पिछले एक दशक में वैश्विक स्तर पर प्रजनन से संबंधित समस्याएं काफी तेजी से बढ़ती देखी जा रही हैं। भारत में भी इसका जोखिम बढ़ा है। इसी को लेकर द लैंसेट जर्नल में प्रकाशित हालिया शोध में विशेषज्ञों ने चिंता जताते हुए सभी लोगों को अलर्ट किया है। अध्ययन की रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 1950 की तुलना में भारत में प्रजनन दर काफी घट गई है, इतना ही नहीं अगले दो दशकों में इसमें और भी कमी आने की आशंका जताई जा रही है। लाइफस्टाइल और आहार में गड़बड़ी के साथ कई प्रकार के पर्यावरणीय कारकों को वैज्ञानिकों ने इसके लिए जिम्मेदार माना है।
Fertility Rate: 70 वर्षों में कई गुना तक कम हो गई है भारत में प्रजनन दर, डॉक्टर ने बताया- ये हैं प्रमुख कारण
क्या कहते हैं आंकड़े?
आंकड़ों से पता चलता है कि साल 2021 में दुनियाभर में 12.9 करोड़ जीवित बच्चे पैदा हुए। ये संख्या साल 1950 में लगभग 9.3 करोड़ जन्मे बच्चों से तो अधिक थी पर साल 2016 में 14.2 करोड़ जन्मे बच्चों की तुलना में इसमें भारी गिरावट देखी गई।
ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (जीबीडी) 2021 फर्टिलिटी एंड फोरकास्टिंग कोलैबोरेटर्स के शोधकर्ताओं ने कहा भले ही दुनिया के अधिकांश हिस्से कम प्रजनन क्षमता की चुनौतियों से जूझ रहे है, फिर भी 21वीं सदी के दौरान कई कम आय वाले देशों में इसका जोखिम कम देखा गया है।
प्रतिकूल परिस्थितियों का देखा जा रहा है असर
वैज्ञानिकों ने बताया, कई जोखिम कारक हैं जो स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता को प्रभावित करते हुए देखे जा रहे हैं। बिगड़ता जलवायु परिवर्तन और खान-पान में आए बदलाव के कारण सबसे ज्यादा चुनौतियां देखी जा रही हैं।
इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (आईएचएमई) और यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन (यूडब्ल्यू) ने इस अध्ययन में पाया कि गर्भावस्था तो बड़ी चुनौती बनती ही जा रही है साथ ही साथ नकारात्मक स्थितियों के कारण बाल मृत्यु दर और विकासात्मक समस्याओं का भी जोखिम हो सकता है।
पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएफआई) की कार्यकारी निदेशक पूनम मुत्तरेजा कहती हैं, ये चुनौतियां भारत के लिए अभी भी कुछ दशक दूर हैं, लेकिन हमें भविष्य के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण के साथ अभी से कार्रवाई शुरू करने की जरूरत है।
क्या कहती हैं स्त्री रोग विशेषज्ञ?
अमर उजाला से बातचीत में भोपाल स्थित वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ दीप्ति गुप्ता बताती हैं, भारत में कम होती प्रजनन दर के लिए जिन कारणों को प्रमुख माना जा रहा है उनमें पहले की तुलना में देर में हो रही शादियां और इसके बाद बच्चों की प्लानिंग में होने वाली अतिरिक्त देरी शीर्ष वजह हो सकती है। जहां पहले 25-26 को गर्भावस्था की औसत आयु मानी जाती थी वो उम्र अब बढ़कर 32-34 हो गई है। उम्र बढ़ने के साथ अंडों की गुणवत्ता में कमी आने की वजह से प्रजनन दर कम होती जा रही है।
इसके अलावा प्रजनन दर घटने का एक कारण ये भी है कि पहले की तुलना में अब लोग कम बच्चे पैदा कर रहे हैं।
कुछ उपायों से हो सकता है सुधार
स्ट्रेस, खान-पान और लाइफस्टाइल में गड़बड़ी के कारण पुरुषों की प्रजनन क्षमता में कमी आ गई है, जिसका भी इस दर पर परिणाम देखा गया है। हालांकि इन आंकड़ों को सिर्फ समस्या के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। 1950 के दशक की तुलना में अब अनियोजित बच्चे भी कम पैदा हो रहे हैं जिसका भी प्रजनन दर पर असर दिखना स्वाभाविक है। निश्चित ही लो फर्टिलिटी एक समस्या है, हालांकि लाइफस्टाइल-आहार में सुधार करके इस दर में भी सुधार किया जा सकता है।
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स्रोत और संदर्भ
Global fertility in 204 countries and territories, 1950–2021, with forecasts to 2100: a comprehensive demographic analysis for the Global Burden of Disease Study 2021
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