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कोरोना वायरस: आखिर मरीजों के पेट के बल लेटने के मायने क्या हैं?

Fri, 24 Apr 2020 10:45 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: निलेश कुमार Updated Fri, 24 Apr 2020 10:45 PM IST
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coronavirus update on covid-19 infected patient get relief by prone position ventilation
Corona virus - फोटो : Social Media

कोविड-19 संक्रमित मरीजों के इलाज में दुनिया भर में प्रोनिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें मरीजों को पेट के बल लेटाया जा रहा है। दुनिया भर में कोविड-19 संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इसके चलते अलग-अलग हिस्सों से अस्पतालों की तस्वीरें भी सामने आ रही हैं। इन तस्वीरों में इंटेंसिव केयर यूनिट में अत्याधुनिक वेंटिलेटरों पर लेटे हुए मरीज दिखाई देते हैं।



वेंटिलेटरों से उन्हें सांस लेने में मदद मिलती हैं लेकिन इन तस्वीरों की एक खास बात पर नजरें टिक रही हैं। बहुत सारे मरीज पेट के बल, आगे की ओर लेटे हुए हैं। दरअसल, यह एक बेहद पुरानी तकनीक है जिसे प्रोनिंग कहते हैं, इससे सांस लेने में समस्या होने वाले मरीजों को फायदा होते हुए देखा गया है। इस मुद्रा में लेटने से फेफेड़ों तक ज्यादा ऑक्सीजन पहुंचती है। लेकिन इस तकनीक के अपने खतरे भी हैं।

coronavirus update on covid-19 infected patient get relief by prone position ventilation

ज्यादा ऑक्सीजन का मिलना
मरीजों को प्रोन पोजिशन में कई घंटों तक लिटाया जाता है ताकि उनके फेफड़ों में जमा तरल पदार्थ मूव कर सके। इससे मरीजों को सांस लेने में आसानी होती है। इंटेंसिव केयर यूनिट में कोविड-19 के मरीजों के साथ इस तकनीक का इस्तेमाल काफी बढ़ा है। जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर और फेफड़ों तथा क्रिटिकल केयर के मेडिसिन एक्सपर्ट पानागिस गालियातस्तोस ने कहा, "अधिकांश कोविड-19 मरीज के फेफड़ों तक पर्याप्त आक्सीजन नहीं पहुंच पाती हैं और इससे खतरा पैदा होता है।"

डॉ. गालियातस्तोस ने कहा, "जब ऐसे मरीजों को ऑक्सिजन दी जाती है तो वह भी कई बार पर्याप्त नहीं होता है। ऐसी स्थिति में हम उनको पेट के बल लिटाते हैं, चेहरा नीचे रहता है, इससे उनका फेफड़ा बढ़ता है।" उनके मुताबिक इंसानी फेफड़े का भारी हिस्सा पीठ की ओर होता है इसलिए जब कोई पीठ के बल लेटकर सामने देखता है तो फेफड़ों में ज्यादा आक्सिजन पहुंचने की संभावना कम होती है।

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इसकी जगह अगर कोई प्रोन पॉजिशन में लेटे तो फेफड़ों में ज्यादा ऑक्सीजन पहुंचता है और फेफड़े के अलग-अलग हिस्से काम करने की स्थिति में होते हैं। डॉ. गालियातस्तोस ने कहा, "इससे बदलाव दिखता है। हमने इस तकनीक से कई मरीजों को फायदा मिलते देखा है।"

एक्यूट रिसेपरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (एआरडीएस) वाले कोविड-19 मरीजों के लिए मार्च महीने में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने 12 से 16 घंटे तक प्रोनिंग की अनुशंसा की थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन  के मुताबिक यह तकनीक बच्चों के लिए भी इस्तेमाल हो सकती है लेकिन इसे सुरक्षित करने के लिए लिए प्रशिक्षित लोग और अतिरिक्त विशेषज्ञता चाहिए।

अमरीकी थोरासिस सोसायटी ने चीन के वुहान स्थित जियानतान हॉस्पिटल में फरवरी महीने में एआरडीएस वाले 12 कोविड मरीजों पर अध्ययन किया। इस अध्ययन के मुताबिक जो लोग प्रोन पॉजिशन लेट रहे थे उनके फेफड़ों की क्षमता ज्यादा थी।

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तकनीक के खतरे
हालांकि यह तकनीक बहुत आसान लग रही है लेकिन इसके अपने खतरे भी हैं। मरीजों को उनके पेट पर लिटाने में वक़्त लगता है। इसमें अनुभवी पेशेवरों की जरूरत भी होती है। डॉ. गालियातस्तोस ने बताया कि यह आसान नहीं है। इसे प्रभावी ढंग से करने के लिए चार या पांच पेशेवरों की जरूरत होती है। अस्पतालों में यह काफी मुश्किल होता है क्योंकि वहां पहले से ही स्टाफ की कमी होती है और कोविड-19 मरीजों की बढ़ती संख्या ने उनकी मुश्किलों को बढ़ा दिया है। डॉ. गालियातस्तोस के मुताबिक जोंस होपकिंस हॉस्पिटल में कोरोना संक्रमित मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए प्रोनिंग के लिए एक अलग टीम तैयार की गई है।

गालियातस्तोस ने बताया कि अगर कोविड-19 मरीज वैसे इंटेंसिव केयर यूनिट में भर्ती हों जहां इस तकनीक में सक्षम स्टाफ नहीं हों तो वहां के स्टाफ विशेष टीम से स्टाफ को बुला सकते हैं। लेकिन मरीजों की पोजिशन बदलने में दूसरी अन्य मुश्किलें भी शुरू हो सकती हैं। डॉ. गालियातस्तोस ने बताया कि हमारी बड़ी चिंताओं में मोटापा एक है। हमें छाती में इंजरी वाले मरीजों के साथ भी सावधान होना होता है। इसके अलावा वेंटिलेशन औरर कैथेटर ट्यूब वाले मरीजों में सावधानी बरतनी होती है। हालांकि इस तकनीक से हार्ट अटैक का खतरा भी बढ़ जाता है और कई बार सांस में अवरोध भी पैदा हो सकता है

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तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल
1970 के दशक के मध्य में प्रोनिंग के फायदे को पहली बार देखा गया था। विशेषज्ञों के मुताबिक 1986 के बाद दुनिया भर के अस्पतालों में इस तकनीक का इस्तेमाल शुरू हुआ। लुसियानो गातिनोनी इस तकनीक पर शुरुआती अध्ययन और अपने मरीजों पर सफलातपूर्वक इस्तेमाल करने वाले डॉक्टरों में एक रहे हैं।

लुसियानो इन दिनों एनिस्थिसियोलॉजी (निश्चेत करने वाले विज्ञान) एवं पुनर्जीवन से जुड़े विज्ञान के एक्सपर्ट हैं। इसके अलावा वे मिलान स्टेट यूनिवर्सिटी में एमिरेट्स प्रोफेसर हैं। प्रोफेसर लुसियानो ने बीबीसी को बताया कि शुरुआती दिनों में प्रोनिंग को मेडिकल समुदाय के रूढ़िवादी होने के चलते काफी विरोध का सामना करना पड़ा।

प्रोफेसर लुसियानो ने कहा, "लेकिन अब इस तकनीक का काफी इस्तेमाल होता है।" उनके मुताबिक प्रोनिंग से फेफड़ों में ऑक्सिजन की मात्रा बढ़ने के अलावा दूसरे फायदे भी हैं। उन्होंने बताया, "जब मरीज चेहरा नीचे करके लेटता है तो उसके फेफड़ों के अलग-अलग हिस्सों एकसमान दबाव वितरीत होता है।"

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