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मकर संक्रांति का इतिहास और मान्यताएं, जानिए क्यों मनाया जाता है यह पर्व

Wed, 15 Jan 2020 12:05 AM IST
सारंग उपाध्याय लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला Published by: सारंग उपाध्याय Updated Wed, 15 Jan 2020 12:05 AM IST
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makar sankranti 2020 history importance
Makar Sankranti

देशभर में मकर संक्रांति  का पर्व अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। मकर संक्रांति का जहां वैज्ञानिक महत्व है वहीं इस पर्व को मनाने के पीछे धार्मिक मान्यताएं भी हैं। पौराणिक कथाएं भी इस पर्व के मनाने के पीछे एक कारण है। मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन गंगा नदी का धरती पर अवतरण हुआ था। यही वजह है कि इस दिन 'गंगा' नदी में स्नान करने का बहुत बड़ा महत्व माना जाता है। आइए जानते हैं मकर संक्रांति से जुड़ी ऐसी ही कुछ मान्यताओं और महत्व के बारे में...

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शनिदेव - फोटो : सोशल मीडिया

यह पर्व भारतीय ज्योतिष के अनुसार पिता सूर्य और पुत्र शनि की मुलाकात के रूप में भी मनाया जाता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार गुरु की राशि धनु में विचरने वाले सूर्य ग्रह जब मकर यानी की शनिदेव राशि में प्रवेश करते हैं तो माना जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने खुद उनके घर जाते हैं। यही वजह है कि इस खास दिन को मकर संक्रांति के नाम से पहचाना जाता है। 

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सांकेतिक चित्र - फोटो : Social Media

दूसरी मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जा मिली थीं। कहा जाता है कि गंगा को धरती पर लाने वाले भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस खास दिन तर्पण किया था।उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी।यही वजह है कि मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है।

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भीष्म पितामह - फोटो : सोशल मीडिया

महाभारत के भीष्म पितामह ने अपने प्राण त्यागने के लिए, सूर्य के मकर राशि मे आने का इंतजार किया था।सूर्य के उत्तरायण के समय देह त्याग करने या मृत्यु को प्राप्त होने वाली आत्माएं कुछ काल के लिए 'देवलोक' में जाती हैं। जिससे आत्मा को 'पुनर्जन्म' के चक्र से छुटकारा मिल जाता है और इसे 'मोक्ष' प्राप्ति भी कहा जाता है। अतः इस पर्व को मनाने के पीछे यह मान्यता भी है। 

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vishnu - फोटो : social media

कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा करते हुए सभी असुरों के सिर को मंदार पर्वत के नीचे दबा दिया था। इस प्रकार यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता के अंत का दिन भी माना जाता है।

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