देश और दुनिया में चल रहे कोरोना संकट के बीच स्वास्थ्यकर्मियों और खासकर नर्सों की बड़ी भूमिका है। साल 2020 को अंतरराष्ट्रीय नर्स वर्ष के तौर पर मनाया जा रहा है, क्योंकि 200 साल पहले 12 मई 1820 को फ्लोरेंस नाइटिंगेल का जन्म हुआ था। आज के दिन उन्हीं की याद में अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस मनाया जाता है। फ्लोरेंस नाइटिंगेल को सैनिक 'लेडी विद लैंप' कह के पुकारते थे।
International Nurses Day: फ्लोरेंस नाइटिंगेल के 'लेडी विद द लैंप' बनने और मिसाल कायम करने की कहानी
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12 मई 1820 को इटली के फ्लोरेंस में विलियम नाइटिंगेल और फेनी के घर जन्मीं फ्लोरेंस नाइटिंगेल इंग्लैंड पली-बढ़ीं। धनी परिवार की फ्लोरेंस को 16 साल की उम्र में एहसास हो गया था कि उनका जन्म सेवा के लिए हुआ है। गणित, विज्ञान और इतिहास की पढ़ाई करने वाली फ्लोरेंस नर्स बनना चाहती थीं। वह मरीजों, गरीबों और पीड़ितों की मदद करना चाहती थीं।
धनवान पिता विलियम फ्लोरेंस की इस इच्छा के खिलाफ थे, क्योंकि नर्सिंग को उस वक्त सम्मानित पेशा नहीं माना जाता था। अस्पताल भी गंदे होते थे और बीमारों के मर जाने से डरावना जैसा लगता था। फ्लोरेंस ने सेवा की अपनी जिद मनवा ली और साल 1851 में उन्होंने नर्सिंग की पढ़ाई शुरू कर दी। 1853 में उन्होंने लंदन में महिलाओं का अस्पताल खोला।
साल 1854 में जब क्रीमिया का युद्ध हुआ तब ब्रिटिश सैनिकों को रूस के दक्षिण स्थित क्रीमिया में लड़ने को भेजा गया। ब्रिटेन, फ्रांस और तुर्की की लड़ाई रूस से थी। युद्ध से जब सैनिकों के जख्मी होने और मरने की खबर आई तो फ्लोरेंस नर्सों को लेकर वहां पहुंची। बहुत ही बुरे हालात थे। गंदगी, दुर्गंध, उपकरणों की कमी, बेड, पेयजल आदि तमाम असुविधाओं के बीच काफी तेजी से बीमारी फैली और सैनिकों की संक्रमण से मौत हो गई। फ्लोरेंस ने अस्पताल की हालत सुधारने के साथ मरीजों के नहाने, खाने, जख्मों की ड्रेसिंग आदि पर ध्यान दिया। सैनिकों की हालत में काफी सुधार हुआ।
लेडी विद लैंप नाम से नायिका के तौर उभरीं
युद्ध काल में फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने घायल और बीमार सैनिकों की देखभाल में दिन-रात एक कर दी। रात में जब सब सो रहे होते थे, वह सैनिकों के पास जाकर देखती थीं कि कहीं उन्हें कोई तकलीफ तो नहीं। सैनिक आराम से सो सकें, इसके लिए वह सेवा में लगी रहती थीं। सैनिकों की ओर से उनके घरवालों को फ्लोरेंस चिट्ठियां भी लिखकर भेजती थीं। रात में हाथ में लालटेन लेकर वह मरीजों को देखने जाती थीं और इसी कारण सैनिक आदर और प्यार से उन्हें 'लेडी विद लैंप' कहने लगे। साल 1856 में वह युद्ध के बाद लौटीं, तो उनका यह नाम प्रसिद्ध हो गया था।
अखबारों में खबरें प्रकाशित हुई और नायिका के तौर पर उभरीं फ्लोरेंस को रानी विक्टोरिया ने पत्र लिखकर उनका धन्यवाद अदा किया। इसी साल सितंबर 1856 में रानी विक्टोरिया ने उनसे मुलाकात भी की और चर्चा के बाद सैन्य चिकित्सा प्रणाली में बड़े पैमाने पर सुधार संभव हुआ। सेना की ओर से डॉक्टरों को प्रशिक्षण देने की शुरुआत हुई। अस्पतालों की सफाई व्यवस्था पर ध्यान देना शुरू हुआ। सैनिकों को बेहतर खाना, कपड़े और देखभाल की सुविधा मुहैया कराई जाने लगी।