पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई का लखनऊ से गहरा रिश्ता रहा है। वो यहां की आबोहवा में रचे बसे हैं। बता रहे हैं राजनाथ सिंह 'सूर्य'। अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार 1991 में लखनऊ से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। हालांकि वे 1957 में ही बलरामपुर से निर्वाचित होकर लोकसभा के सदस्य बन चुके थे। लखनऊ से चुनाव जीतने का महत्व इसलिए है क्योंकि वे 1954 में लोकसभा के लिए एक उपचुनाव में जनसंघ उम्मीदवार के रूप में पहली बार लखनऊ से ही मैदान में उतरे थे। इसके बाद वे प्राय: सभी लोकसभा चुनाव में (1980 को छोड़कर जब भाजपा ने यह सीट जनता पार्टी के लिए समझौते में छोड़ दी थी) वे अन्य स्थानों के अलावा लखनऊ से भी उम्मीदवार हुआ करते थे।
लखनऊ अटल पर तो अटल लखनऊ पर थे फिदा
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चाहे जनसंघ रहा हो, या फिर भाजपा, दोनों ही संगठनों के चुनाव अभियान में अटल ही आकर्षण के मुख्य केंद्र रहे। इन पार्टियों के उम्मीदवारों ने लखनऊ के मतदाताओं से वाजपेयी का वास्ता देकर ही वोट हासिल किए। आखिर ऐसा क्या था अटलजी में कि भाजपा या पूर्व के जनसंघ में यही अनुभूति बनी रही कि चुनावी नौका उनके नाम से ही पार लगाई जा सकती है। अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्हें लखनऊवासी सिर्फ अटलजी कहकर संबोधित करते हैं, लखनऊ के जनजीवन में स्वतंत्रता पूर्व से अभिन्न अंग बन गए थे। वे संघ के प्रचारक के रूप में 1942 में लखनऊ आए थे।
संघ प्रचारक के रूप में ही उन्होंने पं. दीनदयाल उपाध्याय के मार्गदर्शन में संघ की वैचारिक पत्रिका राष्ट्र धर्म का सम्पादन शुरू किया। उनकी साहित्यिक अभिरुचि ने उन्हें यहां के साहित्यकारों के संपर्क में आने का अवसर प्रदान किया। वे राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत वीर रस की कविताओं की न केवल रचना करते रहे, बल्कि कवि सम्मेलनों, पार्टी के कार्यक्रमों, यहां तक कि सार्वजनिक सभाओं में भी उसका पाठ करते रहे।
उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता, जिसका विद्यार्थी जीवन में अंत्याक्षरी में पाठ कर मैंने भी पुरस्कार पाया है, ‘हिन्दू तन-मन हिन्दू जीवन, रग रग हिन्दू मेरा परिचय’ की एक पंक्ति भारतीयता या हिन्दुत्व को समझाने की सरलता का उदाहरण है। वह पंक्ति है ‘कोई बताये कब हमने काबुल में जाकर मस्जिद तोड़ी, भूभाग नहीं शत-शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय’। संघ प्रचारक के रूप में युवावस्था में ही उन्होंने इन पंक्तियों से इतिहास को समझने का रास्ता दिखाया है।
भारतवासी विदेशों में अपनी अवधारणा का प्रचार करने न तो तलवार लेकर गए और न ही तराजू। जिस मानवीयता का धर्म के रूप में हमारे ऋषियों ने निरूपण किया है, उसे जहां भी गए उनकी संस्कृति और परम्पराओं के साथ सामंजस्य स्थापित कर दिया। अटलजी का जीवन भी इसी सांमजस्य का स्वरूप रहा है। यही कारण है कि चाहे उनके प्रति अनुराग रखने वाले लोग हों या राजनीतिक विरोधी, दोनों के बीच उनकी समान रूप से पैठ और प्रतिष्ठा थी। प्रसिद्ध साहित्यकार स्व. श्रीनारायण चतुर्वेदी ने उन्हें अजात् शत्रु की संज्ञा प्रदान किया था। जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निजी सहयोगी के रूप में राजनीति में आने से पहले ही उनकी पहचान बन चुकी थी।