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लॉकडाउन तो खत्म हो गया पर हर तरफ तनाव दे गया, ...इन युवाओं और किशोरों के नजरिए से समझिए हालात
Sat, 10 Oct 2020 01:42 PM IST
पंकज श्रीवास्तव
रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ
रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Sat, 10 Oct 2020 01:42 PM IST
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नित्या, मानव, उत्कर्ष
- फोटो : अमर उजाला
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कोरोना संक्रमण के साथ लखनऊ जबरदस्त मानसिक दबाव में है। इससे पैदा हुए हालात और उससे सामंजस्य बैठा पाने की कोशिश और विवशता बच्चों, बुजुर्गों, महिला, पुरुष और युवाओं में तनाव, चिंता और बैचेनी बढ़ा रही है। कोविड काल में विशेष तौर पर लॉन्च एनएसएस यूपी एप के आंकड़े यही सच्चाई बयां कर रहे हैं। लॉकडाउन से अनलॉक तक आते-आते मानसिक परेशानियों का आकार दोगुना हो गया। पहले तीन महीने में एप पर दर्ज मामलों की संख्या 1100 के करीब थी। उसके बाद के तीन महीने में यह संख्या 2200 तक जा पहुंची। चिंता इसलिए भी ज्यादा बड़ी है क्योंकि शांत व तनाव रहित जीवन का प्रतीक ग्रामीण शहरियों से ज्यादा दबाव में आ गए हैं। इसके अलावा जिस युवा पीढ़ी पर भविष्य की इमारत खड़ी होनी है, वह अवसाद के अंधेरों में घिरती जा रही है। कोविड ने मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित किया है, हालांकि ये बात तसल्ली देने वाली है कि कल तक मानसिक बीमारियों को छिपाने की आदत कोरोना काल में एकदम से बदल गई है। अब मनोवैज्ञानिक के पास जाने वाला व्यक्ति बीमार होता है न कि पागल। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर आइए जानते हैं कोविड 19 ने लोगों के स्वास्थ्य को किस हद तक प्रभावित किया है।
मानव सिंह बिशेन
- फोटो : अमर उजाला
हैलो... हाय... करते ही छूमंतर हो जाती थी टेंशन, पर अब नहीं...
मैं लखनऊ विश्वविद्यालय में बीटेक फाइनल ईयर का स्टूडेंट हूं। वर्चुअल दुनिया में तो हम रोज मिलते हैं, लेकिन हैलो... हाय... करके सारी फिक्र को हवा में उड़ा देनी वाली बात उसमें कहां। ऑनलाइन पढ़ाई में शिक्षक व स्टूडेंट दोनों ही मेहनत कर रहे हैं, लेकिन आमने-सामने के संवाद से एक बार में सब स्पष्ट हो जाता है। ऑनलाइन में सारा वक्त किसी चीज को समझने में जाता है। उसके बाद न समझ पाने का तनाव बैचेनी बढ़ाता है। खासकर मेरे जैसे कई स्टूडेंट हैं, जिनको आंख में दिक्कत है, चश्मा लगाते हैं। उनके लिए दिन भर कम्प्यूटर या मोबाइल का इस्तेमाल दिक्कत बढ़ा रहा है। - मानव सिंह बिशेन, बीकेटी स्टूडेंट
मैं लखनऊ विश्वविद्यालय में बीटेक फाइनल ईयर का स्टूडेंट हूं। वर्चुअल दुनिया में तो हम रोज मिलते हैं, लेकिन हैलो... हाय... करके सारी फिक्र को हवा में उड़ा देनी वाली बात उसमें कहां। ऑनलाइन पढ़ाई में शिक्षक व स्टूडेंट दोनों ही मेहनत कर रहे हैं, लेकिन आमने-सामने के संवाद से एक बार में सब स्पष्ट हो जाता है। ऑनलाइन में सारा वक्त किसी चीज को समझने में जाता है। उसके बाद न समझ पाने का तनाव बैचेनी बढ़ाता है। खासकर मेरे जैसे कई स्टूडेंट हैं, जिनको आंख में दिक्कत है, चश्मा लगाते हैं। उनके लिए दिन भर कम्प्यूटर या मोबाइल का इस्तेमाल दिक्कत बढ़ा रहा है। - मानव सिंह बिशेन, बीकेटी स्टूडेंट
नित्या द्विवेदी
- फोटो : अमर उजाला
स्कूल में पढ़ाई, मस्ती साथ करते थे, अब सिर्फ पढ़ना थका रहा
मैं छोटे से गांव में रहती हूं। घर से 10 किमी. दूर स्कूल जाती हूं। हम बच्चों को लगता है कि जैसे किसी ने कैद कर लिया है। हम सब इंतजार कर रहे कि कब लौटेंगे मस्ती भरे दिन। गांव में रहकर ऑनलाइन पढ़ाई के अनुभव अच्छे नहीं रहे। कई बार नंबर पोर्ट कराना पड़ा, क्योंकि नेटवर्क की समस्या थी। आंखों का पानी सूख जाने से बीच में पढ़ाई बंदकर देनी पड़ी थी। मम्मी-पापा कहते हैं कि हम लोग पहले जैसे नहीं रहे, ज्यादा जिद्दी हो गए हैं। सच कहूं तो हम को भी चिंता हो रही है कि बोर्ड है इस बार, कैसे पढ़ाई करेंगे। कोरोना तो जा ही नहीं रहा है। - नित्या द्विवेदी, मोहनलालगंज
मैं छोटे से गांव में रहती हूं। घर से 10 किमी. दूर स्कूल जाती हूं। हम बच्चों को लगता है कि जैसे किसी ने कैद कर लिया है। हम सब इंतजार कर रहे कि कब लौटेंगे मस्ती भरे दिन। गांव में रहकर ऑनलाइन पढ़ाई के अनुभव अच्छे नहीं रहे। कई बार नंबर पोर्ट कराना पड़ा, क्योंकि नेटवर्क की समस्या थी। आंखों का पानी सूख जाने से बीच में पढ़ाई बंदकर देनी पड़ी थी। मम्मी-पापा कहते हैं कि हम लोग पहले जैसे नहीं रहे, ज्यादा जिद्दी हो गए हैं। सच कहूं तो हम को भी चिंता हो रही है कि बोर्ड है इस बार, कैसे पढ़ाई करेंगे। कोरोना तो जा ही नहीं रहा है। - नित्या द्विवेदी, मोहनलालगंज
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डॉ उत्कर्ष
- फोटो : अमर उजाला
कड़ी प्रतिस्पर्धा में और बढ़ी चुनौती
मैं एमबीबीएस कर चुका हूं और आगे की पढ़ाई की तैयारी कर रहा हूं। युवा साथियों में से अधिकतर का यही मानना है कि लॉकडाउन के शुरुआती एक-दो महीने तो अप्रत्याशित होने के कारण इंतजार में ही बीत गए, लेकिन धीरे-धीरे समय बढ़ता गया और नीरसता हावी होती चली गई। ये दीगर है कि घर में परिवार के साथ समय बीता। संस्कार, संस्कृति व पारिवारिक मूल्यों का महत्व जानने का युवा पीढ़ी को मौका मिला, लेकिन दोस्तों के साथ की कमी खलती रही। सबसे बड़ी बात कि सबको आगे की तैयारी करने का खूब समय मिला है। ऐसे में हर कोई एक-दूसरे को कड़ी टक्कर देने को तैयार हुआ है। मुझे लगता है कि आने वाले वक्त में हर युवा को कड़ी स्पर्धा का सामना करना होगा, क्योंकि जिनमें कुछ कर गुजरने का जज्बा है वो खुद को और निखार चुके हैं। - डॉ. उत्कर्ष शील मिश्रा
मैं एमबीबीएस कर चुका हूं और आगे की पढ़ाई की तैयारी कर रहा हूं। युवा साथियों में से अधिकतर का यही मानना है कि लॉकडाउन के शुरुआती एक-दो महीने तो अप्रत्याशित होने के कारण इंतजार में ही बीत गए, लेकिन धीरे-धीरे समय बढ़ता गया और नीरसता हावी होती चली गई। ये दीगर है कि घर में परिवार के साथ समय बीता। संस्कार, संस्कृति व पारिवारिक मूल्यों का महत्व जानने का युवा पीढ़ी को मौका मिला, लेकिन दोस्तों के साथ की कमी खलती रही। सबसे बड़ी बात कि सबको आगे की तैयारी करने का खूब समय मिला है। ऐसे में हर कोई एक-दूसरे को कड़ी टक्कर देने को तैयार हुआ है। मुझे लगता है कि आने वाले वक्त में हर युवा को कड़ी स्पर्धा का सामना करना होगा, क्योंकि जिनमें कुछ कर गुजरने का जज्बा है वो खुद को और निखार चुके हैं। - डॉ. उत्कर्ष शील मिश्रा
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विनय कुमार पाठक
- फोटो : अमर उजाला
स्कूल, कॉलेज, शिक्षक और दोस्तों की भूमिका अहम
एकेटीयू कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक का मानना है कि स्टूडेंट्स के आपस में मिलने से काफी तरह की बातें होती और तनाव कम होता है। इसी तरह स्टूडेंट्स और टीचर संबंध भी तनाव को कम करने में काफी कारगर हैं। उनको नई-नई चीजें भी सीखने को मिलती हैं। कुल मिलाकर एक किशोर और युवा मन जब दुनिया देखना-समझना शुरू करता है तो उसके इस समाजीकरण में स्कूल, कॉलेज, शिक्षक, दोस्तों का साथ सबसे ज्यादा अहम होता है, जो परिवार के बाद जीवन का सबसे मजबूत आधार होते हैं।
एकेटीयू कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक का मानना है कि स्टूडेंट्स के आपस में मिलने से काफी तरह की बातें होती और तनाव कम होता है। इसी तरह स्टूडेंट्स और टीचर संबंध भी तनाव को कम करने में काफी कारगर हैं। उनको नई-नई चीजें भी सीखने को मिलती हैं। कुल मिलाकर एक किशोर और युवा मन जब दुनिया देखना-समझना शुरू करता है तो उसके इस समाजीकरण में स्कूल, कॉलेज, शिक्षक, दोस्तों का साथ सबसे ज्यादा अहम होता है, जो परिवार के बाद जीवन का सबसे मजबूत आधार होते हैं।