Praveen Kumar: प्रवीण कुमार ने झेला डिप्रेशन का मुश्किल दौर, कहीं आपके आस-पास के लोग भी तो नहीं रहते परेशान?
हाल ही में एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में प्रवीण ने डिप्रेशन के दौर के किस्से शेयर किए हैं। कैसे वो अचानक परेशान से रहने लगे, अकेलापन महसूस होता, आत्महत्या के विचार आते।
आपके आसपास भी मानसिक स्वास्थ्य से परेशान लोग हो सकते हैं। उन्हें इन गंभीर परिस्थितियों से कैसे बचाया जाए, आइए मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से समझते हैं।
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विस्तार
साल 2007, ये वो वर्ष था जब भारतीय क्रिकेट में लीग से हटकर बहुत कुछ नया होना शुरू हो चुका था। मार्च-अप्रैल 2007 में हुए 50-50 विश्वकप में भारत का सफर बेहद निराशाजनक रहा। टीम-मैनेजमेंट में बड़ा उथल-पुथल शुरू हुआ। पांच महीने बाद ही पहली बार आईसीसी ने टी-20 विश्वकप का भी आयोजन कराया, हार के गम को टीम इंडिया भुला न सकी थी फिर भी अनमने ढंग से युवाओं की टीम तैयार कर दक्षिण अफ्रीका भेजी गई लेकिन वहां जो हुआ उसने भारतीय क्रिकेट को बदलकर रख दिया। भारत टी-20 विश्वकप का पहला विजेता बना।
इन्हीं सब के साथ-साथ टीम में एक नए खिलाड़ी का उदय भी हो रहा था। स्थान था जयपुर का सवाई मानसिंह स्टेडियम और कैलेंडर में तारीख थी 18 नवंबर, जब पहली बार उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के नौजवान लड़के को 'क्रिकेट के भगवान' ने टीम इंडिया की कैप थमाई।
नाम- प्रवीण कुमार। उंगलियों में ऐसी जादू जो नई गेंद से स्विंग भी करा सकता था, पुरानी गेंद से रिवर्स स्विंग भी। 2008 में ऑस्ट्रेलिया में सीबी ट्रॉफी में प्रवीण ने केवल 4 मैचों में 10 विकेट लेकर अपना रुतबा दुनिया को दिखा दिया था। क्या रेड बॉल क्रिकेट हो, क्या व्हाइट बॉल, प्रवीण की धारदार गेंदबाजी के सामने पोंटिंग-पीटरसन जैसे दिग्गज भी कई मर्तबा परेशान देखे गए।
पर परिस्थियों ने ऐसा मोड़ लिया कि दुनिया के कई धाकड़ बैटर्स को अपनी गेंदबाजी से परेशान करने वाले प्रवीण, खुद इतने परेशान हो गए, टूट गए कि फैसला कर लिया अब खुद को खत्म कर लेना है। डिप्रेशन-आत्महत्या के विचारों वाले इस भयानक दौर ने स्टार प्रवीण कुमार को 'जेन-ज़ी' के जहन से लगभग गुमनाम सा कर दिया।
प्रवीण कुमार और डिप्रेशन का वो भयानक दौर
चयनकर्ताओं द्वारा लंबे समय तक नजरअंदाज किए जाने और 2018 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद, प्रवीण को बुरे दौर से गुजरना पड़ा, जहां उन्हें मानसिक समस्याओं और अकेलेपन ने घेर लिया। एक दफा तो हरिद्वार जाते समय प्रवीण ने रिवॉल्वर से खुद को मारने के बारे में भी सोच लिया था, शुक्र है गाड़ी में लगी बच्चों की तस्वीर सामने पड़ गई और इरादा बदल गया।
हाल ही में एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में प्रवीण ने डिप्रेशन के दौर के किस्से शेयर करते हुए बताया-
टीम इंडिया में जगह न मिल पाना, बार-बार बेबुनियाद आरोप लगाना, मेरी छवि खराब करने कोशिश, जिस प्रदेश के लिए इतना लंबा समय दिया उससे भी कोई मदद न मिल पाना, मुझे लगातार तोड़ रहा था। हर बार मन में सवाल आता, मैंने प्रदेश क्रिकेट के लिए इतना कुछ किया, वहां से भी कोई मदद नहीं मिल रही। ऐसी कौन सी गलती कर दी है? मेरी छवि को इतना क्यों खराब किया जा रहा है, लोग मुझे शराबी-गुस्सैल साबित करने में लगे हुए हैं? ये सब मेरे ही साथ क्यों?
मैं कई-कई घंटे लेटे हुए पंखे को देखते रहता। कई बार ख्याल आता खुद को खत्म कर लूं। ये वो दौर था जो किसी को भी तोड़ दे।
इंटरव्यू में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर प्रवीण कहते हैं, भारत में डिप्रेशन का कॉन्सेप्ट ही कहां होता है? इसके बारे में कोई नहीं जानता न ही शायद समझना चाहता है और मेरठ जैसे छोटे शहरों में तो बिल्कुल भी नहीं। मेरे पास बात करने के लिए कोई नहीं था, लगातार चिड़चिड़ापन महसूस होता था। डिप्रेशन में सभी को अपनों की जरूरत होती है, पर उस समय जैसे कोई साथ नजर ही नहीं आता।
अंतरराष्ट्रीय एथलीट होने की ऊंचाइयां आप पर तब भारी पड़ती हैं जब आप अंतरराष्ट्रीय एथलीट नहीं रह जाते। इंग्लैंड में अपनी अद्भुत स्विंग से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाले गेंदबाज प्रवीण कुमार के लिए क्रिकेट के बिना जीवन निरर्थक लगने लगा था। प्रवीण कहते हैं, मेरे पास करने के लिए कुछ नहीं है, मैं बहुत कुछ करना चाह रहा था लेकिन कर नहीं पा रहा था। इस दौर में शराब की भी आदत लग गई थी। चीजें बिल्कुल हाथ से निकलती दिख रही थीं।
किसी को भी हो सकता है डिप्रेशन
यहां सभी के लिए ध्यान देना और समझना जरूरी है कि इस तरह की समस्या किसी के भी साथ हो सकती है। विशेषकर कोरोना महामारी के बाद से स्ट्रेस-एंग्जायटी और डिप्रेशन के मरीजों में तेजी से बढ़ोतरी भी दर्ज की जा रही है।
प्रवीण कुमार के हालिया चर्चित इंटरव्यू को आधार मानते हुए मानसिक स्वास्थ्य की बढ़ती समस्याओं के बारे में समझने के लिए हमने भोपाल में वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी से बातचीत की। डॉ सत्यकांत कहते हैं, स्टारडम में अचानक आने वाली गिरावट मानसिक अस्थिरता को बढ़ाने का बड़ा कारण बनते देखी जाती रही है। प्रवीण जैसे स्टार क्रिकेटर के साथ भी ऐसी ही परिस्थितियां बनीं। जैसा कि प्रवीण के साथ हुआ डिप्रेशन की गंभीर स्थिति 'अल्कोहल अव्यूज' और 'सुसाइडल थॉट्स' का भी कारण बनती है। ये दोनों स्थितियां डिप्रेशन की गंभीरता को और भी बढ़ाने वाली हो सकती हैं।
अपने इंटरव्यू के दौरान एक जगह प्रवीण कहते हैं, मैं दवाइयां नहीं खाता था, हरिद्वार गया और वहां से ठीक हुआ।
इस बात पर डॉ सत्यकांत कहते हैं, डिप्रेशन की समय पर पहचान और इलाज बहुत जरूरी है। डिप्रेशन की स्थिति में मस्तिष्क में कई प्रकार के रासायनिक बदलाव होने लगते हैं, हार्मोनल इंबैलेंस की समस्या होती है जिसे बिना उपचार के ठीक करना संभव नहीं है। धार्मिक कार्यों, परिजनों-दोस्तों का साथ आपको डिप्रेशन से निकलने में सहायक है, पर बिना दवाइयों के लक्षण और बिगड़ सकते हैं। इसलिए अगर डॉक्टर दवा के लिए बोल रहे हैं तो उसका पालन जरूर किया जाना चाहिए। बिना डॉक्टरी सलाह के न तो कोई दवा लें, न ही खुद से दवा को बंद करें।
शराब और अवसाद का संबंध
प्रवीण अपने कई इंटरव्यू में कहते रहे हैं कि 'मुझे लोगों ने शराबी साबित करने और छवि को खराब करने की भरसक कोशिश की। मैं शराब पीता जरूर था पर जिस तरह से हौवा उड़ाया गया उस तरह से बिल्कुल नहीं'
मेडिकल साइंस कहता है, शराब की आदत भी डिप्रेशन को बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में से एक हो सकती है। शराब न केवल अवसादग्रस्तता के लक्षणों को जन्म दे सकती है, बल्कि उन लोगों में लक्षणों को और भी खराब कर सकती है, जो पहले से ही डिप्रेशन के शिकार हैं या आनुवंशिक रूप से डिप्रेशन के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं।
डॉ सत्यकांत कहते हैं, मैं अपने मरीजों को स्पष्ट बोलता हूं, इस गंभीर मानसिक समस्या से ठीक होना है तो शराब से बिल्कुल दूरी बनानी होगी। अक्सर चिंता-तनाव होने पर कई लोग शराब पीना शुरू कर देते हैं। अल्कोहल के कारण आपको कुछ समय के लिए आराम तो महसूस हो सकता है पर इसका दुष्प्रभाव ये है कि ये आप में बीमारी के निदान को लेट कर देती है। शराब पीने के बाद थोड़ा आराम मिलते ही लोगों को लगने लगता है कि शराब, स्ट्रेस में आराम दे रही है, पर असल में आपमें जिस समस्या का पता पहले चल जाना चाहिए था, शराब उसे और देर कर देती है, जिससे जबतक आप डॉक्टर के पास पहुंचते हैं, लक्षण और भी गंभीर हो जाते हैं।
गुस्सा-चिड़चिड़ापन और आत्मघाती विचार
शराब के अलावा प्रवीण कुमार को लेकर एक चर्चा ये भी रही है कि वह काफी गुस्सैल हैं, जबकि वह अक्सर कहते रहे हैं, इसे भी मेरी छवि खराब करने के लिए टूल के तौर पर इस्तेमाल किया गया।
गुस्से और डिप्रेशन के लिंक को समझें तो पता चलता है कि अवसाद की स्थिति में गुस्सा आना, चिड़चिड़ापन होना बहुत सामान्य है। ये अवसाद के प्रमुख लक्षणों में से भी है। इसी तरह अवसाद की गंभीर स्थिति आत्मघाती विचारों को भी बढ़ावा दे सकती है। आत्महत्या वाले अधिकतर लोगों में डिप्रेशन की समस्या देखी गई है।
डॉ सत्यकांत कहते हैं, हम सभी के लिए जरूरी है कि खुद में और आसपास के लोगों में अवसाद की समस्या, लक्षणों पर ध्यान दें। बाहर से खुश दिखने वाला व्यक्ति जरूरी नहीं अंदर से भी खुश ही हो, मसलन अवसाद किसी को भी हो सकता है। यहां साथ में रहने वालों की बड़ी भूमिका होती है। अगर आपको किसी साथी में अवसाद के लक्षण नजर आएं तो उससे बात करें, परेशानी को समझने की कोशिश करें और समय पर डॉक्टर के पास लेकर जाएं।
डिप्रेशन के इन लक्षणों के बारे में सभी को जानकारी होना और आसपास के लोगों-साथियों में इन समस्याओं पर ध्यान देना जरूरी है।
- लगातार मूड खराब रहना या उदासी बने रहना।
- निराश और असहाय महसूस करना।
- आत्मसम्मान में कमी महसूस होना, हर बात में खुद को दोषी मानना।
- दूसरों से चिड़चिड़ेपन में बात करना, बहुत जल्दी परेशान हो जाना।
- उन चीजों में रुचि न लेना जिसमें पहले बहुत मजा आता था।
मानसिक स्वास्थ्य के प्रति बनिए संवेदनशील
अगर आपमें में किसी साथी में कुछ समय से इस तरह की दिक्कत दिख रही हो तो उसे तुरंत मनोचिकित्सक के पास लेकर जाएं। उससे लगातार संपर्क में रहें, उसकी बातें सुनने-समझने की कोशिश करें और उसे महसूस कराएं कि वह किसी भी पल अकेला नहीं है। ऐसा करके आप न सिर्फ डिप्रेशन से जल्दी निकलने में मदद कर सकते है, साथ ही आत्महत्या जैसी गंभीर स्थितियों से भी बचा सकते हैं।
डॉ सत्यकांत कहते हैं, मानसिक स्वास्थ्य विकार- डिप्रेशन जितनी गंभीर समस्या है, उतनी संवेदनशील भी। रोगी को ठीक करने में जितनी मददगार दवाइयां-थेरेपी होती हैं उसी के साथ-साथ उसके साथ के लोगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। दुर्भाग्यवश, हमारे समाज में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर सहजता की बहुत कमी है। जिसके कारण किसी को परेशान देखकर भी हम उसकी परेशानी को समझ नहीं पाते और कोई परेशान व्यक्ति दूसरों से अपनी समस्याओं को साझा भी नहीं कर पाता। जब तक ये पैटर्न नहीं बदलेगा, हम इन समस्याओं को लेकर संवेदनशील नहीं होंगे, रोगी के भीतर समाज में जज किए जाने का डर रहेगा तब तक डिप्रेशन के खिलाफ लड़ाई हमारे लिए बड़ी ही बनी रहेगी।
अपने इंटरव्यू में प्रवीण उन साथियों का जिक्र करते हैं, जो उस बुरे दौर में उनके साथ रहे। मानसिक स्वास्थ्य विकारों की इस लड़ाई में सभी के जीवन में ऐसी साथी होने जरूरी हैं जिनसे आप खुल के कुछ भी शेयर कर सकते हों, बिना इस झिझक के कि आप कभी जज किए जाएंगे।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेख स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सुझाव, प्रवीण कुमार द्वारा दिए गए कई इंटरव्यू में साझा की गई जानकारियों के साथ मेडिकल रिपोर्ट्स/अध्ययनों के आधार पर तैयार किया गया है। लेख का उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक करना है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।