2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती है। गांधी जी के जन्म के 150 साल पूरे होने के बाद भी उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। सत्य और अहिंसा के प्रति उनके अनूठे प्रयोग उन्हें आज दुनिया का सबसे अनूठा व्यक्ति साबित करते हैं।
150वीं गांधी जयंती: प्रकृति और पर्यावरण को लेकर गांधी जी के विचार आज भी हैं प्रासंगिक
महात्मा गांधी का योगदान केवल भारत को स्वतंत्रता दिलाने में ही नहीं था बल्कि उन्होंने पर्यावरण की अशुद्धता और दुरुपयोग के प्रति भी अपनी चिंता जाहिर की थी। गांधी जी केवल हमारे राष्ट्र के ही पिता नहीं हैं बल्कि पर्यावरणविद उन्हें भारत में पर्यावरणीय गतिविधियों के भी पिता के रूप में देखते हैं। पूरे विश्व के पर्यावरण प्रेमी प्रकृति के प्रति उनके प्रेम और किए गए कार्यों को मानते हैं।
प्रकृति के प्रति उनका प्रेम ही था जो प्राकृतिक चिकित्सा के रूप में नजर आता है। महात्मा गांधी के कहे हुए एक ही वक्तव्य से पर्यावरण के प्रति उनके गहरे विचार और चिंता को समझा जा सकता है जो वर्तमान में पर्यावरण के दुरुपयोग के संदर्भ में बिल्कुल सटीक बैठता है।
गांधी जी पृथ्वी को एक जीवित संरचना मानते थे। पर्यावरण के प्रति उनके विचार दो ही थे- पहला कि वो संपूर्ण पृथ्वी को एक ही मानते थे और उनका मानना था कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड और उसमें रहने वाले मनुष्य और जीव-जगत् एक ही शक्ति के द्वारा संचालित हैं।
गांधी जी आधुनिक सभ्यता और विचारों के मुखर आलोचक थे। उनका कहना था कि आधुनिकीकरण का जितना गहरा प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है उतना ही असर पर्यावरण पर भी होता है।
पर्यावरण का विदोहन करके मुठ्ठी भर लोग ही धनी हो सकते हैं, जो केवल कुछ धन और सांसारिक सुख के लालच में ऐसा करते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की सोच उस काल से कितनी आगे थी ये इस बात से प्रमाणित होता है कि वर्तमान समय में हो रहे शहरीकरण को लेकर गांधी जी ने चिंता व्यक्त की थी कि शहरीकरण के कारण गांव कुछ दिन में विलुप्त हो जाएंगे। और ये बात आज के संदर्भ में बिल्कुल सत्य साबित हो रही है। बहुत से पश्चिमी पर्यावरणविद् जहां ये कहते हैं कि 'प्रकृति के पास वापस लौटो' वहीं गांधी जी का कहना था कि 'गांवों की तरफ लौटो।'
गांधी द्वारा किए गए सत्याग्रह आंदोलन से प्रेरित होकर ही बिना किसी हिंसा के चिपको आंदोलन की तर्ज रखी गई थी, जिसमें पर्यावरण और पेड़ों को कटने से बचाने के लिए प्रेम और अंहिसा का सहारा लिया गया था।
गांधी जी प्रकृति के जरूरत से ज्यादा विदोहन के धुर विरोधी थे। उनका मानना था कि प्रकृति से हमें उतना ही लेना चाहिए जितने कि हमें आवश्यकता है। आवश्यकता से अधिक लेकर प्रकृति की बर्बादी नहीं करनी चाहिए।
(संदर्भ स्रोत: mkgandhi.org)