साल 2007 में ओपरा विन्फ्री निर्मित और अकेडमी अवॉर्ड विजेता निर्देशक डेंज़ल वॉशिंगटन की निर्देशित बहुप्रशंसित अमरीकी फ़िल्म 'दी ग्रेट डिबेटर्स' याद आती है। इस फ़िल्म में दिखाया गया था कि किस तरह काले लोगों के एक कॉलेज की टीम ने 1930 के दशक में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के गोरे घमंडी डिबेटरों की टीम को एक वैचारिक बहस में हराया था। लेकिन आप सोच रहे होंगे कि गांधी और भीड़ की हिंसा के संदर्भ में यह फ़िल्म यहां प्रासंगिक क्यों है?वह इसलिए कि इस फ़िल्म में उस दौरान अमरीका के दक्षिणी राज्यों में गोरे अमरीकियों की भीड़ से काले अफ्रीकी अमरीकियों की जाने वाली हत्या या लिंचिंग का मार्मिक चित्रण किया गया था। लिचिंग के कारुणिक संदर्भ के साये में गोरे अहंबोध से ग्रस्त हार्वर्ड (वास्तविक इतिहास में साऊथ कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय) के डिबेटरों को पराजित कर उनके मानवीय प्रबोधन के लिए काले डिबेटर बार-बार महात्मा गांधी के नाम और विचारों का सहारा लेते हैं।
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महात्मा गांधी जब ख़ुद लिंच होने से यूं बाल-बाल बचे
Wed, 02 Oct 2019 07:22 AM IST
ललित फुलारा
लाइफस्टाइल डेस्क,अमर उजाला
लाइफस्टाइल डेस्क,अमर उजाला
Published by: ललित फुलारा
Updated Wed, 02 Oct 2019 07:22 AM IST
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महात्मा गांधी
mahatma gandhi
अश्वेत को जिंदा जलाए जाने से जुड़ी चिट्ठी
इस तरह पूरी फ़िल्म में 9 बार लिचिंग का, 11 बार गांधी का नाम लिया जाता है। याद रहे कि उस दौर में महात्मा गांधी यहां भारत में भी ऐसे ही मानवतावादी सवालों पर भारतीयों और ब्रिटिशों का एक साथ सामना कर रहे थे।1931 में ही किसी ने महात्मा गांधी को एक चिट्ठी लिखी जिसमें अमरीका में किसी काले को भीड़ की ओर से ज़िंदा जला दिए जाने से संबंधित 'लिटरेरी डाइजेस्ट' में छपे समाचार का कतरन भी संलग्न था। पत्र लेखक ने गांधी से कहा कि जब कोई अमरीकी अतिथि या भेंटकर्ता आपसे मिलने आए और आपसे अपने देश के लिए संदेश मांगे तो, आप उन्हें यही संदेश दें कि वे वहां भीड़ से काले लोगों की की जानेवाली हत्याओं को बंद कराएं। 14 मई, 1931 को महात्मा गांधी ने इसके जवाब में 'यंग इंडिया' में लिखा, "ऐसी घटनाओं को पढ़कर मन अवसाद से भर आता है। पर मुझे इस बात में तनिक भी संदेह नहीं है कि अमरीकी जनता इस बुराई के प्रति पूरी तरह से जागरूक है और अमरीकी जन-जीवन के इस कलंक को दूर करने की भरसक कोशिश कर रही है."
इस तरह पूरी फ़िल्म में 9 बार लिचिंग का, 11 बार गांधी का नाम लिया जाता है। याद रहे कि उस दौर में महात्मा गांधी यहां भारत में भी ऐसे ही मानवतावादी सवालों पर भारतीयों और ब्रिटिशों का एक साथ सामना कर रहे थे।1931 में ही किसी ने महात्मा गांधी को एक चिट्ठी लिखी जिसमें अमरीका में किसी काले को भीड़ की ओर से ज़िंदा जला दिए जाने से संबंधित 'लिटरेरी डाइजेस्ट' में छपे समाचार का कतरन भी संलग्न था। पत्र लेखक ने गांधी से कहा कि जब कोई अमरीकी अतिथि या भेंटकर्ता आपसे मिलने आए और आपसे अपने देश के लिए संदेश मांगे तो, आप उन्हें यही संदेश दें कि वे वहां भीड़ से काले लोगों की की जानेवाली हत्याओं को बंद कराएं। 14 मई, 1931 को महात्मा गांधी ने इसके जवाब में 'यंग इंडिया' में लिखा, "ऐसी घटनाओं को पढ़कर मन अवसाद से भर आता है। पर मुझे इस बात में तनिक भी संदेह नहीं है कि अमरीकी जनता इस बुराई के प्रति पूरी तरह से जागरूक है और अमरीकी जन-जीवन के इस कलंक को दूर करने की भरसक कोशिश कर रही है."
Mahatma Gandhi
लिंच-न्याय
आज का अमरीकी समाज बहुत हद तक उस भीड़-हिंसा से सचमुच मुक्त हो चुका है, जिसका नाम ही लिंच-न्याय एक अमरीकी कैप्टन विलियम लिंच की प्रवृत्ति की वजह से पड़ा था। लेकिन उसके 90 साल बाद आज क्या दुर्भाग्य है कि हम भारत में भीड़ से हत्याओं की ऐसी ही प्रवृत्ति और घटनाओं पर चर्चा कर रहे हैं और हमें फिर से गांधी याद आ रहे हैं। क्या संयोग है कि 1931 से 34 साल पहले 13 जनवरी, 1897 को ख़ुद गांधी ही भीड़ के हाथों मारे जाने से किसी तरह बचाए जा सके थे। दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर में लगभग 6000 अंग्रेज़ों की उत्तेजित भीड़ ने महात्मा गांधी को घेर लिया था. वह भीड़ अपने नेता से इस क़दर उत्तेजित कर दी गई थी कि वे गांधी को पीट-पीटकर मार डालना चाहते थे। महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा और अन्य अवसरों पर भी विस्तार से इसका वर्णन किया है।
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mahatma gandhi
'गांधी को हमें सौंप दो'
पहले तो भीड़ ने गांधी पर पत्थर और सड़े हुए अंडे बरसाए. फिर किसी ने उनकी पगड़ी उछाल दी. उसके बाद लात और घूंसों की बौछार शुरू हुई।गांधी लगभग बेहोश होकर गिर चुके थे. तभी किसी अंग्रेज़ महिला ने ही उनकी ढाल बनकर किसी तरह उनकी जान बचाई। फिर पुलिस की निगरानी में गांधी अपने एक मित्र पारसी रुस्तमजी के घर पहुंच तो गए, लेकिन हज़ारों की भीड़ ने आकर उस घर को घेर लिया। लोग तीखे शोर में चिल्लाने लगे कि 'गांधी को हमें सौंप दो'। वे लोग उस घर को आग लगा देना चाहते थे. अब उस घर में महिलाओं और बच्चों समेत करीब 20 लोगों की जान दांव पर लगी थी। वहां के पुलिस सुपरिंटेंडें एलेक्ज़ेंडर गांधी के शुभचिंतक थे जबकि वे ख़ुद भी एक अंग्रेज़ थे. उन्होंने भीड़ से गांधी की जान बचाने के लिए एक अनोखी तरकीब अपनाई। उन्होंने गांधी को एक हिन्दुस्तानी सिपाही की वर्दी पहनाकर उनका रूप बदलवा दिया और किसी तरह थाने पहुंचवा दिया. लेकिन दूसरी तरफ़ भीड़ को बहलाने के लिए वे स्वयं भीड़ से एक हिंसक गाना गवाने लगे. गाने के बोल इस प्रकार थे-
'हैंग ओल्ड गांधी
ऑन द साउर एप्पल ट्री'
इसका हिंदी भावानुवाद कुछ इस प्रकार होगा-
'चलो हम बूढ़े गांधी को फांसी पर लटका दें,
इमली के उस पेड़ पर फांसी लटका दें
पहले तो भीड़ ने गांधी पर पत्थर और सड़े हुए अंडे बरसाए. फिर किसी ने उनकी पगड़ी उछाल दी. उसके बाद लात और घूंसों की बौछार शुरू हुई।गांधी लगभग बेहोश होकर गिर चुके थे. तभी किसी अंग्रेज़ महिला ने ही उनकी ढाल बनकर किसी तरह उनकी जान बचाई। फिर पुलिस की निगरानी में गांधी अपने एक मित्र पारसी रुस्तमजी के घर पहुंच तो गए, लेकिन हज़ारों की भीड़ ने आकर उस घर को घेर लिया। लोग तीखे शोर में चिल्लाने लगे कि 'गांधी को हमें सौंप दो'। वे लोग उस घर को आग लगा देना चाहते थे. अब उस घर में महिलाओं और बच्चों समेत करीब 20 लोगों की जान दांव पर लगी थी। वहां के पुलिस सुपरिंटेंडें एलेक्ज़ेंडर गांधी के शुभचिंतक थे जबकि वे ख़ुद भी एक अंग्रेज़ थे. उन्होंने भीड़ से गांधी की जान बचाने के लिए एक अनोखी तरकीब अपनाई। उन्होंने गांधी को एक हिन्दुस्तानी सिपाही की वर्दी पहनाकर उनका रूप बदलवा दिया और किसी तरह थाने पहुंचवा दिया. लेकिन दूसरी तरफ़ भीड़ को बहलाने के लिए वे स्वयं भीड़ से एक हिंसक गाना गवाने लगे. गाने के बोल इस प्रकार थे-
'हैंग ओल्ड गांधी
ऑन द साउर एप्पल ट्री'
इसका हिंदी भावानुवाद कुछ इस प्रकार होगा-
'चलो हम बूढ़े गांधी को फांसी पर लटका दें,
इमली के उस पेड़ पर फांसी लटका दें
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mahatma gandhi
मूर्खों की भीड़ को बुद्धिमानी से संभाला
इसके बाद जब एलेक्ज़ेंडर ने भीड़ को बताया कि उनका शिकार गांधी तो वहां से सुरक्षित निकल भागा है, तो भीड़ में किसी को ग़ुस्सा आया, कोई हँसा, तो बहुतों को उस बात का यक़ीन ही नहीं हुआ। लेकिन भीड़ के प्रतिनिधि ने घर की तलाशी के बाद जब भीड़ के सामने इस ख़बर की पुष्टि की, तो निराश होकर और मन-ही-मन कुछ ग़ुस्सा होते हुए वह भीड़ फिर बिखर गई। गांधी के जीवन से जुड़ी इस सच्ची घटना में दो बातें ध्यान देने की हैं. पहली यह कि उन्हें मारनेवालों की भीड़ भी अंग्रेज़ों की ही थी और उन्हें बचानेवाले लोग भी अंग्रेज़ ही थे। दूसरी बात यह कि अंग्रेज़ पुलिस अधिकारी ने उन्मत्त भीड़ ही हिंसक मानसिकता को पहचानते हुए एक मनोवैज्ञानिक की तरह गांधी को फांसी पर लटकाने वाला वह हिंसक गाना गवाया ताकि हिंसा का वह मवाद मनोरंजक तरीके से उनके दिलो-दिमाग़ से फूटकर बह निकले। उसने दिखाया कि मूर्खों की भीड़ को भी बुद्धिमानी से संभाला जा सकता है और किसी की जान बचाई जा सकती है।
इसके बाद जब एलेक्ज़ेंडर ने भीड़ को बताया कि उनका शिकार गांधी तो वहां से सुरक्षित निकल भागा है, तो भीड़ में किसी को ग़ुस्सा आया, कोई हँसा, तो बहुतों को उस बात का यक़ीन ही नहीं हुआ। लेकिन भीड़ के प्रतिनिधि ने घर की तलाशी के बाद जब भीड़ के सामने इस ख़बर की पुष्टि की, तो निराश होकर और मन-ही-मन कुछ ग़ुस्सा होते हुए वह भीड़ फिर बिखर गई। गांधी के जीवन से जुड़ी इस सच्ची घटना में दो बातें ध्यान देने की हैं. पहली यह कि उन्हें मारनेवालों की भीड़ भी अंग्रेज़ों की ही थी और उन्हें बचानेवाले लोग भी अंग्रेज़ ही थे। दूसरी बात यह कि अंग्रेज़ पुलिस अधिकारी ने उन्मत्त भीड़ ही हिंसक मानसिकता को पहचानते हुए एक मनोवैज्ञानिक की तरह गांधी को फांसी पर लटकाने वाला वह हिंसक गाना गवाया ताकि हिंसा का वह मवाद मनोरंजक तरीके से उनके दिलो-दिमाग़ से फूटकर बह निकले। उसने दिखाया कि मूर्खों की भीड़ को भी बुद्धिमानी से संभाला जा सकता है और किसी की जान बचाई जा सकती है।