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हेल्थ अलर्ट: ये एक आदत बढ़ा देती है कई तरह के कैंसर का खतरा, ज्यादातर युवा आबादी इसकी चपेट में

Sun, 04 Oct 2026 09:44 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Sun, 04 Oct 2026 09:44 PM IST
सार

सिगरेट और तंबाकू का नुकसान सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं है। धूम्रपान से फेफड़े, मुंह, गले, भोजन की नली, सर्विक्स और खून से जुड़े कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। धूम्रपान छोड़ना कैंसर के खतरे को कम करने में महत्वपूर्ण कदम है।

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धूम्रपान के खतरे - फोटो : Amarujala.com/AI

दुनियाभर में जिस तरह से क्रॉनिक बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है, इसको लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को अलर्ट कर रहे हैं? डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर से लेकर दिल की बीमारियों तक सभी उम्र के लोगों में इसका खतरा देखा जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसके लिए लाइफस्टाइल में गड़बड़ी को प्रमुख कारण मानते हैं।  जिन आदतों को सेहत के लिए सबसे नुकसानदायक माना जा रहा है उनमें धूम्रपान शीर्ष पर है।



सिगरेट पीने को अक्सर लोग सिर्फ फेफड़ों के लिए खतरनाक मानते हैं। हालांकि अध्ययनों से पता चलता है कि सिगरेट का धुआं शरीर के कई अंगों को प्रभावित करता है। इसमें कैंसर पैदा करने वाले रसायन भी होते हैं जो कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं। विशेषज्ञ सिगरेट को फेफड़ों से लेकर मुंह, गले, भोजन की नली, पेट, लिवर, किडनी, मूत्राशय और शरीर के दूसरे हिस्सों में कैंसर का खतरा बढ़ाने वाला बताते हैं।

आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में युवाओं के बीच धूम्रपान और तंबाकू का इस्तेमाल सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। 13 से 15 साल की उम्र के लगभग 6.9 से 22.5 प्रतिशत छात्र अभी किसी न किसी रूप में तंबाकू उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

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फेफड़ो के कैंसर के मामले - फोटो : Freepik.com

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार तंबाकू का इस्तेमाल 20 से ज्यादा तरह के कैंसर का जोखिम बढ़ाने वाला हो सकता है। यानी रोज की यह आदत धीरे-धीरे शरीर के कई हिस्सों को नुकसान पहुंचा रही होती है। 

फेफड़ों का कैंसर सबसे बड़ा खतरा

मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि धूम्रपान से सबसे ज्यादा खतरा फेफड़ों के कैंसर का होता है। सिगरेट का धुआं जहरीले रसायनों का मिश्रण होता है और इसमें कम से कम 70 ऐसे रसायन पहचाने गए हैं जो कैंसर पैदा कर सकते हैं। सिगरेट पीना फेफड़ों के कैंसर का सबसे बड़ा जोखिम कारक है। रोज कुछ ही सिगरेट पीने या कभी-कभार धूम्रपान करने से भी जोखिम बढ़ सकता है।
 

  • फेफड़ों के अलावा धूम्रपान से सांस की नली से जुड़े कैंसर का खतरा भी बढ़ता है। 
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ओरल कैंसर का जोखिम - फोटो : Adobe stock photos

मुंह, गले और आवाज की नली का कैंसर

सिगरेट का धुआं सीधे मुंह और गले के संपर्क में आता है। लंबे समय तक धूम्रपान करने से मुंह, गले और आवाज की नली यानी लैरिंक्स के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। लगातार गले में परेशानी, आवाज में बदलाव या मुंह में घाव जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
 

  • धूम्रपान सिर्फ इन अंगों तक सीमित नहीं है। इससे भोजन की नली यानी इसोफेगस के कैंसर का खतरा भी बढ़ता है। यही कारण है कि तंबाकू का धुआं शरीर में जहां-जहां पहुंचता है, वहां कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है।
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पेट में कैंसर का जोखिम - फोटो : adobe stock images
पेट, अग्न्याशय और आंत तक को खतरा

धूम्रपान का नुकसान केवल उन अंगों तक नहीं रहता जो सीधे धुएं के संपर्क में आते हैं। इसके कारण पेट, लिवर, अग्न्याशय यानी पैंक्रियाज और बड़ी आंत व मलाशय के कैंसर का जोखिम भी बढ़ सकता है।
 
  • सीडीसी के अनुसार धूम्रपान से जुड़े कैंसर में पेट, लिवर, पैंक्रियाज और कोलन-रेक्टम के कैंसर शामिल हैं। 
  • इसका मतलब है कि लंबे समय तक धूम्रपान करने की आदत शरीर के अलग-अलग हिस्सों में कैंसर का खतरा बढ़ा सकती है।
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किडनी में कैंसर का खतरा - फोटो : Freepik.com

किडनी, सर्विक्स और ब्लड का कैंसर

धूम्रपान से किडनी और मूत्राशय के कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है। महिलाओं में सर्विक्स यानी गर्भाशय के मुंह के कैंसर का जोखिम भी इससे जुड़ा हुआ पाया गया है। इसके अलावा एक खास तरह के ब्लड कैंसर, एक्यूट मायलॉयड ल्यूकेमिया, का संबंध भी धूम्रपान से पाया गया है।
 

  • अच्छी बात यह है कि धूम्रपान छोड़ने का फायदा किसी भी उम्र में मिल सकता है। सीडीसी के मुताबिक धूम्रपान छोड़ने से 12 तरह के कैंसर का जोखिम कम होता है। 10-15 साल बाद फेफड़ों के कैंसर का अतिरिक्त जोखिम लगभग आधा हो सकता है। 



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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