मुंबई का हाफकिन जीवऔषध महानिर्माण मंडल कुछ साल पहले उस समय अचानक चर्चा में आ गया था जब शिवसेना ने इसके परिसर में बाल ठाकरे मेमोरियल के निर्माण की कोशिश शुरू कर दी थी। बाद में इस स्मारक की जगह तो बदल गई लेकिन इस पूरे प्रकरण ने यह बता दिया कि हम उस शख्स के योगदान को किस कदर भूल चुके हैं जिसने भारत को एक नहीं दो महामारियों से बाहर निकालने में बड़ी भूमिका निभाई थी।
भारत में ऐसे हुआ था हैजा और प्लेग की वैक्सीन का प्रयोग, कोरोना से जंग में ले सकते हैं प्रेरणा
पास्चर इंस्टीट्यूट में हालांकि उन्हें सहायक लाइब्रेरियन का पद मिला लेकिन बैक्टीरियोलॉजी का अपना अध्ययन उन्होंने जारी रखा, जो जल्द ही हैजा की वैक्सीन बनाने की ओर मुड़ गया। हाफकिन ने इस वैक्सीन का पहले मुर्गे और गिनीपिग पर परीक्षण किया और फिर खुद को वैक्सीन का इंजेक्शन लगाया। उन्होंने जो वैक्सीन तैयार की, उसके दो इंजेक्शन एक तय अंतराल में लगवाने पड़ते थे। संतुष्ट होने पर जब उन्होंने इसके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की बात सोची तो तमाम विशेषज्ञ उनसे असहमत दिखाई दिए। यहां तक कि उनके गुरु लुई पास्चर भी उनसे सहमत नहीं थे।
भारत में भारी विरोध
पहले ही एक वैक्सीन का दावा गलत साबित हो चुका था और यह कहा जाने लगा था कि हैजा मुख्य रूप से आंतों के भीतर का रोग है और इसमें वैक्सीन कामयाब नहीं हो सकती। इस बीच संयोग से हाफकिन की मुलाकात लॉर्ड फ्रेडरिक हेमिल्टन डफरिन से हुई जो उस समय पेरिस में ब्रिटिश राजदूत थे और इसके पहले भारत के वाइसराय भी रह चुके थे। भारत में बड़े पैमाने पर हैजा फैल चुका था। लॉर्ड फ्रेडरिक का मानना था कि इस वैक्सीन का इस्तेमाल बंगाल में होना चाहिए। उनकी कोशिशों ने जल्द ही हाफकिन को भारत पहुंचा दिया।
मार्च 1893 में जब वो कोलकाता पहुंचे तो कई तरह के विरोध वहां उनका इंतजार कर रहे थे। वैक्सीन कामयाब हो सकती है इस पर तो शक था ही, जर्नल ऑफ मेडिकल बायोग्राफी के अनुसार तब यह भी कहा जा रहा था कि पेरिस में उन्होंने जिस जीवाणु पर सारे प्रयोग किए हैं, भारत में हैजा फैलाने वाले जीवाणु की किस्म उससे अलग है इसलिए इसका कोई फायदा नहीं होने वाला।
यह भी कहा जा रहा था कि भारत के आम लोग महामारी को दैवी आपदा मानते हैं और इसके लिए ऐलोपैथिक दवा तक नहीं लेते। वो भला इसके लिए दो दर्द देने वाले इंजेक्शन लगवाने को कैसे तैयार होंगे?
इन सारे विरोधों के बीच हाफकिन ने अपनी प्रयोगशाला तो बना कर दी लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह थी कि जब वे बंगाल पहुंचे तो वहां हैजा का प्रकोप खत्म हो चुका था। हालांकि अवध और पंजाब प्रांत में इसका अभी भी प्रकोप जारी था।
दुनिया का पहला बड़े पैमाने पर हुआ वैक्सीन परीक्षण
सबसे बड़ी दिक्कत सेना को आ रही थी और सेना ने ही हाफकिन से संपर्क किया। वो सबसे पहले आगरा गए और फिर उत्तर भारत की छावनियों में उन्होंने घूम-घूम कर लगभग 10 हजार सैनिकों को उन्होंने इंजेक्शन लगाए। प्रयोग सफल रहा और देश भर में हाफकिन की मांग होने लगी।
कोलकाता में हैजा का प्रकोप लौटा तो वहां उन्हें बुलाया गया। वो असम के चाय बागान मजदूरों के पास भी गए और गया की जेल में भी। कुछ ही समय में उन्होंने 42 हजार से ज्यादा लोगों को वैक्सीन दी। इसे दुनिया का पहला बड़े पैमाने पर हुआ वैक्सीन परीक्षण माना जाता है। जल्द ही हाफमैन ने वैक्सीन का नया संस्करण तैयार किया जिसमें एक ही इंजेक्शन लगवाने की जरूरत रह गई।
भारत हैजा की महामारी से मुक्त हुआ तो यहां व्यूबोनिक प्लेग ने दस्तक दी। प्लेग का कहर और भय हैजा से कहीं ज्यादा था क्योंकि यह आधे से ज्यादा संक्रमित लोगों की जान ले लेता है। इस बार भी वैक्सीन तैयार करने की जिम्मेदारी हाफकिन को दी गई और उन्हें इसके लिए मुंबई आमत्रित किया गया। जहां ग्रांट मेडिकल कॉलेज में उनके लिए प्रयोगशाला बनाई गई।
हाफकिन अक्टूबर 1896 में वहां पहुंचे और तीन महीने के अंदर ही उन्होंने न सिर्फ वैक्सीन तैयार कर ली बल्कि एक खरगोश पर इसका पहला सफल परीक्षण भी कर लिया। इस बार भी उन्होंने वही तरीका अपनाया और सबसे पहला मानव परीक्षण खुद पर किया। लेकिन इसका असल परीक्षण हुआ पड़ोस की भायखला जेल के कैदियों पर। उन दिनों दवाओं का कैदियों पर परीक्षण कोई नई बात नहीं थी।