दुनियाभर में पिछले करीब दो साल से जारी कोरोना संक्रमण ने स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के लिए बड़ी चुनौती पैदा कर दी है। डेल्टा जैसे वैरिएंट के कारण होने वाले संक्रमण की गंभीरता के कारण अस्पतालों में ऑक्सीजन और कुछ आवश्यक दवाओं की भारी कमी के चलते लोगों को खासा मुसीबतों का सामना करना पड़ा। कोरोना संक्रमण के बीच कई तरह की दवाइयों की मांग तेजी से बढ़ी जिसमें एंटीबायोटिक्स, एंटीवायरल, स्टेरॉयड, श्वसन संबंधी दवाएं और विटामिन सप्लीमेंट्स प्रमुख रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ इस दौरान कुछ ऐसी दवाइयों की मांग में भी काफी बढ़ोतरी देखी गई है, जिसके ज्यादा उपयोग को स्वास्थ्य विशेषज्ञ नुकसानदायक मानते हैं।
उभरता खतरा: कोरोना काल में बढ़ी सेहत के लिए खतरनाक दवाओं की मांग, विशेषज्ञों ने चेताया
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भारतीय फार्मास्युटिकल उद्योग और कोरोना काल?
मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक फार्मास्युटिकल उद्योग ने कोरोना के समय में अच्छा मुनाफा कमाया। स्टेहैपी फार्मेसी की एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर आरुषि जैन बताती हैं, पिछले दो साल की बात करें तो भारतीय फार्मास्युटिकल उद्योग ने दुनियाभर में अपना नाम कमाया। भारत कोविड-19 वैक्सीन का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। भारतीय फार्मा और हेल्थकेयर उद्योग ने पिछले दो वर्षों में अच्छी ग्रोथ की है। महामारी के दौरान डिजिटल हेल्थ और टेलीमेडिसिन ने लोगों की मुसीबतों को कम करने की दिशा में अच्छा प्रयास किया।
कुछ रिपोर्टस में जिक्र किया गया है कि कोरोना के समय में एंटी-डिप्रेशन की दवाइयों की मांग पहले की अपेक्षा काफी बढ़ी है, स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस रिपोर्ट को लेकर चिंतित हैं।
एंटी-डिप्रेशन दवाओं की बढ़ती मांग चिंताजनक
अमर उजाला से बातचीत में वरिष्ठ मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ सत्यकांत त्रिवेदी बताते हैं, एंटी-डिप्रेशन दवाइयों की पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी मांग स्पष्ट बताती है कि कोरोना संक्रमण ने लोगों के शारीरिक ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य को भी काफी गंभीर रूप से प्रभावित किया है। अवसाद और तनाव से ग्रसित लोगों की संख्या पिछले एक साल में 40-60 फीसदी तक बढ़ी है, यह मानसिक स्वास्थ्य के लिहाजे से काफी चिंताजनक है।
कुछ दवाइयों के हो सकते हैं गंभीर दुष्प्रभाव
रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना काल में न्यूरो-कॉग्नेटिव इंहेंसर (एंटीड्रिप्रेसेंट्स दवा) की बिक्री और खपत में करीब 20-30 फीसदी का उछाल आया है। कोरोना ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित किया है। डॉ सत्यकांत बताते हैं, इस तरह की दवाइयों के ज्यादा या फिर खुद इस्तेमाल शुरू करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। चिकित्सकीय परामर्श के आधार पर ही इनका सेवन करना चाहिए। कोरोना काल में मानसिक स्वास्थ्य की समस्या बड़े चैलेंज के तौर पर उभरी है, जिसका असर आने वाले कई वर्षों तक बने रहने की आशंका है।
स्टेरॉयड दवाओं की मांग में भी बढ़ोतरी
कोरोना के इस दौर में स्टेरॉयड दवाओं की मांग भी तेजी से बढ़ी है। विशेषकर कोरोना की दूसरी लहर के दौरान रोगियों को स्टेरॉयड दवाएं काफी ज्यादा दी गईं, जिसके ब्लैक फंगस के रूप में गंभीर परिणाम भी देखने को मिले। एक बातचीत में दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में वरिष्ठ श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ आशीष जैन बताते हैं, स्टेरॉयड ब्लड ग्लूकोज के स्तर को बढ़ा देता है, जिसका प्रतिरोधक क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसके इस्तेमाल को लेकर सभी को विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है, यह दवाइयां जितनी फायदेमंद होती हैं, इसके दीर्घकालिक परिणाम उतने ही गंभीर हो सकते हैं।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से प्राप्त जानकारियों आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।