पिछले महीने ही कोरोना की वैक्सीन लेने के बाद हरियाणा के गृहमंत्री अनिल विज चर्चा में तो आए थे, लेकिन अब उससे भी ज्यादा चर्चा इस बात की होने लगी है कि वो वैक्सीन लेने के बावजूद कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। उन्हें भारत में बन रही 'को-वैक्सीन' का टीका लगाया गया था, जिसे भारत-बायोटेक ने विकसित किया है। इससे वैक्सीन को लेकर तो सवाल खड़े हो ही रहे हैं कि क्या स्वदेशी वैक्सीन का एडवांस ट्रायल 'फेल' हो गया, साथ ही एक और चीज को लेकर खूब चर्चा हो रही है और वो है 'प्लेसिबो'। आइए जानते हैं आखिर होता क्या है ये प्लेसिबो और कोरोना वैक्सीन से ये किस तरह से जुड़ा हुआ है?
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कोरोा वायरस वैक्सीन (फाइल फोटो)
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मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत बायोटेक का कहना है कि वैक्सीन के तीसरे चरण के ट्रायल में 50 फीसदी लोगों को वैक्सीन दी जाती है जबकि अन्य 50 फीसदी को प्लेसिबो दिया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर प्लेसिबो क्या काम करता है, क्योंकि वैक्सीन के बारे में तो सबको पता है कि यह वायरस से बचाव करता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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भारत बायोटेक के मुताबिक, प्लेसिबो एक ऐसी चीज है जो शरीर पर किसी तरह का कोई प्रभाव नहीं डालती। असल में डॉक्टर इसका इस्तेमाल ये जानने के लिए करते हैं कि किसी व्यक्ति पर दवा लेने का कितना और कैसा मानसिक असर पड़ता है।
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अगर प्लेसिबो को आम भाषा में समझें तो यह एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है, जिसमें दवा का इस्तेमाल नहीं किया जाता है बल्कि यह भ्रम या अहसास के आधार पर काम करती है। इसका मतलब ये है कि किसी मरीज को दवा की तरह दिखने वाली गोली तो दी जाती है, लेकिन वो दवा नहीं होती।
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वैसे तो प्लेसिबो चिकित्सा पद्धति का कोई वैज्ञानिक आधार तो नहीं होता, लेकिन कई बार मरीजों को इसके इस्तेमाल से ठीक होते हुए भी देखा गया है। दरअसल, प्लेसिबो प्रभाव किसी व्यक्ति की अपेक्षाओं के कारण प्रभावकारी होता है यानी कि अगर किसी मरीज को लगता है कि वो दवाई खाकर या इंजेक्शन लेकर ठीक हो जाएगा तो यह संभव है कि उसे दवाई न देकर उसी की तरह दिखने वाली कोई गोली दे दी जाए और उसे खाकर वो ठीक हो जाए। इसी वजह से इसे 'भ्रामक उपचार' भी माना जाता है।