नए कोरोना वायरस के कारण फैली कोविड-19 की महामारी में उन मरीजों का इन दिनों अक्सर जिक्र हो रहा है जिनमें इस बीमारी के लक्षण नहीं दिखाई देते हैं। इसलिए मैरी मैलन को याद करना जरूरी है। वो इतिहास की पहली ऐसी मरीज थीं जिनमें बीमारी का कोई लक्षण नहीं था। ये 19वीं सदी की शुरुआत की बात है। तब अमरीका में मियादी बुखार (टाइफाइड) फैला था। मैरी इससे संक्रमित 50 लोगों में से एक थीं। संक्रमण से होने वाली बीमारियों में परिवार, प्रशासन और डॉक्टरों के लिए लंबे समय तक ये बात एक अबूझ पहेली की तरह ही रही कि ऐसा कैसे हो सकता है, बीमारी भी हो और लक्षण भी न दिखें। लेकिन 110 साल पहले मैरी इस वजह से अमेरिका की सबसे बदनाम औरतों में शुमार हो गई थीं।
टाइफाइड मैरीः पहली मरीज जिसमें बीमारी का कोई लक्षण नहीं था, तीन साल क्वारंटीन में रहीं
एक प्रवासी की कहानी
मैरी मैलन 1883 में आयरलैंड से अमरीका आई थीं। तब वे किशोर उम्र में थीं। अमरीका में उन्हें खाना बनाने और नौकरानी का काम मिला। शुरू में उन्होंने न्यूयॉर्क और लॉन्ग आइलैंड जैसे शहरों में काम किया, जहां पहली बार मियादी बुखार का संक्रमण शुरू हुआ।
तब तक उन्हें कोई जानता भी नहीं था लेकिन साल 1907 तक उस इलाके में संक्रमण के 30 ऐसे मामले सामने आए जो डॉक्टरों के लिए परेशानी का सबब बन गए। ये तलाश शुरू हुई कि बीमारी पहली बार कहां से फैली और किस-किस से होते हुए आगे बढ़ती गई।
तब तक स्वास्थ्य विभाग के लोग इस असामान्य महामारी की वजह पानी या खाने की खराबी को मान रहे थे। हैरानी की एक दूसरी वजह भी थी। तब तक ये माना जाता था कि न्यूयॉर्क के ग़रीब इलाकों में ही टाइफाइड फैलता है और समृद्ध इलाके इससे अछूते रहते हैं।
मैरी मैलन पर शक
लेकिन इस बार समृद्ध इलाकों के उन घरों में, जो मैरी मैलन जैसी महिलाओं को घरेलू काम के लिए रख सकती थीं, ये बीमारी फैलने लगी थी। उस वक्त तक विज्ञान ने महामारियों के तौर-तरीके समझने लायक तरक्की कर ली थी और कुछ संक्रामक बीमारियों के तो वैक्सीन भी डेवलप कर लिए गए थे। तब तक अमेरिका डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को टाइफाइड जैसी बीमारियों में 'एसिम्प्टोमैटिक कैरियर' जैसे किसी मामले के बारे में पता नहीं था।
इसलिए ये समझे बगैर कि इस बीमारी का मूल कारण कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो सालों तक बिना बुखार का लक्षण दिखाए, अनजाने में इसका संक्रमण फैलाता रहा हो, डॉक्टर और वैज्ञानिक अलग-अलग संभावनाओं पर विचार करते रहे। लेकिन 1907 में मैनहट्टन के पार्क एवेन्यु पर एक घर में एक नया केस आया और न्यूयॉर्क के स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टर जार्ज सोपर को मैरी मैलन पर शक हो गया।
सैल्मनेल बैक्टीरिया
महामारी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर जार्ज सोपर ने पाया कि मैरी उस घर में काम कर रही थीं। और उन्होंने ये भी पता लगा लिया कि अतीत में जिन घरों में संक्रमण के मामले सामने आए हैं, मैरी वहां भी काम कर चुकी थीं। डॉक्टर जार्ज सोपर ने मेडिकल जांच के बाद बताया कि मैरी में मियादी बुखार फैलाने वाला सैल्मनेल बैक्टीरिया मौजूद है।
हालांकि इस मेडिकल जांच को अंजाम देने के लिए स्वास्थ्य विभाग और पुलिस के अधिकारियों को दखल देनी पड़ी। डॉक्टर सोपर ने कई सालों बाद ये बताया कि उस महिला से जांच के लिए सैंपल लेने में बहुत मुश्किल पेश आई थी जिसे उन्होंने खुद कभी बदलचलन, जिद्दी और अकेली रहने वाली औरत कहा था।
तीन साल तक क्वारंटीन
जैसे ही मैरी मैलन के बारे में दुनिया को पता चल गया, न्यूयॉर्क की मीडिया में वो बदनाम हो गईं। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का ये मानना था कि मैरी अनिश्चितकाल तक इस बैक्टीरिया की 'एसिम्प्टोमैटिक कैरियर' बने रहने की क्षमता रखती हैं।
अस्पताल के किसी कोने में एक वीरान से कमरे में मैरी को हफ्तों आइसोलेशन में रखने के बाद ये तय किया गया कि उन्हें एक छोटे से द्वीप पर बने मेडिकल सेंटर में क्वारंटीन में रखा जाएगा। तीन साल तक (1907 से 1910) उन्हें ऐसे कमरे में रखा गया जहां, उनके लिए खाना रख दिया जाता था ताकि वे उसे पकाकर अकेले खा लें।
तब तक लोकल प्रेस में मैरी मैलन का नाम टाइफाइड मैरी हो गया। हेल्थ मैगजीन्स ने उन पर लिखना शुरू कर दिया। मैरी ने संक्रमण फैलाने के आरोप को कभी स्वीकार नहीं किया और न ही तीन साल की क्वारंटीन अवधि के दौरान आजादी हासिल करने की कोशिश ही की।