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शरीर में खून के प्रवाह का सुचारू होना स्वस्थ होने की दिशा में एक बहुत महत्वपूर्ण स्थिति है। वह खून ही है जो पूरे शरीर में निरंतर बहता रहता है और हर अंग तक ऑक्सीजन के साथ-साथ ताकत भी पहुंचाता है। खून के बहाव की इस प्रक्रिया में आने वाली रुकावट का असर गंभीर हो सकता है और ऐसी ही एक स्थिति बनती है पेरिफेरल आर्टरी या आर्टरियल डिसीज के अंतर्गत। परिफेरल आर्टरी को पेरिफेरल धमनी रोग भी कह सकते हैं। यह समस्या ऐसे रूप में भी सामने आ सकती है जिसे आमतौर पर लोग सामान्य दर्द या तकलीफ समझकर नजरअंदाज कर सकते हैं। सही समय पर इसका इलाज मिलने से स्थिति को गंभीर या जानलेवा होने से रोका जा सकता है। जानिए परिफेरल आर्टरी रोग के बारे में, कैसे होता है यह रोग, पेरिफेरल आर्टरी के लक्षण, बचाव और इलाज के तरीके।
विशेषज्ञ से जानिए: शरीर में सही तरीके से नहीं पहुंच रहा खून तो पेरिफेरल धमनी रोग से पीड़ित हैं आप, ये रहे लक्षण
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पेरिफेरल आर्टरी डिसीज क्या है
पेरिफेरल आर्टरी डिसीज या पीएडी वह स्थिति है जिसमें शरीर में खून ले जाने वाली धमनियां (नलिकाएं) संकरी हो जाती हैं और पर्याप्त मात्रा में खून शरीर के बाहरी अंगों तक नहीं पहुंचा पाता। ये बाहरी अंग मुख्यतौर पर बांहें और पैर होते हैं। जब खून इन अंगों तक नहीं पहुंचता तो धीरे-धीरे दिक्कत होना शुरू होती है। चलने-फिरने या इन अंगों को हिलाने-डुलाने पर होने वाला क्रैम्प या दर्द का झटका जो आराम करने पर ठीक हो जाए, इस समस्या का एक प्रमुख लक्षण हो सकता है। चूंकि शुरुआत में दर्द आराम करने पर ठीक हो जाता है इसलिए लोग इसे सामान्य मांसपेशियों या हड्डियों का दर्द समझकर नजरअंदाज करते हैं या इन्हीं समस्याओं का इलाज लेने लगते हैं। इससे समस्या और भी बढ़ने की नौबत आ जाती है।
पेरिफेरल आर्टरी रोग के लक्षण
बाहों और पैरों में दर्द इस समस्या का आम लक्षण होता है लेकिन इसके अलावा अन्य अंगों में भी इसका दर्द उभर सकता है। सिर और पेट के साथ ही कई बार किडनी तक में दर्द इस समस्या की वजह से हो सकता है। चूंकि यह दर्द इस तरह का होता है कि अधिकांश लोग इसे अन्य समस्याओं जैसे ऑर्थोपीडिक यानी हड्डियों की तकलीफ, मांसपेशियों का दर्द या पेट की समस्या, आदि समझने लगते हैं। इसलिए अक्सर इसके सही इलाज तक पहुंचने में समय लग जाता है। इलाज में अधिक समय लगने या इलाज न लेने से हार्ट अटैक सहित स्ट्रोक या कई बार हाथ-पैर को शरीर से अलग करने की नौबत भी आ सकती है।
खान-पान और आदतें बन सकती हैं दुश्मन:
इस समस्या के लिए मुख्यतः असंतुलित खान-पान, सिगरेट की लत और खराब रूटीन जिम्मेदार होता है। खून के बहाव में बाधा बनकर जमा होने वाला फैट और कोलेस्ट्रॉल खास दुश्मन होते हैं। ये दुश्मन लगातार स्मोकिंग करने भी शरीर में इकट्ठे हो सकते हैं, फिर भले ही आप रोज एक्सरसाइज करते हों या फिटनेस का ध्यान रखते हों, आपकी एक बुरी आदत खतरा पैदा कर सकती है। कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि खून की नलियों में प्लाक का जमा होना और इस बीमारी का शरीर में आकार लेना एक धीमी प्रक्रिया है जो कि कई बार बचपन से भी शुरू हो सकती है। इसके अलावा कभी बाँहों या पैरों में लगी चोट, ब्लड वेसल्स यानी खून की नालियों में सूजन या किसी प्रकार का संक्रमण, किसी रेडिएशन के सम्पर्क में लम्बा समय बिताना या मांसपेशियों या लिगामेंट्स के आकार का असामान्य होना, आदि भी इस समस्या का कारण हो सकता है। किसी भी प्रकार के हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा ग्रस्त और फिजिकली एक्टिव न रहने वालों में इस बीमारी की आशंका अधिक हो सकती है।
दर्द पर ध्यान दें:
पीएडी का दर्द धीरे धीरे बढ़ता है लेकिन क्रैम्प्स की तरह होता है। ठीक जैसे पेट में समस्या होने पर ऐंठन या मरोड़ होती है। यह पिंडली (पैरों में) सबसे आम होता है लेकिन कूल्हों, जाँघों और कुछ मामलों में पैरों के निचले हिस्से में भी उभर सकता है। बीमारी के बढ़ने पर कई अन्य लक्षण भी सामने आने लगते हैं, जैसे पैरों के रंग में बदलाव, इरेक्टाइल डिस्फंक्शन (यह ज्यादातर डायबिटिक पुरुषों में होता है), पैरों में कमजोरी, जलन या सुन्न होने का एहसास, चलने पर थकान का महसूस होना, पैरों का बांहों से ज्यादा ठंडा महसूस होना या एक पैर का दूसरे से अधिक ठंडा महसूस होना, पैरों पर के बालों का झड़ना, पैरों की त्वचा का अधिक चमकदार दिखना, पैरों के नाखूनों की धीमी बढ़त या पैरों के घाव जो जल्दी ठीक न हों, आदि।