चीन के वुहान शहर से शुरू हुए कोरोना वायरस का संक्रमण दुनिया भी में बढ़ता ही जा रहा है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में हर दिन कोरोना संक्रमण के नए मामले सामने आ रहे हैं। दूसरी ओर इसकी दवा और वैक्सीन तैयार करने के लिए कई देशों के वैज्ञानिक लगे हुए हैं। अमेरिका में जहां इसकी वैक्सीन का मानव शरीर पर ट्रायल हो चुका है, वहीं भारत में फार्मा कंपनी सिप्ला ने छह महीने में इसकी दवा तैयार करने का दावा किया है। अन्य देशों में भी इसके जांच किट से लेकर दवा बनाने की कोशिशें जारी है। इस बीच जापान की एक फार्मा कंपनी ने भी दवा तैयार करने के संबंध में दावा किया है। आइए, जानते हैं विस्तार से:
दरअसल जापानी कंपनी टाकेडा फार्मा लंबे समय से कोरोना की दवा तैयार करने में लगी हुई है। इसी क्रम में कंपनी ने कोरोना से रिकवर हुए मरीजों के ब्लड प्लाज्मा से एंटीबॉडीज लेकर दवा बना रही है। कंपनी का दावा है कि कोरोना संक्रमित मरीजों के लिए यह दवा बहुत कारगर साबित होगी। कोरोना संक्रमण से ठीक हुए लोगों के शरीर में मौजूद इम्यून सिस्टम ऐसे एंटीबॉडीज बनाते हैं, जो उनमें ताउम्र रहते हैं।
कंपनी का तर्क है कि कोरोना से रिकवर हुए मरीजों से निकली एंटीबॉडीज नए कोरोना मरीजों में पहुंचने के बाद उनके इम्यून सिस्टम में तेजी से सुधार करेगी और मरीज ठीक हो जाएगा। दरअसल, ऐसे मरीज जो हाल ही में बीमारी से ठीक हुए हैं, उन लोगों के शरीर में मौजूद इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता ऐसी एंटीबॉडीज बनाती है, जो उनके शरीर में ताउम्र रहती हैं। ये एंटीबॉडीज ब्लड प्लाज्मा में मौजूद होते हैं।
ब्लड प्लाज्मा में मौजूद एंटीबॉडीज को दवा में तब्दील करने के लिए पहले ब्लड से प्लाज्मा को अलग किया जाता है और बाद में इनसे एंटीबॉडीज निकाली जाती हैं। एक खास थेरेपी की मददस से इन एंटीबॉडीज को कोरोना के नए मरीज के शरीर में इंजेक्ट किया जाता है। इस थेरेपी को प्लाज्मा डेराइव्ड थेरेपी कहा जाता है। इससे मरीज का शरीर तब तक बीमारी से लड़ने की क्षमता बढ़ाता है, जब तक उसका शरीर खुद से एंटीबॉडीज तैयार करने के लायक न बन जाए।
5 of 6
वायरस से बचाव के लिए सैनेटाइज करते कर्मी
- फोटो : पीटीआई
सामान्य भाषा में इसे दूध में जोड़न डाल कर दही जमाने की तरह समझा जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के इमरजेंसी प्रोग्राम हेड माइक रियान के मुताबिक कोरोना वायरस से इलाज का यह बेहतर तरीका हो सकता है। मरीजों को सही समय पर दिया जाए तो उनके शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ जाएगी। हालांकि उन्होंने यह बात भी जोड़ी कि हर बार यह थेरेपी सफल नहीं होती, इसलिए ऐसा करते समय बेहद सावधानी बरतना जरूरी है।