भारत में कभी कोई व्यक्ति भूखा नहीं रह सकता क्योंकि यहां प्रतिदिन गुरुद्वारे में लंगर चलता रहता है। लॉकडाउन के दौरान तो इन गुरुद्वारों पर कितने ही लोगों ने खाना खाया है। गुरुद्वारों के कार्यकर्ताओं ने लोगों के घर तक खाना पहुंचाया है। देश में कई गुरुद्वारे ऐसे हैं, जहां 24 घंटे लंगर चलता रहता है। गुरुद्वारे में मिलने वाला प्रसाद बेहद स्वादिष्ठ होता है क्योंकि ये पूरे मन से बनाया जाता है। गुरु नानक जयंती के अवसर पर जानते हैं कि कैसे हुई लंगर की शुरुआत।
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सेवा करना बहुत जरूरी है
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सेवा ही है सच्चा लाभ
गुरु नानक देव से जुड़ी एक कथा है कि एक बार सिखों के पहले गुरु नानक देव जी को उनके पिता ने व्यापार करने के लिए कुछ पैसे दिए, जिसे देकर उन्होंने कहा कि वो बाजार से सौदा करके कुछ कमा कर लाएं। नानक देव जी इन पैसों को लेकर जा रहे थे कि उन्होंने कुछ भिखारियों को देखा, उन्होंने वो पैसे भूखों को खिलाने में खर्च कर दिए और खाली हाथ घर लौट आए। नानक जी की इस हरकत से उनके पिता बहुत गुस्सा हुए, जिसके बाद नानक देव जी ने कहा कि सच्चा लाभ तो सेवा करने में है।
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स्वर्ण मंदिर में चार दरवाजे हैं
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भूखे को खाना जरूर खिलाओ
लंगर की शुरुआत के बारे में यह माना जाता है कि लंगर नानक जी के घर पर ही शुरू हो गया था, जिसे आने वाले गुरुओं ने भी जारी रखा। वे कहते थे कि चाहे अमीर हो या गरीब, ऊंची जाति का हो या नीची जाति, अगर वह भूखा है तो उसे खाना जरूर खिलाओ। इसलिए स्वर्ण मंदिर में चार दरवाजे हैं। जो यही संदेश देते हैं कि व्यक्ति कोई भी हो, उनके लिए चारों दरवाजे खुले हैं।
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गुरु बनने का मतलब सिर्फ गद्दी पर बैठना नहीं होता है
- फोटो : social media
आम लोगों के साथ खाना खाने में मिलती है सच्ची खुशी
गुरु नानक जी कहा करते थे कि गुरु बनने का मतलब यह नहीं कि आप गद्दी पर बैठिए, बल्कि आम लोगों से मिलिए, उनके साथ खाना खाइए, उनसे बात कीजिए, तभी सच्ची खुशी मिलती है और इन्हीं विचारों को आगे गुरुओं ने आत्मसात किया। सिख समुदाय इसलिए सेवा- सहायता करने में सबसे आगे रहता है।