भारत के प्राचीन ग्रंथों में योग का जिक्र है। भारत में पुराने समय से ही योग का अभ्यास होता आ रहा है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुरूआत होने से अब देश-विदेश में योग प्रचलित हो गया है। योग करने के लिए जरूरी है कि सही गुरू से इसकी शिक्षा ली जाए। साथ ही एक अच्छा वातावरण और योग मैट बहुत जरूरी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि योग के लिए मैट की जरूरत सबसे पहले किसे महसूस हुई होगी। क्योंकि ये तो तय है कि प्राचीन काल में हमारे साधु-संत मैट पर बैठकर योग नहीं करते थे। तो आखिर कैसे हुई मैट की शुरूआत। चलिए जानें कैसे हुई मैट पर योग करने की शुरूआत।
International Yoga Day 2020: बड़ा ही दिलचस्प है योग मैट का इतिहास, जानिए किसने शुरू किया इसका इस्तेमाल
1970 के दशक में लोग योग करने के लिए दरी या चटाई का इस्तेमाल करते थे। लेकिन समय के साथ इस दरी का स्थान रबर की मैट ने ले ली। लेकिन सवाल ये पैदा होता है कि आखिर योग के लिए मैट का उपयोग करना किसने शुरू किया। तो हम बता दें कि योगा मैट के इस्तेमाल का श्रेय भी योग गुरू बी के एस अयंगर को जाता है। क्योंकि पहले के समय में वो भी सामान्य लोगों की तरह की जमीन पर कंबल बिछाकर योग का अभ्यास करते थे। लेकिन 1960 के दशक में जब उन्होंने यूरोप के देशो में योग की कक्षाएं लेनी आरंभी की तो उन्होने इस बात पर ध्यान दिया कि यूरोपियन छात्रों को फर्श पर खड़े होकर आसन करने में दिक्कत होती है क्योंकि उनके पैर फिसलते रहते थे। जिसकी वजह से उनका ध्यान खुद को गिरने से बचाने में फंसा रहता था और वो योग पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते थे।
हालांकि इस तरह की परेशानी उन्हें भारतीय छात्रों को पढ़ाते समय नहीं आती थी। इसका कारण है यहां के फर्श की बनावट। भारत में ज्यादातर योग बाहर खुले मैदानों में या फिर कुडप्पा नाम की चट्टान से बने पत्थर पर की जाती थी। जबकि पश्चिम फर्श अलग तरह के थे। योग गुरू अयंगर अब हर वक्त इस समस्या का समाधान खोजते रहते थे। तभी अचानक एक दिन जर्मनी में उन्हें कार्पेट के नीचे रखी रबर की चटाई ने गिरते-गिरते बचाया था। तब उन्होंने सोचा कि 'क्या यह मैट योग छात्रों को खड़े होकर आसन करने के दौरान फिसलने से बचाएगी। इस विचार के साथ उन्होंने उस मैट को हटाकर उसका इस्तेमाल किया। खास बात यह कि जैसा कि उन्होंने अनुमान लगाया था उनके पैर चटाई पर नहीं फिसले।
उन्होंने इस हरी रबर की मैट को 'स्टिकी मैट' का नाम दिया। जिसके बाद ब्रिटेन के छात्रों ने जर्मनी से योगा मैट का पहला रबर मैट का सेट खरीदा। जिसके बाद ये ग्रीन मैट या स्टिकी मैट के नाम से मशहूर हुए। कालीनों के नीचे मैट का उपयोग करने का ट्रेंड मर रहा था और कंपनी भी बंद हो रही थी। ऐसे में योग के लिए इन रबर मैट के उपयोग ने इन मैट को पुनर्जीवित कर दिया। बाद में, इसी तरह की नीले मैट जर्मनी में ही बनाए गए। जिसके बाद जर्मनी ही योग मैट का मुख्य निर्माता बन गया था। यद्यपि, यूके, यूरोप और अमेरिका में अयंगर योग चिकित्सकों ने इन योग मैट का उपयोग करना शुरू कर दिया, मुंबई और पुणे के छात्र ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि ये मैट फिलहाल भारत में उपलब्ध नहीं थे और उन्हें इसकी आवश्यकता भी नहीं थी। उनके पैर फर्श पर नहीं फिसलते थे। हालांकि, विदेशी छात्र जो स्रोत सीखने के लिए पुणे आए हुए थे उन्होंने अपने मैट वही छोड़ना शुरू कर दिए। जिसके बाद योग मैट के उत्प्रेरकों ने उन्हें अपने संस्थान में रखा।
पिछले 20 वर्षों में कई देशों को ऐसे मैट्स का निर्माण और निर्यात करते हुए देखा गया है जैसे जर्मनी, यूएसए और चीन में बनते हैं। अब इन मैटों को स्टिकी मैट नहीं बल्कि 'योग' मैट कहा जाता है। इतना ही नहीं अब इन मैट्स को नाइकी और रीबॉक जैसी बड़ी स्पोर्ट्स कंपनियों द्वारा ब्रांडेड मैट के रूप में बेचा जाता है। जिसने योग मैट के निर्माण को एक बिलियन डॉलर का उद्योग बना दिया है। एक बार गुरुजी बीकेएस अयंगर से यह पूछा गया कि उन्होंने अपने इस आइडिया को 'पेटेंट' क्यों नहीं करवाया। जिसके जवाब में उन्होंने कहा, "क्या ऋषि मुनियों ने अपना ज्ञान पेटेंट किया था? "उनके अनुसार यदि उनके ज्ञान से लोगों की मदद होती है तो वो उन्हें मिलना चाहिए। और ऐसे विचारों को पेटेंट करने का कोई सवाल ही नहीं उठता। इस प्रकार योग मैट सार्वभौमिक बन गया।