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कोरोना से जंग: जानिए क्या होती है एक्टिव और पैसिव इम्यूनिटी? शरीर में कैसे होता है इनका निर्माण?

Sun, 01 Aug 2021 12:11 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Abhilash Srivastava Updated Sun, 01 Aug 2021 12:11 PM IST
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कोरोना संक्रमण के खिलाफ शरीर में बनी इम्यूनिटी (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

Medically Reviewed by-


डॉ शुचिन बजाज
निदेशक, उजाला सिग्नस हॉस्पिटल्स


कोरोना संक्रमण से मुकाबले के लिए शरीर में इम्यूनिटी के महत्व के बारे में अब तक आप सभी अच्छी तरह से जान चुके होंगे। पिछले डेढ़ साल से ज्यादा वक्त से लोगों को इम्यूनिटी मजबूत करने के उपाय करने की सलाह दी जा रही है। कोई काढ़े का सेवन कर रहा है तो कोई विटामिन्स और सप्लीमेंट्स ले रहा है, पर क्या आप जानते हैं कि इम्यूनिटी आखिर किस तरह से शरीर को सुरक्षित रखने में सहायता करती है?
हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली एंटीबॉडीज उत्पन्न करती हैं जो भविष्य में उस वायरस के संक्रमण से शरीर को सुरक्षित रखने में मदद करती है। यही कारण है कि वायरस के दोबारा संपर्क में आते ही हमारा इम्यून सिस्टम उससे मुकाबले के लिए तुरंत प्रतिक्रिया करता है। यहां जानना आवश्यक हैं कि हमारा शरीर वायरस से मुकाबले के लिए दो तरह की इम्यूनिटी का निर्माण करता है- एक्टिव इम्यूनिटी और पैसिव इम्यूनिटी। आइएस इस लेख में विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर इन दोनों तरह की इम्यूनिटी का शरीर में किस तरह से निर्माण होता है, साथ ही संक्रमण से सुरक्षा देने में इनका क्या रोल हो सकता है?

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शरीर में कोरोना के खिलाफ एंटीबॉडीज (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

एंटीबॉडीज के बारे में जानिए
एक्टिव इम्यूनिटी और पैसिव इम्यूनिटी के बारे में जानने से पहले आपको एंटीबॉडीज के बारे में जानना आवश्यक है। उजाला सिग्नस हॉस्पिटल्स के निदेशक डॉ शुचिन बजाज बताते हैं, जब भी कोई रोगाणु हमारे शरीर में प्रवेश करता है, तो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली उनसे लड़ने के लिए रक्षात्मक प्रोटीन का उत्पादन करती है जिसे एंटीबॉडी कहा जाता है। वायरस के संपर्क में आने पर हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा मुख्य रूप से दो प्रकार के एंटीबॉडी का उत्पादन किया जाता है- इम्युनोग्लोबुलिन एम (आईजीएम) और इम्युनोग्लोबुलिन जी (आईजीजी)।

  • इम्युनोग्लोबुलिन एम (आईजीएम): हमारी आंतरिक प्रणाली रोगजनक पैदा करने वाली किसी भी बीमारी के संपर्क में आने के बाद सबसे पहले इस एंटीबॉडी का उत्पादन करती है।
  • इम्युनोग्लोबुलिन जी (आईजीजी): यह एंटीबॉडी बाद में प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा निर्मित होते हैं और मेमोरी सेल के रूप में कार्य करते हैं।
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शरीर को संक्रमण से सुरक्षित रखनी है इम्यूनिटी (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

एक्टिव इम्यूनिटी
एक्टिव इम्यूनिटी, शरीर में किसी भी एंटीजन के जवाब में एंटीबॉडी के उत्पादन को संदर्भित करता है। जब शरीर रोग से लड़ने के लिए एंटीबॉडी का उत्पादन करने के लिए प्रेरित होता है, उस समय प्रतिरक्षा प्रणाली एक्टिव इम्यूनिटी की निर्माण करती हैं। ये प्राकृतिक संक्रमण या वैक्सीनेशन, दोनों ही माध्यम से विकसित हो सकती हैं। 
कोरोना वायरस के संदर्भ में बात करें तो वायरस के संपर्क में आने के 2 सप्ताह के भीतर शरीर में एंटीबॉडी विकसित हो जाती हैं। एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि कोविड-19 से ठीक होने के कुछ महीनों बाद एंटीबॉडी का स्तर तेजी से गिरने लगता है। ऐसे में प्रतिरक्षा कितने समय तक बनी रह सकती है, यह जानने के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता है।

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शरीर में मजबूत इम्यूनिटी होना आवश्यक (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

पैसिव इम्यूनिटी
पैसिव इम्यूनिटी, उन इम्यूनिटी को कहा जाता है जिनका शरीर स्वयं से निर्माण नहीं करती है। जैसे नवजात शिशु अपनी मां से प्लेसेंटा के जरिए रोग प्रतिरोधक क्षमता हासिल कर लेता है। प्लाज्मा ट्रास्फ्यूजन भी ऐसा ही एक तरीका है। पैसिव इम्यूनिटी के मामले में व्यक्ति को संक्रमण से तत्काल सुरक्षा तो मिल जाती है लेकिन इस सुरक्षा को दीर्घकालिक नहीं माना जा सकता है। पैसिव इम्यूनिटी विकसित करने के लिए कई सारी थेरपी उपलब्ध हैं।

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इम्यून सिस्टम को बनाएं मजबूत (प्रतीकात्मक) - फोटो : Social media

इम्यून सिस्टम को कमजोर कर सकते हैं यह कारक
हमारा इम्यून सिस्टम कितनी एंटीबॉडी का उत्पादन करेगा और वह कितने समय तक सक्रिय रहेंगी, यह हमारे नियंत्रण में नहीं है। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक कुछ कारक हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर सकते हैं, जिसके कारण शरीर में एंटीबॉडीज का उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है। बुढ़ापा, इम्यूनो सप्रेसिव दवाइयां, एचआईवी या एड्स, कैंसर का इलाज, इम्यूनोडिफ़िशिएंसी विकार, आहार में पोषकता की कमी, तनाव, धूम्रपान और अत्यधिक शराब का सेवन इम्यून सिस्टम को कमजोर कर सकती हैं।



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नोट: यह लेख उजाला सिग्नस हॉस्पिटल्स के निदेशक डॉ शुचिन बजाज के सुझावों के आधार  पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
 

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