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Coronavirus: आखिर क्या होता है प्लेसिबो? कोरोना वैक्सीन से किस तरह जुड़ा है ये

Sat, 05 Dec 2020 09:46 PM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Sat, 05 Dec 2020 09:46 PM IST
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coronavirus vaccine What is placebo and how is it associated with the covid vaccine
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

पिछले महीने ही कोरोना की वैक्सीन लेने के बाद हरियाणा के गृहमंत्री अनिल विज चर्चा में तो आए थे, लेकिन अब उससे भी ज्यादा चर्चा इस बात की होने लगी है कि वो वैक्सीन लेने के बावजूद कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। उन्हें भारत में बन रही 'को-वैक्सीन' का टीका लगाया गया था, जिसे भारत-बायोटेक ने विकसित किया है। इससे वैक्सीन को लेकर तो सवाल खड़े हो ही रहे हैं कि क्या स्वदेशी वैक्सीन का एडवांस ट्रायल 'फेल' हो गया, साथ ही एक और चीज को लेकर खूब चर्चा हो रही है और वो है 'प्लेसिबो'। आइए जानते हैं आखिर होता क्या है ये प्लेसिबो और कोरोना वैक्सीन से ये किस तरह से जुड़ा हुआ है? 

coronavirus vaccine What is placebo and how is it associated with the covid vaccine
कोरोा वायरस वैक्सीन (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत बायोटेक का कहना है कि वैक्सीन के तीसरे चरण के ट्रायल में 50 फीसदी लोगों को वैक्सीन दी जाती है जबकि अन्य 50 फीसदी को प्लेसिबो दिया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर प्लेसिबो क्या काम करता है, क्योंकि वैक्सीन के बारे में तो सबको पता है कि यह वायरस से बचाव करता है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

भारत बायोटेक के मुताबिक, प्लेसिबो एक ऐसी चीज है जो शरीर पर किसी तरह का कोई प्रभाव नहीं डालती। असल में डॉक्टर इसका इस्तेमाल ये जानने के लिए करते हैं कि किसी व्यक्ति पर दवा लेने का कितना और कैसा मानसिक असर पड़ता है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pixabay

अगर प्लेसिबो को आम भाषा में समझें तो यह एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है, जिसमें दवा का इस्तेमाल नहीं किया जाता है बल्कि यह भ्रम या अहसास के आधार पर काम करती है। इसका मतलब ये है कि किसी मरीज को दवा की तरह दिखने वाली गोली तो दी जाती है, लेकिन वो दवा नहीं होती। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

वैसे तो प्लेसिबो चिकित्सा पद्धति का कोई वैज्ञानिक आधार तो नहीं होता, लेकिन कई बार मरीजों को इसके इस्तेमाल से ठीक होते हुए भी देखा गया है। दरअसल, प्लेसिबो प्रभाव किसी व्यक्ति की अपेक्षाओं के कारण प्रभावकारी होता है यानी कि अगर किसी मरीज को लगता है कि वो दवाई खाकर या इंजेक्शन लेकर ठीक हो जाएगा तो यह संभव है कि उसे दवाई न देकर उसी की तरह दिखने वाली कोई गोली दे दी जाए और उसे खाकर वो ठीक हो जाए। इसी वजह से इसे 'भ्रामक उपचार' भी माना जाता है। 

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