Raksha Bandhan 2024: 19 अगस्त 2024 को रक्षाबंधन का पर्व है। रक्षाबंधन भाई-बहन के अटूट रिश्ते का सबसे खास त्योहार है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं। बदले में, भाई अपनी बहनों की रक्षा का वचन देते हैं। रक्षाबंधन को और भी खास बनाने के लिए भाई-बहन कुछ विशेष स्थानों पर जाकर इस त्योहार को पूरे उत्साह के साथ मना सकते हैं। हिंदू धर्म में इस त्योहार का विशेष महत्व है, और भारत में कुछ मंदिर ऐसे हैं, जहां रक्षाबंधन के दिन का खास महत्व होता है।
रक्षाबंधन के इस पावन अवसर पर भाई-बहन इन मंदिरों में जाकर भगवान के सामने राखी बांध सकते हैं और इस त्योहार को धूमधाम से मना सकते हैं।
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बंसी नारायण मंदिर, उत्तराखंड
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उत्तराखंड का बंसी नारायण मंदिर
उत्तराखंड में एक ऐसा मंदिर है, जिसके कपाट साल में केवल एक बार ही खोले जाते हैं, और वह दिन होता है रक्षाबंधन का। यह चमत्कारी और अनोखा मंदिर चमोली जिले में स्थित है। रक्षाबंधन के दिन इस मंदिर में बहनें अपने भाइयों को राखी बांधती हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु, वामन अवतार से मुक्त होने के बाद, सबसे पहले यहीं प्रकट हुए थे।
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धर्मराज मंदिर, मथुरा
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मथुरा का यमुना धर्मराज मंदिर
मथुरा में यमराज और उनकी बहन यमुना को समर्पित एक मंदिर है, जो मथुरा के प्रसिद्ध विश्राम घाट पर स्थित है। इस मंदिर में यमराज और यमुना मां की भाई-बहन के रूप में विशेष पूजा होती है। मान्यता है कि भाई-बहन को यमुना नदी में साथ में स्नान करने के बाद इस मंदिर में एक साथ दर्शन करने चाहिए।
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वट वृक्ष
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भैया बहिनी गांव, बिहार
बिहार के सिवान जिले में भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक एक मंदिर है। महाराजगंज अनुमंडल मुख्यालय से 3 किलोमीटर दूर भीखा बांध के पास स्थित भैया बहनी गांव में यह मंदिर है। यहाँ 500 सालों से एक भाई-बहन की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि जिस स्थान पर भाई-बहन ने समाधि ली थी, वहाँ दो वटवृक्ष उत्पन्न हुए, जिनकी जड़ें आज तक किसी को ज्ञात नहीं हैं। मान्यता है कि ये दोनों वटवृक्ष एक-दूसरे की रक्षा करते हैं। रक्षाबंधन के मौके पर भाई-बहन यहाँ आते हैं और वटवृक्ष की परिक्रमा कर इसके नीचे रक्षा सूत्र बांधते हैं।
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बिजनौर का भाई-बहन मंदिर
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बिजनौर का भाई-बहन मंदिर
बिजनौर के चूड़ियाखेड़ा के जंगल में भाई-बहन का एक प्राचीन मंदिर है। कहा जाता है कि सतयुग में एक भाई अपनी बहन को ससुराल से पैदल लेकर लौट रहा था, तब रास्ते में डाकुओं ने उन्हें रोका और बहन के साथ बदसलूकी की। भाई-बहन ने डाकुओं से बचने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की, जिसके बाद वे दोनों पत्थर की प्रतिमा में परिवर्तित हो गए। आज भी इस स्थान पर उनकी प्रतिमाएँ देवी-देवताओं के रूप में स्थापित हैं।