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World Health Day विशेष: मानसिक बीमारियों से भारतीय चिकित्सक परेशान, 80% तनावग्रस्त, कई को जान का भी लगता है डर

Abhilash Srivastava अभिलाष श्रीवास्तव
Updated Fri, 07 Apr 2023 10:57 AM IST
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World Health Day 2023 special, IMA survey says Majority of doctors in India feel stressed and fear of violence
भारतीय डॉक्टर्स में बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं - फोटो : AmarUjala graphic

मौजूदा सामाजिक परिवेश स्वास्थ्य के लिहाज से कई मायनों में चुनौतियां खड़ी कर रहा है। विशेषकर कोरोना महामारी के बाद से शारीरिक और मानसिक, दोनों तरह की सेहत पर इसका प्रतिकूल प्रभाव देखा गया है। कोरोना के कई वैरिएंट्स ने जहां लोगों के लिए गंभीर जटिलताएं पैदा कीं, वहीं समाज में बनी असामान्य स्थितियों का मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर देखने को मिला। अस्पतालों में इलाज के लिए लगी लंबी लाइनों और भागादौड़ी के बीच क्या आपके दिमाग में कभी यह ख्याल आता है कि जो डॉक्टर्स, आपका इलाज कर रहे हैं वे कितने स्वस्थ हैं? यह सवाल इसलिए आवश्यक है क्योंकि सामान्यतौर पर हमें अपनी परेशानी के आगे कुछ दिखाई नहीं देता है और इसी के साथ यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि अगर डॉक्टर्स ही स्वस्थ नहीं हैं तो वह हमारा इलाज किन परिस्थितियों में कर रहे हैं?



आज विश्व स्वास्थ्य दिवस है, सेहत के प्रति लोगों को जागरूक करने का खास दिन। पर इस बार हम उनके स्वास्थ्य की बात करेंगे जिनके पास हम खुद को स्वस्थ रखने की अतिउम्मीद लेकर पहुंचते हैं- हमारे डॉक्टर्स।

डॉक्टर्स कितने स्वस्थ हैं? यह सुनने में अटपटा सा जरूर लग रहा होगा, पर मौजूदा हकीकत इस सवाल को 'आवश्यक सवाल' के तौर पर पूछने को विवश करती है। सदियों से चली आ रही एक रूढ़िवादी सोच- 'डॉक्टर्स भगवान होते हैं' ने संभवत: अनायास भी हमारे दिमाग में इस सवाल को आने ही नहीं दिया, क्योंकि भगवान तो कभी अस्वस्थ हो ही नहीं सकते। पर आंकड़े निश्चित ही इससे उलट और परेशान करने वाले हैं, जो इस बात की ओर भी इशारा करते हैं कि हमें डॉक्टर्स को पहले इंसान और फिर 'धरती का भगवान' मानना होगा।

World Health Day 2023 special, IMA survey says Majority of doctors in India feel stressed and fear of violence
डॉक्टर्स में बढ़ती तनाव की समस्या - फोटो : Pixabay

राजस्थान की दुखद घटना
राजस्थान के दौसा में डॉ अर्चना की आत्महत्या का मामला पिछले दिनों सुर्खियों में रहा। मरीज के परिजनों द्वारा धमकी और प्रताड़ना से तंग आकर डॉक्टर अर्चना ने आत्महत्या कर ली। यह कोई पहला मामला नहीं है, ऐसे न जाने कितने डॉक्टर्स रसूखदार मरीजों के परिजनों के दबाव और कई प्रकार के तनाव को सहन करते रहते हैं। कुछ इस बढ़ते दबाव को बर्दाश्त नहीं कर पाते, अंजाम डॉ अर्चना के रूप में आपके सामने है।

इस पूरी घटना का निचोड़ देखें तो यह समझ आता है कि हम डॉक्टर्स को भगवान ही तो मानते आ रहे हैं। सुनने में तो यह निश्चित ही डॉक्टरों के प्रति सम्मान जैसा ध्वनि करता है पर क्या यह भावनात्मक हानि का कारण नहीं बन रहा? जिसमें हम उनके मानवीय पक्ष को समझना ही नहीं चाहते।

World Health Day 2023 special, IMA survey says Majority of doctors in India feel stressed and fear of violence
तनाव-अवसाद के बढ़ते मामले - फोटो : Pixabay

आंकड़े हैरान करने वाले
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) का हाल ही में किया गया एक सर्वे हैरान कर देने वाला है। इसमें स्पष्ट रूप से बताया गया है कि हमलों और आपराधिक मुकदमे का डर, नींद की कमी तनाव, सामाजिक परिवेश, रूढ़िवादिता के चलते देश में डॉक्टरों का एक बड़ा तबका मानसिक रोगों का शिकार है।

आईएमए का सर्वे कहता है कि देश में 82.7% डॉक्टर अपने पेशे में तनाव महसूस करते हैं। अलग-अलग विभाग से जुड़े देशभर के 1,681 डॉक्टरों पर किए गए इस सर्वेक्षण में शामिल 46.3% डॉक्टरों ने हिंसा के डर को तनाव का मुख्य कारण बताया, वहीं 13.7 फीसदी ने बताया कि उनपर आपराधिक मुकदमा चलाने की आशंका थी। अपने मरीजों को हर रात 6-8 घंटे की नींद पूरी करने की सलाह देने वाले डॉक्टर्स खुद कई कारणों से नींद पूरी नहीं कर पा रहे हैं। काम के दबाव के चलते स्वस्थ आहार तो दूर कइयों को तो दिन का भोजन भी सही से नहीं मिल पाता।

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डॉ सत्यकांत त्रिवेदी - फोटो : AmarUjala Team

''हमें डॉक्टर्स को, और डॉक्टर्स को खुद को भगवान मानना छोड़ना होगा''

''डॉक्टर भी इंसान ही हैं, भगवान नहीं। वह बस मरीजों को सबसे उचित इलाज देने की अपनी पूरी कोशिश भर कर सकते हैं, जो हर डॉक्टर करते भी हैं''- वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ डॉ सत्यकांत त्रिवेदी ने इस बात पर विशेष जोर दिया।

वह कहते हैं- इलाज के दौरान हमें जीत भी मिलती है और हार भी, कई बार ना बचने की उम्मीद से अस्पताल में भर्ती मरीज की जान बच जाती है और कुछ लोगों को लाख को कोशिशों के बाद भी नहीं बचाया जा पाता। इंसान हैं, तो यह दोनों स्थितियां संभव हैं। यह डॉक्टर्स को खुद को और मरीज-परिजनों को भी समझना चाहिए''। 

डॉ सत्यकांत कहते हैं, कई चीजें हैं जिसे बदलने की विशेष आवश्यकता है, जैसे हम डॉक्टर्स को एक तरफ तो भगवान मानते हैं और दूसरी तरफ 'रिटर्न ऑन इनवेसमेंट' चाहते हैं। मतलब अगर आप महंगे अस्पताल में इलाज कराने गए हैं तो पहले ही मान लिया जाता है कि हम ज्यादा पैसा खर्च कर रहे हैं तो मरीज को ठीक होना ही चाहिए। पर क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है? क्या अधिक पैसा जान बचाने की गारंटी है? 

गूगल और सस्ते इंटरनेट के इस दौर में मरीजों का वर्ग भी बदला है। मुख्यत: तीन तरह के लोग इलाज के लिए आ रहे हैं। पहले जो इलाज कराने आते हैं, दूसरा- रोगी ने जो खुद से रोग के बारे में समझा है वह उसकी पुष्टि चाहते हैं और तीसरे वे जो यहां तक कहते हैं कि मुझे ये बीमारी है, इसमें ये टेस्ट और ये दवाइयां लिख दीजिए। मसलन हम डॉक्टरों के प्रति एक अजीब तरह के विश्वास और अविश्वास के दौर से गुजर रहे हैं। डॉक्टरों में बढ़ती मानसिक समस्याओं का एक कारण उनसे मरीजों की अतिशय आशा को, कुछ स्थितियों में अविश्वास को भी माना जा सकता है।

डॉक्टर्स सॉफ्ट टारगेट भी हैं, कभी किसी डॉक्टर को पीट दिया, किसी को धमकी दे दी, किसी को आत्महत्या पर विवश कर दिया। क्या हम सड़क टूटने के कारण होने वाली दुर्घटना के लिए ठेकेदार को जिम्मेदार मानते हुए भी उसके साथ ऐसा करते हैं?- नहीं। डॉक्टर्स को भी यह समझना होगा कि उनकी भी एक सीमा है, वह ब्रह्मा नहीं हैं, जो नियति बदल दें। वैसे नियति तो बदलते ब्रह्मदेव भी नहीं थे, उपाय निकाल देते थे बस।

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डॉ विधि.एम.पिलानिया - फोटो : AmarUjala Team

हम भी तो इंसान ही हैं, पर हमारा दर्द मौन है

बीएसएफ काउंसलर और मनोचिकित्सक डॉ विधि एम. पिलानिया कहती हैं, कई-कई दिन ऐसे बीत जाते थे जब सुबह से चल रही ओपीडी दोपहर 3-4 बजे खत्म होती है। सभी मरीजों को हम पौष्टिक आहार लेने की सलाह दे रहे होते हैं, और ओपीडी के बाद थोड़े से बचे समय में भूख मिटाने के लिए हम समोसे खाने को मजबूर होते हैं। काम के साथ-साथ पढ़ाई, परिवार की चिंता। ऊपर से रसूखदार लोगों के इलाज को लेकर बनाया जा रहा अलग से दबाव, इतनी आसान नहीं है डॉक्टर्स की जिंदगी। 

डॉ अर्चना का मामला दुखद है, पर इस तरह के कई डॉक्टर्स के अंदर अजीबो-पशोपेश  निरंतर चलता रहता है। लोगों की एक अलग लेवल की उम्मीद, जिसमें वो 'न' सुनना ही नहीं चाहते। यह तनाव ज्यादातर चिकित्सक झेल रहे हैं। ऊपर से हमारे देश में डॉक्टर्स की कमी के कारण रोजाना एक-एक डॉक्टर को 100 से अधिक मरीज देखने होते हैं, जो सौ अलग-अलग तरीके के होते हैं। इन परिस्थितयां का बाहरी आवरण तो बहुत सुखद दिखता है, पर अंदर उसका बिल्कुल उल्टा है।

सोचिए अगर डॉक्टर खुद तनाव में रहेगा तो वह आपका इलाज कैसे करेगा? इसलिए स्टीरियोटाइप से निकलकर हकीकत में जीना होगा। डॉक्टर्स भी यह समझें कि उनके हाथ में एक सीमा तक का ही सामर्थ्य है, कोई जादू की छड़ी नहीं। मरीज और उनके परिजन भी इसे समझें तो बेहतर होगा,  जिस दिन इस नासमझी की यह खाई भर गई, निश्चित तौर पर इलाज की गुणवत्ता और मरीजों की संतुष्टि अपने आप बढ़ जाएगी। 

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