मेरे दोस्त और मोहल्लेवाले समझते हैं कि मैं बस पैसे के लिए निशा के साथ हूँ। वो पैसा कमाती है और मैं खर्च करता हूँ। आम लोगों को भी यही लगता है कि किन्नर पैसे वाले होते हैं। वो शौक से रहते हैं। उनके पास मुफ्त का पैसा होता है और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ कुछ होती नहीं, लेकिन ये लोगों की ग़लतफ़हमी है। ये अधूरा सच है।
एक किन्नर से शादी करने वाले मर्द की कहानी
पहले निशा का नाम प्रवीण था। हम एक ही मोहल्ले में रहते थे। जब मैं प्रवीण से पहली बार मिला, तो वो दसवीं क्लास में था। मैंने छठी क्लास के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। माँ-बाप और बड़े भाई ने काफ़ी समझाया था कि मैं स्कूल जाऊं, पर उन दिनों हम ख़ुद को 'हीरो' समझते थे। आज मैं भले ही उसे 'बुरी संगत' कहूँ, लेकिन जिन लोगों में मैं उठ-बैठ रहा था, उनका मुझ पर काफ़ी असर था। उनमें से ही कुछ लोगों के साथ मिलकर मैंने शादी वाले घरों में जाकर 'घोड़ी', 'टप्पे', 'बन्ने' और कई दूसरे तरह के लोकगीत गाने का काम शुरू किया था। सोलह साल की उम्र में मैं अपने ख़र्चे ख़ुद उठाने लायक हो गया था। उधर, प्रवीण बारहवीं क्लास में आ गया था।
'उसे बांधकर पीटा'
हम दोनों नाबालिग थे और लव-रिलेशन में थे। वो लड़की है या लड़का, इस बात से मुझे कभी फ़र्क महसूस नहीं हुआ। उसका ख़ूबसूरत होना या लड़की जैसा दिखना, मेरे लिए मायने नहीं रखता था। बल्कि जब मैं और प्रवीण मिले थे, तब वो लड़कों की तरह ही पैंट-शर्ट पहनता था। किसी लड़की के साथ रिलेशन में होना कैसा होता है, ये भी मुझे इसलिए पता है क्योंकि प्रवीण से पहले मैं एक लड़की के साथ दो साल तक रिलेशन में था। हमारे शारीरिक संबंध भी थे, लेकिन वो मुझसे आठ साल बड़ी थी। बाद में उसकी शादी हो गई। पर मुझे लगता है कि मैं किसी महिला से रिलेशन होने के मुक़ाबले अब ज़्यादा ख़ुश हूँ। लेकिन प्रवीण के साथ होने का एहसास मुझे हमेशा ही अच्छा लगा।
घर में मैं पति हूँ और वो पत्नी। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रवीण की फ़ीलिंग शुरुआत से ही लड़कियों वाली थी। उसे मेकअप करने का बहुत शौक है। 12वीं क्लास में ही उसने अपने कान छिदवा लिये थे और बाल बढ़ाने शुरू कर दिये थे। यहाँ तक कोई समस्या नहीं थी। लेकिन जब प्रवीण के घरवालों को पता लगा कि उनका बेटा 'लड़का' नहीं है और वो मेरे साथ रिलेशन में है तो उन्होंने रस्सी से बांधकर उसकी पिटाई की और ऐसा सिर्फ़ एक बार नहीं हुआ। उन्होंने प्रवीण को घर से निकाला तो नहीं, लेकिन उसे छत पर बने एक कमरे में रहने को कह दिया और वहाँ पानी और बिजली तक बंद कर दी।
किन्नरों का ग्रुप
वो पढ़ाई कर सके इसके लिए तब मैंने एक बैटरी का इंतज़ाम किया था। मुझे लगता है कि उस वक़्त जो तकलीफ़ें थीं, उनसे हम साथ लड़े, जिस वजह से हमारा रिश्ता और मज़बूत हुआ। मुझे खुशी है कि प्रवीण मुझसे ज़्यादा पढ़ लिख गया। मेरी माँ कहती थी कि पढ़ने-लिखने से दुनिया बदल जाती है, पर प्रवीण के लिए दुनिया नहीं बदली।
'किन्नरों को नौकरी नहीं देंगे', ऐसा कहकर कई लोगों ने प्रवीण को काम पर रखने से मना कर दिया। इसी वजह से प्रवीण ने किन्नरों के समूह में शामिल होने का फ़ैसला किया था। हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। मैं जानता था कि किन्नरों का ग्रुप जॉइन करने का मतलब होगा, शादियों और लोगों की ख़ुशी के मौक़ों पर गाना गा-बजाकर पैसे माँगना।