कोरोना फाइटर्सः केजीएमयू के इन कर्मचारियों के जज्बे को सलाम, जान की परवाह किए बगैर जुटे हैं सेवा में
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ट्रामा सेंटर के लैब में काम कर रहे टेक्नीशियन संदीप चौधरी की निगाह एक-एक सैंपल पर रहती है। सात दिन तक लैब में रहने के बाद 14 दिन क्वारंटीन रहना होगा। संदीप पर लैब के साथियों के रहने से लेकर खाने तक की व्यवस्था की भी जिम्मेदारी है। अंबेडकरनगर के मूल निवासी संदीप ने जब घर में बताया कि वह 21 दिन तक नहीं लौट पाएंगे तो मां ने अपनी बीमारी का हवाला दिया। कहा कि बीच में कुछ हो गया तो तुम मुझे देख नहीं पाओगे। उन्होंने नौकरी छोड़ कर लौटाने को कहा। इस पर संदीप ने दोस्त से मां की दवाई भिजवाई और पिता से बात की। उन्होंने ड्यूटी पर डटे रहने को कहा। संदीप ने पैथोलॉजी विभाग के डॉ. वाहिद अली से बात की तो उन्होंने हौसला बढ़ाते हुए कहा कि ऐसा मौका जीवन में फिर नहीं मिलेगा। इस पर उन्होंने सेवा में लगे रहने का फैसला लिया।
कब रात हो जाती है, पता ही नहीं चलता
केजीएमयू के वरिष्ठ लिपिक कमलेश कुमार कोरोना वार्ड में तैनात हैं। वह कहते हैं कि मरीजों की संख्या बढ़ने के साथ ही लिखा-पढ़ी का काम अत्यधिक बढ़ गया है। सीएमओ ऑफिस से लेकर शासन-प्रशासन तक मरीजों का पूरा स्टेटस अपडेट करना होता है। केजीएमयू के अधिकारी से लेकर डॉक्टर तक किसी भी मरीज का डाटा मांगते हैं तो तत्काल निकालकर देना पड़ता है। ऐसी स्थिति में कब सुबह से शाम हो जाती है, पता ही नहीं चलता। कोराना के समय अलग अनुभूति देती है। हर कर्मचारी को इस समय अपना योगदान देना चाहिए। घर परिवार से दूर रहकर कुछ पल के लिए खुद को मरीजों के प्रति समर्पित करना सबसे बड़ी सेवा है।
कोरोना वार्ड में ड्यूटी कर रहे गौतम वाल्मीकि कहते हैं कि उन्हें अपने सेवाकाल में पहली बार गर्व महसूस हो रहा है। इस वैश्विक महामारी की रोकथाम एवं इससे पीड़ित मरीजों को सुरक्षित घर भेजना उनका कर्म एवं धर्म है। वह इसके लिए तत्पर हैं। गौतम कहते हैं कि शुरुआती दौर में लग रहा था कि यहां काम करना जीवन को खतरे में डालना है। हालांकि, जब देखा कि सीएमएस से लेकर डॉक्टर तक मरीजों की सेवा में जुटे हैं। सभी बराबर का सम्मान देते हैं तो हौसला बढ़ा। प्रयास होगा कि क्वारंटीन का समय खत्म होने के बाद फिर काम करने का मौका मिले।
ड्यूटी में मुस्तैद अनंत श्रीवास्तव से मरीजों का पहला सामना होता है। वह बताते हैं कि यहां आने वाली मरीजों का इलेक्ट्रॉनिक डाटा तैयार करते हैं। पहले डर लगता था, लेकिन अब यह रूटीन का काम हो गया है। मरीजों को पहले सलाह देते हैं कि मास्क पहनें और मरीजों को खुद से एक मीटर की दूरी पर कुर्सी पर बैठाते हैं। इसके बाद सभी जानकारी लेनेेे के बाद पूरा विवरण डॉक्टर को दिया जाता है। कोरोना के समय अस्पताल में ड्यूटी करने की वजह से मकान मालिक ने कमरा छोड़ने तक की बात कही। इस बात का गर्व है कि मरीजों के काम आ रहे हैं।