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पिता और अपने सपने को साथ-साथ पूरा कर रहीं ये स्टार्टअप क्वीन्स, युवा पीढ़ी के लिए हैं मार्गदर्शक
Fri, 01 Mar 2019 04:22 PM IST
ishwar ashish
रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ
रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Fri, 01 Mar 2019 04:22 PM IST
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स्टार्टअप क्वीन्स
- फोटो : amar ujala
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इन्हें विरासत में जो कुछ मिला, उसे करीने से सहेजा, पर यहीं नहीं रुकीं। क्योंकि इन्हें अलग पहचान बनानी थी और रचना था नया इतिहास। चुनौतियों से खेलने के जुनून में मुश्किल डगर चुनी। जोखिम उठाने के जज्बे से कारोबार की दुनिया में कदम रखा और हासिल कर लिया मनचाहा मुकाम। महिलाओं को आर्थिक सशक्तीकरण के पथ पर ले जा रहीं लखनऊ की ये स्टार्टअप क्वीन्स युवा पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक की भूमिका में हैं। क्योंकि इन्होंने न केवल खुद को आर्थिक रूप से सशक्त किया, बल्कि हजारों कमजोर महिलाओं के लिए बेहतर भविष्य की बुनियाद भी रख रही हैं। पेश है रोली खन्ना की खास रिपोर्ट...।
स्टार्टअप क्वीन्स
- फोटो : amar ujala
‘न्यूक्लियर फैमिली में दादा-दादी के लिए जगह नहीं। जबकि वे परिवार की रीढ़ हैं। नई पीढ़ी को उनसे वापस जोड़ना जरूरी है।
मां बन गई बिजनेस वीमेन
सोनू एक ऐसा स्कूल चाहती थीं, जहां पढ़ने वाले अपने बच्चे पर हर माता-पिता नजर रख सकें। बच्चों के लिए सुरक्षित माहौल व माता-पिता की उनको लेकर चिंता को मिटाने के लिए ही वे लखनऊ में फुटप्रिंट स्कूल का कॉन्सेप्ट लेकर आईं। इस स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ प्राथमिकता ‘लाइव स्ट्रीमिंग’ को दी गई। बिजनेस वुमेन सोनू अग्रवाल का प्रयोग सफल रहा। महज तीन साल में इंदिरानगर के बाद गोमती नगर में एक और स्कूल खुल चुका है।
बिजनेस मॉड्यूल में पीढ़ियों का ख्याल
सोनू कहती हैं कि सिर्फ बच्चों की चिंता ही नहीं, स्कूल खोलने के पीछे मकसद एकल परिवार के एकाकीपन के दर्द से बच्चों और खासकर दादा-दादी को दूर रखना है। इसके लिए एक तरीका तो ‘लाइव स्ट्रीमिंग’ है, जिसमें एक एप के जरिए हर माता-पिता बच्चों की हर गतिविधि पर नजर रखते हैं। दादा-दादी अब पोते-पोतियों के बचपन से दूर हो रहे हैं। हमारा एप उनकी इस कमी को पूरा करता है, क्योंकि वह अपने पोते-पोतियों की गतिविधियों का घर बैठे हिस्सा बन पाते हैं। वहीं हम अपने आयोजनों में ग्रैंड पेरेंट्स को इनवाइट करना नहीं भूलते, बल्कि यूं कहिए कि हमारे चीफगेस्ट भी वहीं होते हैं। सोनू के मुताबिक, हम परिवार के महत्व को समझते हैं और बच्चों को उसकी अहमियत समझाना चाहते हैं।
मां बन गई बिजनेस वीमेन
सोनू एक ऐसा स्कूल चाहती थीं, जहां पढ़ने वाले अपने बच्चे पर हर माता-पिता नजर रख सकें। बच्चों के लिए सुरक्षित माहौल व माता-पिता की उनको लेकर चिंता को मिटाने के लिए ही वे लखनऊ में फुटप्रिंट स्कूल का कॉन्सेप्ट लेकर आईं। इस स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ प्राथमिकता ‘लाइव स्ट्रीमिंग’ को दी गई। बिजनेस वुमेन सोनू अग्रवाल का प्रयोग सफल रहा। महज तीन साल में इंदिरानगर के बाद गोमती नगर में एक और स्कूल खुल चुका है।
बिजनेस मॉड्यूल में पीढ़ियों का ख्याल
सोनू कहती हैं कि सिर्फ बच्चों की चिंता ही नहीं, स्कूल खोलने के पीछे मकसद एकल परिवार के एकाकीपन के दर्द से बच्चों और खासकर दादा-दादी को दूर रखना है। इसके लिए एक तरीका तो ‘लाइव स्ट्रीमिंग’ है, जिसमें एक एप के जरिए हर माता-पिता बच्चों की हर गतिविधि पर नजर रखते हैं। दादा-दादी अब पोते-पोतियों के बचपन से दूर हो रहे हैं। हमारा एप उनकी इस कमी को पूरा करता है, क्योंकि वह अपने पोते-पोतियों की गतिविधियों का घर बैठे हिस्सा बन पाते हैं। वहीं हम अपने आयोजनों में ग्रैंड पेरेंट्स को इनवाइट करना नहीं भूलते, बल्कि यूं कहिए कि हमारे चीफगेस्ट भी वहीं होते हैं। सोनू के मुताबिक, हम परिवार के महत्व को समझते हैं और बच्चों को उसकी अहमियत समझाना चाहते हैं।
स्टार्टअप क्वीन्स
- फोटो : amar ujala
‘हमारे देश में मानव संसाधन की कमी नहीं, उनका इस्तेमाल हो तो सबको रोजगार मिलेगा। खास कर महिलाओं में आर्थिक आत्मनिर्भरता आएगी।’
परिवार की पहली महिला उद्यमी
अंजलि सिंह के परिवार में सभी नौकरीपेशा हैं। वह घर की पहली सदस्य हैं, जिन्होंने उद्यमी बनने का फैसला किया। भोपाल में पैदाइश, लेकिन पढ़ाई-लिखाई लखनऊ में हुई। दस साल तक खुद मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी की। 2009 में इनके जीवन में एक बड़ा बदलाव आया और इन्होंने उस बदलाव को गले से लगा लिया। नौकरी छोड़ी और नींव पड़ी जूट फाॅर लाइफ की। इससे पर्यावरण को तो फायदा हुआ ही, कई परिवारों को काम भी मिला।
गांव की गलियों से विदेश तक
अंजलि बताती हैं कि एक चाइनीज मुहावरा है, ‘किसी को रोटी मत दो, उसमें रोटी कमाने का हुनर पैदा करो।’ इसी सोच ने मुझे ताकत दी। 400 परिवारों को जूट फाॅर लाइफ सक्षम बना चुका है। अंजलि बताती हैं कि वीमेन आॅन विंग्स, नीदरलैंड की संस्था है। नौ साल की लंबी कोशिशों का नतीजा है कि नीदरलैंड की कंसल्टेंसी कंपनी ने हमसे संपर्क किया और वह हमें निशुल्क ट्रेनिंग दे रही है। अंजलि बताती हैं कि हम कोलकाता से जूट मंगाते हैं। हम मार्केट में नहीं बल्कि सेमिनार, कॉन्फ्रेंस व अन्य बड़े आयोजनों के लिए जूट बैग बनाकर सप्लाई कर रहे हैं। कठिनाई नहीं आई, क्योंकि हमें प्रशिक्षित कारीगर आसानी से मिल गए। हम खुद उन तक काम पहुंचाते हैं, उनसे कलेक्ट करते हैं और बेचते हैं।
परिवार की पहली महिला उद्यमी
अंजलि सिंह के परिवार में सभी नौकरीपेशा हैं। वह घर की पहली सदस्य हैं, जिन्होंने उद्यमी बनने का फैसला किया। भोपाल में पैदाइश, लेकिन पढ़ाई-लिखाई लखनऊ में हुई। दस साल तक खुद मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी की। 2009 में इनके जीवन में एक बड़ा बदलाव आया और इन्होंने उस बदलाव को गले से लगा लिया। नौकरी छोड़ी और नींव पड़ी जूट फाॅर लाइफ की। इससे पर्यावरण को तो फायदा हुआ ही, कई परिवारों को काम भी मिला।
गांव की गलियों से विदेश तक
अंजलि बताती हैं कि एक चाइनीज मुहावरा है, ‘किसी को रोटी मत दो, उसमें रोटी कमाने का हुनर पैदा करो।’ इसी सोच ने मुझे ताकत दी। 400 परिवारों को जूट फाॅर लाइफ सक्षम बना चुका है। अंजलि बताती हैं कि वीमेन आॅन विंग्स, नीदरलैंड की संस्था है। नौ साल की लंबी कोशिशों का नतीजा है कि नीदरलैंड की कंसल्टेंसी कंपनी ने हमसे संपर्क किया और वह हमें निशुल्क ट्रेनिंग दे रही है। अंजलि बताती हैं कि हम कोलकाता से जूट मंगाते हैं। हम मार्केट में नहीं बल्कि सेमिनार, कॉन्फ्रेंस व अन्य बड़े आयोजनों के लिए जूट बैग बनाकर सप्लाई कर रहे हैं। कठिनाई नहीं आई, क्योंकि हमें प्रशिक्षित कारीगर आसानी से मिल गए। हम खुद उन तक काम पहुंचाते हैं, उनसे कलेक्ट करते हैं और बेचते हैं।
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स्टार्टअप क्वीन्स
- फोटो : amar ujala
'यदि हमें स्वास्थ्यवर्धक चीजें और माहौल आम आदमी की पहुंच में रखना हैं तो हमें इसकी आदत डालनी होगी। यहां डिमांड एंड सप्लाई का नियम लागू होता है।'
पिता और अपने सपने को साथ-साथ पूरा कर रहीं
बचपन में बनाए स्केच कब अंकिता का पैशन बन गए, उन्हें इसका पता ही नहीं चला। पढ़ाई के साथ-साथ उनकी कला भी निखरती गई। कुछ समय के लिए मूर्तिकला की बारीकियां सीखने को कोर्स भी किया। इस बीच पिता ने बेटे-बेटी के बीच जिम्मेदारियां बांट दीं। होटल रमाडा की डायरेक्टर के रूप में जुट गईं पिता का सपना पूरा करने में, पर बने-बनाए रास्तों पर चलना उन्हें रास नहीं आया और अस्तित्व में आया ब्रिओ आर्ट हाउस एंड कैफे।
पर्यावरण व विरासत सहेजने पर फोकस
अंकिता बताती हैं कि ब्रिओ आर्ट एंड क्राफ्ट कैफे महज बैठकर चाय-पानी, कुछ खाने-पीने की जगह नहीं। यह थ्री इन वन प्लेस के कॉन्सेप्ट पर तैयार किया गया है। पहला, ये आर्ट गैलरी है, जहां हम लोगों को अपनी संस्कृति, कला के बारे में विभिन्न माध्यमों से बताते हैं। दूसरा, यह आर्ट हाउस शॉप भी है, जहां सिर्फ ईकोफ्रेंडली उत्पाद ही बेचने के लिए उपलब्ध हैं। फिर आती है बारी एक ऐसे कैफे की जहां प्राकृतिक वातावरण में आपका स्वागत होता है। यहां प्लास्टिक का इस्तेमाल न के बराबर होता है। मिट्टी के बर्तनों को कुछ स्टाइलिश लुक देकर इस्तेमाल किया जा रहा है। यहां का हर स्टाफ खादी के कपड़ों में नजर आता है। अंकिता कहती हैं कि पहले ईकोफ्रेंडली जैसी चीजें नहीं थीं। अब इन्हें एक दायरे में बांधना जरूरी है, क्योंकि सस्ती और प्लास्टिक की चीजों ने हमारा पर्यावरण तबाह कर दिया है। ईकोफ्रेंडली चीजें सबका हक हैं, इन्हें आम आदमी की पहुंच में लाने के लिए इनके ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल पर जोर देना होगा।
पिता और अपने सपने को साथ-साथ पूरा कर रहीं
बचपन में बनाए स्केच कब अंकिता का पैशन बन गए, उन्हें इसका पता ही नहीं चला। पढ़ाई के साथ-साथ उनकी कला भी निखरती गई। कुछ समय के लिए मूर्तिकला की बारीकियां सीखने को कोर्स भी किया। इस बीच पिता ने बेटे-बेटी के बीच जिम्मेदारियां बांट दीं। होटल रमाडा की डायरेक्टर के रूप में जुट गईं पिता का सपना पूरा करने में, पर बने-बनाए रास्तों पर चलना उन्हें रास नहीं आया और अस्तित्व में आया ब्रिओ आर्ट हाउस एंड कैफे।
पर्यावरण व विरासत सहेजने पर फोकस
अंकिता बताती हैं कि ब्रिओ आर्ट एंड क्राफ्ट कैफे महज बैठकर चाय-पानी, कुछ खाने-पीने की जगह नहीं। यह थ्री इन वन प्लेस के कॉन्सेप्ट पर तैयार किया गया है। पहला, ये आर्ट गैलरी है, जहां हम लोगों को अपनी संस्कृति, कला के बारे में विभिन्न माध्यमों से बताते हैं। दूसरा, यह आर्ट हाउस शॉप भी है, जहां सिर्फ ईकोफ्रेंडली उत्पाद ही बेचने के लिए उपलब्ध हैं। फिर आती है बारी एक ऐसे कैफे की जहां प्राकृतिक वातावरण में आपका स्वागत होता है। यहां प्लास्टिक का इस्तेमाल न के बराबर होता है। मिट्टी के बर्तनों को कुछ स्टाइलिश लुक देकर इस्तेमाल किया जा रहा है। यहां का हर स्टाफ खादी के कपड़ों में नजर आता है। अंकिता कहती हैं कि पहले ईकोफ्रेंडली जैसी चीजें नहीं थीं। अब इन्हें एक दायरे में बांधना जरूरी है, क्योंकि सस्ती और प्लास्टिक की चीजों ने हमारा पर्यावरण तबाह कर दिया है। ईकोफ्रेंडली चीजें सबका हक हैं, इन्हें आम आदमी की पहुंच में लाने के लिए इनके ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल पर जोर देना होगा।
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स्टार्टअप क्वीन्स
- फोटो : amar ujala
‘कुछ नया करना है तो सोचने का तरीका बदलिए। प्रोफेशन में पैशन की गुंजाइश रखनी चाहिए।’
डेंटिस्ट से बन गईं केक आर्टिस्ट
चपन से ही प्रयोग करने का शौक था। बेकिंग सबसे अच्छी लगती थी। कुछ न कुछ बनाते रहने की आदत ने धीरे-धीरे बेकिंग में पारंगत कर दिया। हालांकि कॅरिअर चुनने की बात आई तो डेंटिस्ट बन गईं, लेकिन शादी के बाद तय किया कि घर में रहकर ही कुछ करना है, क्योंकि घर पहली प्राथमिकता थी। आज आफरीन एक सफल केक आर्टिस्ट हैं। लखनऊ में उनकी बेकरी ऑनलाइन केक सप्लाई कर रही है।
अपने मन की सुनी
आफरीन बताती हैं कि मैंने कोई ट्रेनिंग नहीं ली। दोस्तों को, घर के लोगों को मेरा केक बहुत पसंद आता था। उनकी राय ने राह दिखाई, फिर मैंने अपने मन की सुनी। मैंने खुद को केक आर्टिस्ट के रूप में डवलप किया। उस वक्त तक लखनऊ में सामान्य केक, पेस्ट्री का चलन था। मैंने कस्टमाइज्ड, फाउंडेंट केक बनाना शुरू किया। लोग थीम केक की डिमांड करने लगे। चुनौती थी कस्टमर को कैसे रोका जाए। मैं दावे से कह सकती हूं कि हम जो केक बनाते हैं उसमें केमिकल का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करते। क्रीम कम केक ज्यादा होता है, इसके अलावा प्रिजरवेटिव नहीं होता हमारा केक
डेंटिस्ट से बन गईं केक आर्टिस्ट
चपन से ही प्रयोग करने का शौक था। बेकिंग सबसे अच्छी लगती थी। कुछ न कुछ बनाते रहने की आदत ने धीरे-धीरे बेकिंग में पारंगत कर दिया। हालांकि कॅरिअर चुनने की बात आई तो डेंटिस्ट बन गईं, लेकिन शादी के बाद तय किया कि घर में रहकर ही कुछ करना है, क्योंकि घर पहली प्राथमिकता थी। आज आफरीन एक सफल केक आर्टिस्ट हैं। लखनऊ में उनकी बेकरी ऑनलाइन केक सप्लाई कर रही है।
अपने मन की सुनी
आफरीन बताती हैं कि मैंने कोई ट्रेनिंग नहीं ली। दोस्तों को, घर के लोगों को मेरा केक बहुत पसंद आता था। उनकी राय ने राह दिखाई, फिर मैंने अपने मन की सुनी। मैंने खुद को केक आर्टिस्ट के रूप में डवलप किया। उस वक्त तक लखनऊ में सामान्य केक, पेस्ट्री का चलन था। मैंने कस्टमाइज्ड, फाउंडेंट केक बनाना शुरू किया। लोग थीम केक की डिमांड करने लगे। चुनौती थी कस्टमर को कैसे रोका जाए। मैं दावे से कह सकती हूं कि हम जो केक बनाते हैं उसमें केमिकल का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करते। क्रीम कम केक ज्यादा होता है, इसके अलावा प्रिजरवेटिव नहीं होता हमारा केक