लखनऊ में एक 16 साल के बच्चे ने अपनी मां की गोली मारकर हत्या कर दी। मां के शव को दो दिन और तीन रातों तक घर पर छुपा कर रखा। छोटी बहन को कुछ न बताने की धमकी दी और शव से आने वाली बदबू को मिटाने के लिए रूम फ्रेशनर, डियोड्रेंट का इस्तेमाल करता रहा। हालांकि जब शव की बदबू बर्दाश्त नहीं हो सकी तो पुलिस को सूचना दी और मनगढ़ंत कहानियां सुनाकर बचने की कोशिश करता रहा। बच्चा पबजी गेम का एडिक्ट था। ये विश्वास करना कठिन है कि महज 16 साल का नाबालिग एक अपराधी की तरह बर्ताव कर सकता है। ये कोई पहला मामला नहीं, जनवरी में पाकिस्तान में 14 साल के बच्चे ने अपनी मां, दो बहनों समेत पूरे परिवार की पबजी के प्रभाव में आकर हत्या कर दी थी। बच्चे पबजी और ब्लू व्हेल जैसे गेम के कारण आक्रामक होते जा रहे हैं। क्या इन गेम के कारण बच्चों की मनोदशा किसी अपराधी के जैसी हो रही है या अन्य कुछ कारण भी हैं? मनोचिकित्सीय सलाह से आप जान सकते हैं कि बच्चों के हिंसक और आपराधिक प्रवृत्ति के होने की वजह क्या है और इसके लक्षण व इलाज क्या हैं।
PUBG के लिए मां की हत्या: मनोचिकित्सक से जानें बच्चे क्यों हो रहे आक्रामक, लक्षण और उपचार
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पबजी जैसे गेम्स का बच्चों पर असर
मनोविज्ञान की प्रोफेसर डॉक्टर विधि पिलानिया के मुताबिक पबजी और ब्लू व्हेल जैसे गेम को जिस तरह से डिस्प्ले किया जाता है, वह बच्चों के गुस्से को बढ़ाती है और आजकल बच्चे ज्यादातर समय इन चीजों के साथ बिताते हैं। बच्चे हर चीज ऑब्ज़र्वेशनल लर्निंग से सीखते हैं। उनकी समझने की क्षमता थोड़ी कम होती है और देखकर सीखने की क्षमता ज्यादा होती है। वहीं आजकल जो गेम बनाए जा रहे हैं, उनमें हिंसा और आक्रामकता बहुत ज्यादा होती है। बच्चे लंबे समय तक स्क्रीन पर इन चीजों को देखते हैं तो वायलेंस उनकी लाइफ का एक हिस्सा बन जाता है। बच्चों को इस चीज की लत लग जाती है। वही जब उनके और उनकी लत के बीच कोई आता है तो वह बच्चों का दुश्मन हो जाता है।
गेम न खेलने वाले बच्चों में आक्रामक व्यवहार की वजह
कई मामलों में जिन बच्चों में वीडियो गेम की आदत नहीं होती है, वह भी हिंसक और गुस्सैल हो जाते हैं। इसके पीछे की वजह बताते हुए प्रोफेसर पिलानिया ने कहा कि दो तरह का गुस्सा होता है- कई बार बच्चे अपने गुस्से को दबाकर रखते हैं, तो कुछ बच्चे एक्सप्रेसिव होते हैं, जिनका गुस्सा नजर आ जाता है। जो बच्चे इंटरनलाइजिंग डिसऑर्डर से पीड़ित होते हैं, वह अपनी भावनाएं बता नहीं पाते। फ्रस्टेशन कंट्रोल करते रहते हैं, इसकी वजह पेरेंटिंग होती है। जैसे बच्चे को अभिभावक डांटते न हो लेकिन अचानक से कभी बहुत ज्यादा डांट देते हैं, तो बच्चा उनकी डांट को सहन नहीं कर पाता है। वहीं जहां प्रोटेक्टिव पेरेंटिंग ज्यादा होती है, वहां भी इस तरह के मामले देखने में आते हैं कि बच्चे की जिद हमेशा पूरी करते हैं, कभी डांटते नहीं लेकिन अगर उन्हें माता पिता ने या फिर स्कूल में टीचर ने डांट दिया तो वह उसे बर्दाश्त नहीं कर पाते। ऐसे में बच्चे खुद को नुकसान पहुंचाते हैं या सामने वाले पर आक्रामक हो जाते हैं।
बच्चों को आक्रामक होने से बचाने का तरीका
इस तरह के मामलों में अभिभावकों को बच्चों को सही पालन पोषण करने की जरूरत है। बच्चों के व्यवहार को सही तरह से माॅनिटराइज करें। बच्चा अपने गुस्से को कहीं इंटरनलाइज तो नहीं कर रहा। ये भी ध्यान दें कि ओवर प्रोटेक्टिव होने के बजाए बच्चे को सही सीख दें। समय समय पर उसके व्यवहार को माॅनिटराइज करें और गलत व्यहार करने पर उसे सही करें। बच्चों को समय समय पर डांटना, समझाना ये सब करते रहें। बहुत ज्यादा लाड प्यार के बाद जब आप बच्चे को किसी बात पर डांटते हैं तो वह उसे टाॅलरेट नहीं कर पाते। बच्चों को रियलिटी से आप जितना दूर रखते हैं, उनका टॉलेरेंस उतना ही कम हो जाता है। इससे बच्चे में बदले की भावना, अपने आप को चोट पहुंचाना या गुस्से में दूसरे को चोट पहुंचाने की भावना आने लगती है।
बच्चों में मनोविकार के लक्षण
-बच्चे को लगातार मॉनिटर करते रहें अगर आप पाते हैं कि बच्चा अगर अचानक से अपने कमरे में बंद रहने लगा है।
-वह अकेले खाना खाने लगे। आपके साथ वक्त नहीं बिताना चाहता।
-जो चीजे और कामों को पहले वह एंजॉय करता था, अब वह उन चीजों को एंजॉय नहीं करता।
-अधिकतर समय टीवी या मोबाइल में व्यस्त रहने लगे।
-बच्चा अगर झूठ बोलने लगे या चोरी करने लगे।
-बच्चा गलत शब्दों का इस्तेमाल करने लगे।
-अकेला रहना ज्यादा पसंद करने लगे तो आपको समझ जाना चाहिए कि बच्चे की मनो दशा ठीक नहीं है।