कैंसर को जिंदगी का आखिरी पड़ाव मान लेना और पल-पल मौत के इंतजार में जिंदा रहना जरूरी तो नहीं। निदान में देरी और इलाज के अभाव ने इसे इतना भयावह बना दिया है। कैंसर से 2018 में करीब एक करोड़ लोगों की मौत हुई, जबकि करीब दो करोड़ नए मामले सामने आए। लेकिन इन डरावने आंकड़ों की काली घटाओं के बीच रोशनी की भी किरण नजर आती है। हर वर्ष कैंसर से होने वाली मौत की संख्या कम हो रही है।
World Cancer Day Special: भारत से ज्यादा अमेरिका में पैर पसार रहा है कैंसर
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लिम्फोसर्कोमा ऑफ इंटेस्टाइन (कैंसर) से पीड़ित आनंद सहगल, पल-पल मौत की लू के बीच जिंदगी को अपनी जिंदादिली और खुशमिजाजी की ठंडी फुहारों से नम करते हुए अपने राग और अपनी ताल पर जीने की जिद में जब आनंद बोलते हैं, "बाबू मोशाय, जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ है, उसे न तो आप बदल सकते हैं, न मैं, हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं, जिनकी डोर ऊपर वाले की उंगलियों में बंधी है। ....बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं।" यह सुनकर बरबस ही दिल-दिमाग पर ‘आनंद’ छाने लगता है।
1970 के दशक में जब यह 'आनंद' फिल्म बनी थी, तब कैंसर इतनी आम बीमारी नहीं होती थी। लेकिन, अब कहानी कुछ और है। हर डॉक्टर भी भास्कर बनर्जी की तरह नहीं होता और न ही हर कैंसर पीड़ित आनंद सहगल हो सकता है। भारत में करीब 25 लाख लोग कैंसर से पीड़ित हैं। इनमें हर साल 7 लाख नए मामले जुड़ते हैं और हर साल करीब 5 लाख लोग कैंसर की वजह से मर जाते हैं। अब यह तो नहीं कह सकते कि 25 लाख लोग आनंद सहगल बन जाएं। लेकिन यह जरूर बताना चाहेंगे कि कैंसर के साथ जिंदगी को खत्म न होने दें और अपनी जिंदगी को मायने देने का काम खुद ही करना होता है। वक्त के साथ कैंसर के इलाज की तकनीक भी बदल रही है। दुनियाभर में अब दिन-ब-दिन कैंसर से होने वाली मौतें कम हो रही हैं और हर पखवाड़े कोई न कोई नई चीज सामने आती है, जो कैंसर से पीड़ित लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाती है।
कैंसर से पूरी दुनिया में 2018 में करीब एक करोड़ लोगों की मौत हुई, जबकि करीब 2 करोड़ नए मामले सामने आए। लेकिन इन डरावने आंकड़ों की काली घटाओं के बीच रोशनी की एक किरण नजर आती है। हर वर्ष कैंसर से होने वाली मौत की संख्या कम हो रही है। कैंसर की शीर्ष मृत्यु दर (1991 में 1 लाख में से 215) के मुकाबले 2018 में कैंसर से होने वाली मृत्यु दर में करीब 26 फीसदी की कमी आई है।
पिछले एक दशक से इसमें लगातार कमी आ रही है। अगर भारत के संदर्भ में बात करें, तो यकीनन पिछले कुछ वर्षों में कैंसर भारत में महामारी की तरह फैला है। लेकिन अगर प्रत्येक एक लाख लोगों में कैंसर के मामलों को लेकर अमेरिका से तुलना करें तो भारत की स्थिति काफी बेहतर है। अमेरिका में जहां प्रत्येक एक लाख लोगों में से 300 के करीब लोगों को कैंसर है, वहीं भारत में एक लाख लोगों में से करीब 100 लोगों को कैंसर है। लेकिन भारत में ब्रेस्ट और ओवेरियन कैंसर के मामलों में मौत की दर दुनिया में सबसे ज्यादा है। भारत में मातृत्व मृत्यु दर की तुलना में ब्रेस्ट और ओवेरियन कैंसर से होने वाली मौतें 1.7 फीसदी ज्यादा हैं। यह बात थोड़ी परेशान करने वाली है कि जहां एक तरफ दुनिया में कैंसर से होने वाली मौत की तादाद में कमी आ रही है, वहीं भारत में कैंसर से होने वाली मौतों में साल दर साल इजाफा हो रहा है। भारत में कैंसर होने की दर तो कम है, लेकिन कैंसर से पीड़ित लोगों की मौत की दर काफी ज्यादा है। इसके लिए भारत में कैंसर के निदान में देरी को बड़ी वजह मान सकते हैं। भारत में कैंसर के 50 फीसदी से ज्यादा मामलों का खुलासा तीसरे या चौथे चरण के कैंसर के दौरान होता है, जिसकी वजह से इलाज मुश्किल होता है। एक अनुमान के मुताबिक अगर भारत में कैंसर की पहचान पर काम किया जाए और कैंसर पीड़ित लोगों में कैंसर की पहचान शुरुआती अवस्था में हो जाए, तो करीब 60 फीसदी लोगों की मौत को टाला जा सकता है।