जीवनशैली जनित जिस बीमारी ने पिछले कुछ समय में सबसे तेजी से हमारे देश में पैर पसारे हैं, उनमें डायबिटीज का नाम सबसे ऊपर है। अब तो उम्र, वर्ग भी इसका मापदण्ड नहीं रह गया। किसी को भी यह बीमारी चपेट में आसानी से ले सकती है। उससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि शरीर में शकर के असन्तुलन से अन्य कई गम्भीर और जानलेवा बीमारियों का हमला भी आसान हो जाता है।
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कई प्रकार से हो सकती है समस्या
गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज कई रूपों में साथ रह सकती है। इसमें टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज के अलावा जेस्टेशनल डाइबिटीज भी एक बड़ी चुनौती के रूप में शामिल हो सकती है। जेस्टेशनल डायबिटीज अर्थात खासतौर पर गर्भावस्था के दौरान होने वाला रक्त शर्करा यानी शुगर का असन्तुलन। चूँकि गर्भावस्था अपने आप में शरीर में हार्मोनल उथल पुथल पैदा करती है। ऐसे में शरीर के लिए इससे तालमेल बैठाना आसान नहीं होता। खून में शकर का असन्तुलन इसमें जुड़कर और खराब स्थिति पैदा कर सकता है।
ये हो सकती हैं परेशानियां
गर्भावस्था के समय डायबिटीज़ का सामने आना या इसका पहले से शरीर मे मौजूद रहना, दोनों ही स्थितियों में यह मां और बच्चे दोनों की ज़िंदगी के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है। इसके कारण बच्चे में जन्मगत विकार की आशंका बढ़ने के साथ ही प्रसव के समय बच्चे की जान जाने, प्रसव प्रक्रिया में बाधा आने, गर्भपात होने, समय से पहले बच्चे का जन्म होने जैसी कई समस्याएं हो सकती हैं। शरीर और उसमें विकसित हो रहे बच्चे के लिए यह जरूरी हो जाता है कि डायबिटीज का स्तर नियंत्रण में रहे। यही कारण है कि डॉक्टर सामान्य और स्वस्थ गर्भवती महिलाओं के लिए भी रक्त में शकर की मात्रा को प्रथम ट्राइमेस्टर से ही जांचना शुरू कर देते हैं।
गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज
जेस्टेशनल डायबिटीज या गर्भावस्था के दौरान सामने आने वाली डायबिटीज कई मामलों में टाइप-1 और टाइप-2 से अलग होती है। अधिकांश मामलों में बच्चे के जन्म के बाद शुगर का स्तर अपने आप सामान्य हो जाता है। लेकिन एक बार जेस्टेशनल डायबिटीज का होना टाइप-2 डायबिटीज की आशंका को बढ़ा सकता है। इतना ही नहीं ऐसी गर्भवस्था के साथ पैदा होने वाले शिशु में बचपन में या किशोरावस्था के दौरान मोटापे की आशंका और बड़े होने पर टाइप-2 डायबिटीज होने की आशंका अधिक हो सकती है। इसलिए इस स्थिति को नियंत्रण में रखने के पूर्ण प्रयास करें।
इस तरह रख सकते हैं ध्यान
डायबिटीज के ज्यादातर मामले शुरुआती स्तर पर नियंत्रित किये जाने से मुश्किलों को कम करने में भी मदद कर सकते हैं। यदि आपको पहले से डायबिटीज है तो डॉक्टर से गर्भावस्था को लेकर पूरी जानकारी लें और बच्चा तब ही प्लान करें जब डायबिटीज पूरी तरह नियंत्रण में हो।
- यदि आप जेस्टेशनल डायबिटीज से बचना चाहती हैं तो गर्भावस्था की शुरुआत से ही अपने वजन, खान-पान और फिजिकल एक्टिविटी को लेकर सजग रहें। यदि आपका वजन अधिक है तो गर्भावस्था की ओर कदम बढ़ाने से पहले वजन नियंत्रित कर लें।
- पूर्व में डायबिटीज या प्री डायबिटीज का शिकार होने वाली महिलाओं को दवाई की सही मात्रा का उपयोग करना, पूरे समय शुगर के स्तर को नियंत्रित रखना और खान-पान, जीवनशैली में थोड़ा बदलाव लाने की जरूरत होती है।