15वीं शताब्दी में बने मां दुर्गा के पांच मंदिर, जहांं नवरात्रि में पहुंचते हैं देशभर के भक्त
51 शक्तिपीठों में से एक नैना देवी मंदिर हिंदू धर्म के पवित्र गंतव्यों में से एक है। मां की आराधना के प्रमुख स्थल में शामिल यह मंदिर उत्तराखंड के नैनीताल में नैनी झील के किनारे स्थित है। सरोवर नगरी नैनीताल के उत्तरी किनारे पर स्थित मां नयना देवी मंदिर भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह मंदिर नेपाल की पैगोड़ा और गौथिक शैली का समावेश है। ऐसी मान्यता है कि ये मंदिर 15वीं शताब्दी में बनाया गया है, लेकिन भूस्खलन के कारण यह नष्ट हो गया था और बाद में 1883 में, मंदिर स्थानीय लोगों द्वारा फिर से बनाया गया। मंदिर के अंदर नैना देवी के साथ गणेशजी और मां काली की भी मूर्तियां हैं। मंदिर के प्रवेशद्वार पर पीपल का एक विशाल वृक्ष है। यहां माता पार्वती को नंदा देवी कहा जाता है। मंदिर में नंदा अष्टमी के दिन भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।
नैना देवी मंदिर 15वीं शताब्दी में बनाया गया था। 1883 में इसका पुनर्निर्माण किया गया था। ऐसी मान्यता है कि जब शिव सती का मृत शरीर लेकर कैलाश पर्वत जा रहे थे, तब जहां-जहां उनके शरीर के अंग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। नैनी झील के स्थान पर देवी सती के नेत्र गिरे थे। इसी से प्रेरित होकर इस मंदिर का नाम नैना देवी पड़ा। प्रचलित मान्यता के अनुसार मां के नैनों से गिरे आंसू ने ही ताल का रूप धारण कर लिया और इसी वजह से इस जगह का नाम नैनीताल पड़ा।
इस मंदिर के अंदर नैना देवी मां की दो नेत्र बने हुए हैं। इन नेत्र के दर्शन मात्र से मां का आशीर्वाद मिलता है। नैना देवी के इस मंदिर की मान्यता है कि अगर कोई भक्त आंखों की समस्या से परेशान है और अगर वह नैना मां के दर्शन कर ले तो जल्द ही ठीक हो जाएगा। नैना देवी नाम का एक अन्य मंदिर हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में भी है।
गुजरात और राजस्थान की सीमा पर बनासकांठा जिले की दांता तालुका में गब्बर पहाड़ियों के ऊपर अम्बाजी का मंदिर बना हुआ है। यह मंदिर लगभग बारह सौ साल पुराना है। सफेद संगमरमर से निर्मित यह मंदिर बेहद भव्य है। मंदिर का शिखर एक सौ तीन फीट ऊंचा है। शिखर पर 358 स्वर्ण कलश सुसज्जित हैं। इस मंदिर में ना तो कोई मां की मूर्ती है ना ही कोई पिंडी। इस मंदिर में मां अम्बाजी की पूजा श्रीयंत्र की आराधना से होती है जिसे भी सीधे आंखों से देखा नहीं जा सकता। यह 51 शक्तिपीठों में से एक है जहां मां सती का हृदय गिरा था। यहां एक पवित्र ज्योति अटूट प्रज्ज्वलित रहती है।