भारतीय परिधानों की खूबसूरती अद्भुत है। उस पर बात जब साड़ी की आती है तो रंग कुछ अलग ही हो जाता है। भारत में साड़ी और भी महत्वपूर्ण पारम्परिक परिधान इसलिए बन जाती है क्योंकि इसे पहनने का तरीका भारत के हर राज्य में अलग और अनूठा है। साथ ही सभी जगह की पारम्परिक डिजाइन और कलाकारी भी साड़ी में जुड़ती है। इसलिए हर जगह साड़ी का अंदाज और रूप-रंग भी बदलता है। खासतौर पर विवाह या ऐसे ही किसी शुभ मौके पर पहनी जाने वाली साड़ी। विवाह की साड़ी को लेकर सबके मन में ख़ास उत्साह होता है। इसलिए इसे खरीदने के लिए दूर दूर शहरों में जाकर बाजार खंगाले जाते हैं। भारत में हर राज्य में विवाह के लिए अलग तरह की साड़ी या परिधान पहनने की परम्परा है। जैसे गुजरात में पानेतर तो महाराष्ट्र में पैठणी।
Maharashtra Paithani: पैठणी के मुरीद हैं तो इन जगहों पर जरूर जाएँ
पैठण की पैठणी
हैंडलूम पर बने वस्त्रों में जितनी खूबसूरती होती है उतनी ही मजबूती और मेहनत भी अधिक होती है। कारीगर इन वस्त्रों को बनाने में कुछ महीनों से लेकर साल भर तक का समय भी लगाते हैं। यह पूरी तरह डिजाइन पर निर्भर करता है। पैठणी भी ऐसी ही कारीगरी का उदाहरण है। महाराष्ट्र में औरंगाबाद के पास स्थित पैठण से इसकी ख़ास पहचान बनी और यहीं से इसे यह नाम भी मिला। इसे प्योर सिल्क पर वर्क करके बनाया जाता है और जरी से सजाया जाता है। पहले सिल्क के लिए चीन पर निर्भर रहना पड़ता था लेकिन अब हमारे देश में ही उपलब्ध सिल्क और जरी का उपयोग पैठणी बनाने के लिये किया जाता है।
मेहनत और कारीगरी
पैठणी की परम्परा राजा महाराजों के समय से जारी है। यूँ पुराने समय में इसमें खरे सोने के तारों की बुनाई बहुत की जाती थी, आज भी होती है लेकिन अब काफी वैरायटी में यह साड़ी बनाई जाने लगी है। एक अच्छी, छह, साढ़े छह मीटर की पैठनी के लिए करीब आधा किलो सिल्क के धागे और करीब ढाई सौ ग्राम जरी का उपयोग किया जाता है, जबकि पारम्परिक नौवारी महाराष्ट्रियन साड़ी में करीब एक किलो से अधिक सिल्क और जरी लग सकती है। आजकल सिल्क के साथ कॉटन व दूसरे फैब्रिक का उपयोग भी किया जाने लगा है। इन साड़ियों में आमतौर पर तोतों, मोर आदि पंछियों और फूलों की डिजाइन उकेरी जाती है और रंग चटख ही रखे जाते हैं। लेकिन इसके अलावा ऑर्डर के हिसाब से भी अलग डिजाइन और रंगों की साड़ियां बनाई जाती हैं। इनकी कीमत 3 हजार से कई लाख रूपये तक हो सकती है। खास ऑर्डर पर तैयार होने वाली साड़ियों की कीमत भी ख़ास होती है। एक साड़ी को बनाने में एक महीने से 1 साल तक का भी समय लग सकता है।
यहां पाइए मनपसंद पैठणी
यूं देशभर में कई शोरूम पर पैठणी उपलब्ध हैं और इन्हें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर भी पाया जा सकता है। मशीनों से बनी सेमी पैठणी भी आजकल बड़े पैमाने पर मिलती है। यह बजट के लिहाज से उतनी महंगी नहीं होती, लेकिन यह बुनी हुई पैठणी जैसी फीलिंग नहीं देती। यदि आपको सीधे हैंडलूम से बनी हुई पैठणी या किसी ख़ास प्रकार की डिजाइन चाहिए तो महाराष्ट्र में कुछ जगहों पर जाकर आप इन्हें पा सकते हैं। यहां पैठणी बनते हुए भी देखी जा सकती है और इन स्थानों पर आस पास भी घूमने के लिहाज से जाया जा सकता है। ऐसे कुछ स्थान हैं-
पैठण
जहां से इस खूबसूरत साड़ी का नाम पड़ा, वही जगह इसके बनने के लिए भी उतनी ही प्रसिद्ध है। औरंगाबाद जिले के अंतर्गत आने वाले इस छोटे से शहर में प्रकृति भी मुस्कुराती मिलेगी। औरंगाबाद से करीब 60 किलोमीटर के दायरे में मौजूद इस शहर में आपको पैठणी की ट्रेडिशनल डिजाइन के साथ कई सारी छोटी-बड़ी दुकानें और कारीगर मिलेंगे। पैठणी खरीदने या बनाने के लिए ऑर्डर करने के बाद आप यहाँ पैदल ही कई जगहों पर घूम सकते हैं। इसमें संत एकनाथ का मंदिर, बर्ड सेंचुरी, नाथसागर बाँध, म्यूजिकल फाउंटेंस वाली ज्ञानेश्वर वाटिका, आदि शामिल हैं। यहाँ या तो आपको औरंगाबाद से टैक्सी करके आना होगा या फिर साइकल पर घूमना होगा। अगर पुणे से आ रहे हैं शेगांव होते हुए आना होगा।