। यात्रियों के भोजन, पानी सहित अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं यात्रा के साथ ही चल रही हैं। भजन-कीर्तन और संगीत से जुड़े कलाकार भी यात्रा में साथ हैं। ओंकारेश्वर के बाद यात्रा शुक्रवार को अगले पड़ाव के लिए रवाना होगी। यात्रा विभिन्न राज्यों से होते हुए झांसी, कुरुक्षेत्र, वाघा बॉर्डर, अमृतसर और जम्मू पहुंचेगी तथा 23 अक्तूबर को केदारनाथ धाम में यात्रा का पहला चरण समाप्त होगा। यात्रा का दूसरा चरण 14 नवंबर को द्वारका से शुरू होगा और 22 नवंबर को जगन्नाथ पुरी में इसका समापन प्रस्तावित है।
कथा स्थल पर प्रवेश व्यवस्था को लेकर भी उठे सवाल
आध्यात्मिक आयोजन के बीच कथा स्थल पर प्रवेश व्यवस्था को लेकर कुछ दृश्य भी सामने आए। सामने आए वीडियो में कुछ संत जमीन पर बैठे दिखाई दिए, जबकि कुछ संत तेज धूप में प्रवेश की प्रतीक्षा करते नजर आए। कुछ श्रद्धालुओं ने स्वयं छतरियां लगाकर संतों और अन्य लोगों को धूप से बचाने का प्रयास किया। कुछ बुजुर्ग श्रद्धालुओं और संतों को भी प्रवेश के लिए इंतजार करना पड़ा। धार्मिक आयोजन में संतों और बुजुर्गों के लिए विशेष सुविधा, छांव, पेयजल और सुगम प्रवेश व्यवस्था की अपेक्षा रहती है। ऐसे में आयोजन समिति द्वारा आगे इन व्यवस्थाओं को और बेहतर किए जाने की आवश्यकता महसूस की गई।
